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मनोज जरांगे की रणनीति से महाराष्ट्र में किसे फायदा और किसे नुकसान? MVA और महायुति की पैनी नजर

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नई दिल्ली

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद दो साल तक सुर्खियों में रहे मनोज जरांगे पाटिल भी अपने उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी कर रहे हैं, हालांकि वह खुद चुनाव नहीं लड़ेंगे। उनके इस फैसले से किसे फायदा होगा और किसे नुकसान, यह देखना दिलचस्प है। मनोज जरांगे ने रणनीति बनाई है कि वह अपने उम्मीदवार उतारेंगे, अन्य दलों के चुनिंदा उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे और प्रतिद्वंद्वी दलों के कुछ उम्मीदवारों की हार के लिए पूरी मेहनत करेंगे। उनकी इस रणनीति का असर महायुति या महा विकास अघाड़ी (एमवीए) किसपर पड़ेगा, आइए समझते हैं।

दोनों ही तरफ से मनोज जरांगे पर रखी जा रही है नजर
मनोज जरांगे एक छोटे से गांव के कार्यकर्ता से लेकर मराठा समुदाय के बीच महत्वपूर्ण समर्थन वाले एक प्रमुख नेता बने हैं। वह हमेशा दावा करते रहे हैं कि उन्हें राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनका प्राथमिक ध्यान अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी के तहत मराठा समुदाय के लिए आरक्षण हासिल करना और गरीब मराठों के कल्याण की वकालत करना है।

विधानसभा चुनाव के तहत महायुति और एमवीए दोनों ही गठबंधन मनोज जरांगे की योजनाओं पर बारीकी से नज़र रख रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में पाटिल के मराठा आंदोलन ने भाजपा को काफ़ी प्रभावित किया था जिससे उसकी सीटें 23 से घटकर सिर्फ़ नौ रह गईं। उनके आंदोलन के केंद्र मराठवाड़ा में पार्टी आठ में से एक भी सीट जीतने में विफल रही।

पाटिल की राजनीति में एंट्री?
राजनीति से दूर रहने के अपने घोषित रुख से स्पष्ट रूप से अलग हटते हुए पाटिल ने रविवार को जालना जिले के अंतरवाली सारथी गांव में एक सभा को संबोधित किया। उन्होंने कहा, “मुझे चुनाव लड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है। हम कई मोर्चों पर अपनी बात रखने के लिए रणनीति तैयार करेंगे। हम एससी/एसटी उम्मीदवारों का समर्थन करेंगे। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में हम उन उम्मीदवारों को समर्थन देंगे जो हमारे मुद्दे पर खड़े रहे हैं और उन सभी की हार सुनिश्चित करेंगे जो हमारे खिलाफ हैं।”

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