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मुस्लिम लड़कियों की शादी की उम्र 15 क्यों? याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

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नई दिल्ली

सभी धर्मों में शादी की एक समान उम्र तय करने की राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा। सुप्रीम कोर्ट में दाखिला इस याचिका में जिसमें सभी धर्मों की महिलाओं के लिए 18 वर्ष की एक समान विवाह योग्य आयु को लागू करने की मांग की गई थी। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की पीठ ने एनसीडब्ल्यू की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा की दलीलें सुनने के बाद विधि आयोग से भी जवाब मांगा। NCW ने दिल्ली हाई कोर्ट के एक हालिया फैसले का हवाला दिया जिसमें एक नाबालिग मुस्लिम लड़की की शादी को इस आधार पर इजाजत दी गई थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत इसकी अनुमति है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ के अलावा दूसरे धर्मों में ‘विवाह की न्यूनतम आयु’ प्रचलित दंड कानूनों के अनुरूप है। भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम 1872, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम 1936, विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत, एक पुरुष के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और एक महिला के लिए 18 वर्ष है।

NCW की ओर से कहा गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत प्यूबर्टी यानी युवावस्था प्राप्त करने वाली लड़की की शादी की उम्र 15 साल है। यह न केवल मनमाना, तर्कहीन और भेदभावपूर्ण है, बल्कि पॉक्सो अधिनियम, 2012 के प्रावधानों का भी उल्लंघन है, जो बच्चों, विशेषकर लड़कियों को यौन अपराध से बचाने के लिए लागू किया गया था।

पूर्व में सुप्रीम कोर्ट की ओर से आर्टिकल 44 में निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई संदर्भ दिए गए हैं। शाह बानो मामले (1985) में, SC ने कहा था एक सामान नागरिक संहिता इस दिशा में मदद करेगी। 1995 में सरला मुद्गल मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की ओर से ऐसा ही कहा गया। सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में जॉन वल्लमट्टम मामले में अनुच्छेद 44 द्वारा निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने उद्देश्य पर प्रकाश डाला था।

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