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Wednesday, April 29, 2026
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क्या नीतीश 2025 में NDA के साथ बने रहेंगे? जानिए वो ‘बड़ी बात’… जिसके चलते उठा बड़ा सवाल

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पटना

एग्जिट पोल ने यह तो साफ कर दिया कि एनडीए में अगर लोकसभा सीटों को ले कर नुकसान हो रहा है तो, उसके पीछे जदयू उम्मीदवारों की संभावित हार है। लोकसभा चुनाव के पहले इंडिया गठबंधन की मशाल जलाने वाले नीतीश कुमार ही थे। लेकिन जब नीतीश ने महागठबंधन की सरकार से नाता तोड़ भाजपा से हाथ मिलाया तब राजनीतिक विशेषज्ञों की भी राय थी कि अस्थिर नीतीश कुमार को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। लाइक माइंडेड जनता की नाराजगी नीतीश कुमार पर भारी पड़ेगी। कमोबेश एग्जिट पोल में जो कुछ भी परिणाम दिखाए जा रहे हैं उससे इसकी पुष्टि भी होती है।

जदयू की संभावित कम सीटों की वजह
1- एनडीए से महागठबंधन और महागठबंधन से फिर एनडीए में आने के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का यूएसपी घटी।
2- नीतीश कुमार के अविश्वसनीय होते जाने के कारण वे अनप्रेडिक्टेबल हो गए।
3- पीएम नरेंद्र मोदी के विरुद्ध जोर-शोर से लग कर इंडिया गठबंधन को खड़ा करना और फिर बताशे के लिए मंदिर तोड़ने जैसी हरकत करने के बाद राजनीतिक जगत में उनकी साख को बट्टा लगा।
4- इस उलट-पलट की राजनीति के कारण संगठन कमजोर हुआ। ऐन चुनाव के मौके पर राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह को पद मुक्त करना का संदेश ठीक नहीं गया।
5- दबाव में लोकसभा उम्मीदवारों का चयन करना: अगर गया और काराकाट को छोड़ दें तो नीतीश कुमार एंटी इनकंबेंसी के झंझावत में फंसे सीटिंग सांसदों का टिकट काटने की हिम्मत नहीं कर पाए।
6- शुरुआती दौर में पीएम मोदी के साथ नीतीश जनसभाओं में गए। पर बाद की जनसभाओं में उनका नहीं दिखना भी एक बड़ा कारण रहा।

हार के बाद एनडीए की राजनीति में परिवर्तन?
भाजपा की रणनीति की बात करें तो चुनाव में हार मिले या जीत, ये पार्टी एक परिपाटी के तहत सामूहिक जिम्मेवारी लेती है। इसलिए यह उम्मीद तो नहीं है कि 4 जून के बाद बिहार की राजनीति में कोई परिवर्तन होगा। केंद्रीय राजनीति का विश्लेषण करें तो अभी तक बिहार में बीजेपी अकेले लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकी है। वैसे भाजपा की पहली प्राथमिकता केंद्र सरकार को बनाना और बहुमत के पार जाने की है, जिससे सरकार स्थिर रह सके। राज्य की राजनीति उनकी दूसरी प्राथमिकता है, इस लिहाजा साल 2025 विधानसभा चुनाव के पहले तक सीएम नीतीश कुमार बने रहेंगे। ये अलग बात है कि बिहार बीजेपी के मन में अभी भी अकेले चुनाव लड़ने की इच्छा बाकी है।

सम्राट चौधरी ने क्या-क्या नहीं कहा
सम्राट चौधरी जब पंचायती राज मंत्री थे तब उनका एक बयान बहुत वायरल हुआ था। तब सम्राट ने कहा था कि बिहार में मजबूरी में दूसरे का नेतृत्व स्वीकार करना पड़ रहा है। सम्राट चौधरी ने कहा कि ‘आप लोग ताकत हैं अगर हम 2015 नहीं हारते तो क्या हम गठबंधन में जाते? आज अगर हमें दूसरे का नेतृत्व कबूलना पड़ रहा है इसका मतलब ये हुआ कि हमको नीचे का बेस ठीक करना है। हम लोगों को नीचे सप्तऋषि और बूथ मैनेजमेंट, सबको ठीक करना पड़ेगा।’ हालांकि तब जेडीयू नेता और एमएलसी संजय सिंह ने कहा कि बीजेपी ने 2015 में अकेले बिहार में चुनाव लड़कर देख लिया है। सम्राट चौधरी को यह याद कर लेना चाहिए कि बीजेपी जब 2015 में अकेले लड़ी थी तो उसका हाल क्या हुआ था?

वैसे राजनीति में कुछ भी संभव है।
प्रदेश भाजपा के अंदरखाने में तो समझ बन चुकी है कि अब समय आ गया है कि उत्तर प्रदेश की तरह भाजपा नेतृत्व को अपने हाथ में ले कर गठबंधन की राजनीति करे। इसकी जड़ में समझ यह है कि नीतीश कुमार उम्र के जिस पड़ाव पर हैं उनसे आगे की राजनीति नहीं हो पाएगी। राज्य में अभी युवा नेतृत्व का बोल-बाला है। राजद में तेजस्वी यादव हैं तो लोजपा में चिराग पासवान, कांग्रेस में कन्हैया जैसे लोग राजनीति कर रहे हैं। अब तो वैसे भी नीतीश कुमार के साथ बीजेपी के युवा नेता नहीं जाना चाहते। बहरहाल अभी तो 2024 है। 2025 तक तो कोई परिवर्तन होते नहीं दिख रहा है। भाजपा की नजर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के उस बयान पर भी है, जिसमें उन्होंने कहा कि 4 जून के बाद बड़ा बदलाव होगा। भाजपा अकेले लड़ेगी यह इस बात पर भी निर्भर कार्य करता है कि 4 जून के बाद जदयू के स्वरूप में क्या कुछ परिवर्तन होता है? क्या एग्जिट पोल के बरक्स आने वाले रिजल्ट में जदयू की हार होती है तो गठबंधन का स्वरूप इस बात पर निर्भर करता है कि जदयू के रणनीतिकार हार का ठीकरा किस पर फोड़ते हैं। राजनीति की एक दिशा यहां से भी बदल सकती है। ऐसा इसलिए कि जदयू के कुछ उम्मीदवार नतीजों के पहले ही बीजेपी पर निष्क्रियता का आरोप लगा चुके हैं।

केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा : असित नाथ तिवारी
पूर्व पत्रकार और भाजपा नेता असित नाथ तिवारी का मानना है कि एग्जिट पोल अधूरा सच है। सच को अभी सामने आना बाकी है। इसलिए 2025 तक हमारे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रहेंगे। रही 2025 विधानसभा चुनाव की बात तो वो किसके नेतृत्व में लड़ा जाना है, यह तो भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा। पहले केंद्र में सत्ता का स्वरूप तो बन जाए, फिर देखा जाएगा। लेकिन तत्काल सरकार में किसी परिवर्तन की गूंज नहीं सुनाई पड़ रही है।

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