भोपाल सेन्ट्रल को-आपरेटिव बैंक की शाखा में फर्जी दस्तावेजों से बांट दिये लाखों के ऋण

भोपाल

राजधानी की भोपाल सेन्ट्रल को-आपरेटिव बैंक के आला अफसरों की जितनी तारीफ जी जाये कम है। एक बैंक के एक बैंक प्रबंधक लाखों रूपये ऋण फर्जी दस्तावेजों से ऋण बांटने का सनसनी खेज मामला सामने आया है। पहले तो एक सोसायटी के नाम से बैंक में 40 लाख सीसी लिमीट खोली गई फिर उक्त सोसायटी के कर्मचारियों को इसी संस्था से वेतन बांटा गया और इसी को आधार बनाकर ऋण स्वीकृ त कर बांट दिये गये। इनमें से ऋण पाने वालों को बैंक आज भी नहीं खोज पाई।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस मामले में जांच अधिकारी भी बैंक के आला अफसरों ने उन्हें बनाया हैं जो फर्जी ऋण बांटने वाले प्रबंधक से जूनीयर हैं या फिर कहीं न कहीं बैंक की उस यूनियन से जुड़े हैं जिससे आरोपी के गहरे संबंध हैं। यूं कहा जाये कि यह जांच अधिकारी बनने लायक ही नहीं थे।

मामला भेल क्षेत्र के शक्ति नगर शाखा का बताया जा रहा है। एक सोसायटी के नाम पर संबंधित शाखा प्रबंधक ने पहले तो 40 लाख रूपये की साख सीमा यानी लिमीट स्वीकृत की, बकायदा इस लिमिट का नवीनीकरण भी किया गया। इस सोसायटी में करीब 125 कर्मचारी होना भी दर्शाया गया, यहीं नहीं सोसायटी के कर्ता धर्ताओं ने इन कर्मचारियों का वेतन भी जमा किया, जिसे वह हर माह निकालते रहे। धीरे-धीरे उन्होंने कर्मचारियों को ऋण दिलाना शुरू कर दिया। इनमें कुछ कर्मचारी तो सही थे और ज्यादातर गलत।

सोसायटी के कर्ता धार्ताओं ने इसकी आड़ लेते हुए फर्जी दस्तावेज बनाकर बैंक में और भी खाते खुलवा लिये और लाखों का ऋण उन्हें बांट दिया गया। बाद में पता चला कि ऋ ण प्राप्त करने वाले इस संस्था के कर्मचारी ही नहीं थे। सूत्रों की माने तो करीब 100 से अधिक लोगों ने फर्जी वेतन स्लीप और अन्य फर्जी दस्तावेज देकर ऋण लेने में सफलता प्राप्त कर ली वह भी बैंक कर्मियों की मिलीभगत से।

मजेदार बात तो यह है कि भोपाल सेंट्रल को-आपरेटिव बैंक के नियमानुसार शाखा प्रबंधक को ऋण स्वीकृ त करने के अधिकार ही नहीं होते। वह तो ऋण का प्रस्ताव बनाकर बैंक के मुख्यालय में भेजता है इसके बाद मुख्यालय सभी दस्तावेजों की जांच कर ऋण स्वीकृत करता है। साफ जाहिर है कि कहीं न कहीं मुख्यालय के अफसर भी शंका के दायरे में आते हैं। यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाये तो एक बड़े रेकेट का पर्दाफाश हो सकता है।

जांच अधिकारी भी शक के दायरे में
बैंक मुख्यालय में फर्जी ऋण वितरण मामले में एक और कारनामें को अंजाम दिया। जब इस मामले की शिकायत मुख्यालय तक पहुंची तो आनन फानन में बैंक के कर्मचारी संगठन के एक ब्रांच मैनेजर और लेखापाल(कम-इंजीनियर) को जांच अधिकारी बना डाला। शक्ति नगर के जिस ब्रांच मैनेजर की शिकायत की गई है उससे जांच अधिकारी काफी जूनीयर हैं। सवाल यह खड़ा हो गया है कि क्या एक सीनियर अफसर की जांच जूनीयर अफसर कर सकते हैं और जिस बैंक संगठन से यह जांच अधिकारी जुड़े हैं उसके संरक्षक भी फर्जी ऋण घोटाले के ब्रांच मैनेजर हैं। इस मामले ऐसे एक नहीं कई सवाल मुख्यालय में चर्चाओं में हैं।

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