शीर्ष नेता के मुख्यधारा में जाने की खबर, माओवादी पार्टी में होगा बंटवारा?

विशाखापट्टनम

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के शीर्ष नेता मुपल्ला लक्ष्मणा राव उर्फ गणपति और मल्लोजुला वेणुगोपाल उर्फ सोनू के आत्मसमर्पण की खबरें इन दिनों चर्चा में हैं। हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन कहा जा रहा है कि इतने साल तक भूमिगत रहने वाले नेता अब मुख्यधारा की राजनीति करेंगे। इन अटकलों से पार्टी में विभाजन के कयास भी तेज हो गए हैं।

ऐसी खबरें हैं पार्टी में अहम पदों पर तैनात कुछ और नेता भी सरेंडर करके मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में जा सकते हैं। गणपति और वेणुगोपाल दोनों ही कथित रूप से बीमार बताए जा रहे हैं और उनकी उम्र भी अधिक हो चुकी है। ऐसे में अगर वे वाकई मुख्यधारा की राजनीति में शामिल होते हैं तो इससे पार्टी में आंतरिक कलह के आसार और विभाजन की आशंका जताई जा रही है।

माओवादी आंदोलन का चेहरा थे गणपति
पिछले तीन दशक में सीपीआई (एम) ने कई गुटों का खुद में विलय देखा है। गणपति ने ही कई पार्टियों को एक साथ मिलाकर पीपल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्युजी) में विलय किया जिसने बाद में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (एमसीसीआई) के साथ हाथ मिलाया। 2004 में यह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) कहलाई। गणपति सीपीआई (एम) में महासचिव रह चुके हैं और तीन दशक तक देश में चलाए गए माओवादी आंदोलन का मुख्य चेहरा था।

भूमिगत आंदोलन के कई नेता बीमार
स्वास्थ्य न ठीक न होने के चलते गणपति सक्रिय राजनीति से दूर हो गए । उनकी जगह 2018 में बासव राज ने ले ली जिन्होंने पार्टी में उम्रदराज नेताओं की जगह नए और युवा चेहरों के लिए रास्ता बनाया। माना जाता है कि भूमिगत आंदोलन के कई वरिष्ठ नेता अब स्वास्थ्य दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।

नेताओं के बीच मतभेद से कम हुई आंदोलन की धार
सूत्रों के मुताबिक, पीडब्ल्युजी के पुराने नेता जिनमें से अधिकतर तेलंगाना से हैं और एमसीसीआई के नेता जिनमें से अधिकतर गैर तेलंगानावासी हैं, दोनों के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद है। इस वजह से आंदोलन अपनी धार खो रहा है।

स्थानीय समर्थन न होने से मुंह के बल गिरा आंदोलन
सरेंडर करके मुख्यधारा की राजनीति में आने वाले एक पूर्व माओवादी नेता ने बताया कि स्थानीय समर्थन के अभाव से आंदोलन का प्रभाव कम हो गया है। पिछले दशक में सुरक्षाबलों ने कई वरिष्ठ नेताओं ने मार गिराया था। उन्होंने कहा कि स्थानीय समर्थन न होने से युवाओं की भी माओवादी रैंक में शामिल होने की दिलचस्पी नहीं रह गई है। नेतृत्व की रणनीतिक चूक से भी आंदोलन की धार कम हुई।

पूर्व माओवादी नेता सरेंडर करने की खबर पर नहीं यकीन
पूर्व माओवादी नेता ने गणपति और वेणुगोपाल के सरेंडर करने पर संदेह व्यक्त किया। उन्होंने कहा, ‘यह संभव नहीं है। हमसे से कोई यकीन नहीं कर सकता कि वे सरेंडर कर सकते हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन आंदोलन को दिया है। वह सरेंडर करने के बजाय पुलिस की गोली खाना पसंद करेंगे।’

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