राजनीति में बिल्कुल अलग था रघुवंश प्रसाद का अंदाज, विरोधी भी रहते थे उनके मुरीद

कहते हैं कि नेता वही जो सबका, जन प्रतिनिधि वही जो सवर्ण-दलित में भेद न करे और दोनों के विकास की न सिर्फ बात करे बल्कि वही काम भी। आज के दौर में जब किसी पार्टी सुप्रीमो के खिलाफ कई नेताओं के कंठ से आवाज तक नहीं निकलती, लोगों को पद छिन जाने का डर होता है। वैसे दौर में मैथ्स डिग्रीधारी प्रोफेसर साहब यानि रघुवंश प्रसाद सिंह का गणित बिल्कुल अलग था… मरते दम तक। तेजस्वी-तेजप्रताप को तो छोड़ ही दीजिए, वो तो लालू को भी अंतिम सांस तक खरी-खरी सुनाते रहे। रघुवंश बाबू को बिहार का अटल बिहारी वाजपेयी कहें तो कुछ गलत नहीं। ऐसा नेता जिसकी तारीफ विरोधी भी करते रहे।

पत्रकारों के लिए भी कई यादें छोड़ गए रघुवंश बाबू
रघुवंश बाबू तो चले गए लेकिन पत्रकारों के मन में भी अपनी अमिट छाप छोड़ गए। एक संस्मरण तो मेरा खुद का है… बात 2005 के इसी महीने सितंबर की है जब बिहार में RJD की सत्ता जाने के कगार पर थी। उसी वक्त पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में RJD की एक बैठक बुलाई गई थी। मैं तय वक्त पर पहुंच गया और माइक और कैमरा लिए सीढ़ियों पर इंतजार करने लगा। कई नेता गुजरे लेकिन अचानक रघुवंश बाबू पर मेरी नजर पड़ी। मैं उनके सामने आ गया और लॉ एंड ऑर्डर से जोड़ते हुए खटाक से उनसे सवाल पूछा कि ‘सर, बिहार के अफसरों को अगर नंबर देने की बात आए तो आप निजी तौर पर क्या नंबर देंगे।’

आप यकीन नहीं करेंगे कि रघुवंश बाबू ने RJD के बड़े नेताओं की मौजूदगी में एक लाइन कही और सब भौंचक्के रह गए। उन्होंने कहा कि ‘मैं तो बिहार के अफसरों को पास मार्का भी नहीं दूंगा।’ बिहारी शब्दावली में पास मार्का न देना मतलब फेल से भी बदतर होता है। मेरे लिए इतना जवाब काफी था तो कैमरा बंद कर दिया। तभी रघुवंश बाबू ने मेरे सिर पर हाथ रखा और मुझे एक बच्चे की तरह सहलाकर बोले कि अगर मैं सीधे-सीधे बिहार के लॉ एंड ऑर्डर के लिए RJD की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए भी सवाल पूछता तो उनका जवाब ठीक वही होता जो मेरे घुमाकर पूछे गए सवाल का था। रघुवंश बाबू तो उसी वक्त मुझे ये शब्द कहकर मेरी नजर में अमर हो गए।

आखिर क्यों रघुवंश बाबू बोलते थे खरी-खरी, क्यों नहीं डरते थे किसी से
1974 में जब छात्र आंदोलन जोर पकड़ चुका था तभी सीतामढ़ी के गोयनका कॉलेज के लेक्चरर को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वो समाजवादी लेक्चरर और कोई नहीं बल्कि खुद रघुवंश बाबू थे। उनके करीबी बताते हैं कि जब वो जेल से छूटे तो उनके लैंडलॉर्ड यानि मकान मालिक सीताराम सिंह ने उन्हें घर खाली करने का आदेश दे दिया। रघुवंश बाबू ने आव देखा न ताव, बगैर किसी सहारे के किराए का मकान छोड़ दिया। उनके करीबी बताते हैं कि फिर तो उनका समय गोयनका कॉलेज के हॉस्टल में बीता और वो भी छात्रों के बीच। छात्र को अगर गुरु का सानिध्य मिल जाए तो क्या बात… ऐसा ही कुछ कॉलेज स्टूडेंट्स के भी साथ था। रोजाना उनका ज्ञान मानों छात्रों के लिए अमृत बन गया, पढ़ाई के साथ-साथ कॉलेज के लड़कों को समाजवाद की खुराक भी मिलने लगी।

जात न पूछो साधु की
एक कहावत है न कि जात न पूछो साधु की। रघुवंश बाबू भी कुछ ऐसे ही थे। 1977 में जब बिहार में मुख्यमंत्री पद के लिए रघुवंश बाबू के सजातीय यानि राजपूत बिरादरी के सत्येंद्र नारायण सिंह और पिछड़े वर्ग के कर्पूरी ठाकुर के नाम की चर्चा थी तब रघुवंश बाबू ने कुछ ऐसा किया कि सब उनके मुरीद हो गए। CM चुनने के लिए जब विधायकों की वोटिंग हुई तो 33 में से 17 राजपूत विधायकों ने कर्पूरी ठाकुर के पक्ष में वोट दिया। उन 17 विधायकों में एक रघुवंश प्रसाद सिंह भी थे जिन्होंने अपनी जाति को समाजवाद के लिए ताक पर रख दिया।

मनरेगा का भी कोई क्रेडिट नहीं लिया रघुवंश बाबू ने
2009 के चुनाव में कांग्रेस किसी तरह से अपना किला बचा पाई। इसके पीछे सियासी पंडितों ने किसानों की कर्ज माफी और मनरेगा को असल मंत्र बताया। लेकिन जिस प्लान ने कांग्रेस को सत्ता बचाने में मदद की। उसमें मनरेगा का क्रेडिट रघुवंश बाबू को नहीं मिला। संजय बारू ने अपनी किताब ‘एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ में श्रेय लेने की होड़ का जिक्र करते हुए लिखा है ‘पार्टी चाहती है कि मनरेगा का पूरा क्रेडिट राहुल गांधी को दिया जाए. लेकिन आप (मनमोहन सिंह) और रघुवंश प्रसाद सिंह इसके असली हकदार हैं।’ मेरी इस बात पर वो बोले ‘मुझे कोई क्रेडिट नहीं चाहिए।’

चुनाव हारकर भी चाल,चेहरे और चरित्र की लड़ाई जीतते रहे रघुवंश बाबू
भले ही 2014 में रघुवंश प्रसाद सिंह रामा सिंह से लोकसभा चुनाव हार गए। लेकिन चाल,चरित्र और चेहरे की लड़ाई न तो उनसे विरोधी जीत पाए और न ही उनकी पार्टी के लोग। ऐसे ही थे रघुवंश बाबू।

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