ब्रह्मांड में हुई नौ सूर्यों के बराबर महाभिड़ंत, पृथ्वी पर भी पहुंची आंच

कल्पना कीजिए कि नौ सूरज अपनी ऊर्जा एक साथ छोड़ दें तो क्या होगा! ऐसी घटना हमारे ब्रह्मांड में घटी और उसकी आंच हमारी पृथ्वी ने भी महसूस की। यह आंच एक तीव्र ऊर्जा लहर अथवा ‘ग्रेविटेशनल वेव’ के रूप में आई, जो दो बड़े ब्लैक होल्स के महाविलय से उत्पन्न हुई। इस घटना के सिग्नल ने पृथ्वी पर पहुंचने के लिए सात अरब साल का सफर पूरा किया।

सिग्नल से हिल गए अमेरिका-इटली के लेजर डिटेक्टर
अरबों वर्ष का सफर तय करने के बावजूद यह सिग्नल इतना ज्यादा शक्तिशाली था कि पिछले साल अमेरिका और इटली में तैनात लेजर डिटेक्टर हिल गए। यह घटना पिछले साल 21 मई को हुई थी, जिसकी विस्तृत रिसर्च रिपोर्ट अभी हाल में ही आई है। रिसर्चरों का कहना है कि दो ब्लैक होल्स के विलय से एक बड़ा ब्लैक होल बना, जिसका द्रव्यमान सूर्य से 142 गुना ज्यादा था।

निकली नौ सूर्यों के बराबर ऊर्जा
टक्कर के दौरान करीब नौ सूर्यों के बराबर पदार्थ ऊर्जा में बदल गया। ध्यान रहे कि ब्लैक होल अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है जहां गुरुत्वाकर्षण खिंचाव इतना तगड़ा होता है कि इसमें से कोई चीज बाहर नहीं जा सकती, प्रकाश भी नहीं। बड़े तारे के मध्य भाग के ढहने से ब्लैक होल बनते हैं। कुछ ब्लैक होल्स का द्रव्यमान सूरज से अरबों गुना अधिक होता है।

चक्राकार ब्लैक होल आपस में विलय के दौरान ग्रेविटेशनल वेव पैदा करते हैं। ग्रेविटेशनल वेव अंतरिक्ष में हलचल करने वाली अदृश्य और तीव्र लहर है, जो प्रचंड ब्रह्मांडीय घटनाओं से जन्म लेती है। यह प्रकाश की गति से आगे बढ़ती है। जिन स्रोतों से इसे डिटेक्ट किया जा सकता है उनमें ब्लैक होल्स के विलय की घटनाएं और ‘न्यूट्रॉन’ तारे शामिल हैं। इन्हें प्रत्यक्ष डिटेक्ट करने की टेक्नॉलजी को विकसित करने में कई दशक लगे।

ग्रेविटेशनल वेव को डिटेक्ट करने के लिए अमेरिका में लिगो और इटली में वर्गो डिटेक्टर तैनात हैं। दोनों के सहयोग से ही इस विराट ब्लैक होल की खोज हुई है। लिगो और वर्गो के लेजर इंटरफेरोमीटर उपकरण अंतरिक्ष में उन कंपनों को सुनते हैं, जो बड़ी ब्रह्मांडीय घटनाओं से उत्पन्न होते हैं। 21 मई 2019 को उन्होंने एक तीव्र सिग्नल दर्ज किया, जिसकी अवधि एक सेकेंड के दसवें हिस्से के बराबर थी।

सूर्य से 85 गुना बड़ा ब्लैक होल सूर्य से 66 गुने बड़े ब्लैक होल में समाया
कंप्यूटर द्वारा किए गए विश्लेषण से पता चला कि सूर्य से 85 गुना बड़ा ब्लैक होल सूर्य से 66 गुने बड़े ब्लैक होल में मिला, तो यह लहर बनी। दो बड़े ब्लैक होल्स का विलय आश्चर्यजनक है लेकिन इस विलय में सूरज से 85 गुना अधिक द्रव्यमान वाले ब्लैक होल का शामिल होना ज्यादा हैरान करने वाला है क्योंकि इसे फिजिक्स के वर्तमान ज्ञान से समझ पाना मुश्किल है। खगोल वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य से 65 से 130 गुना बड़े तारे ‘पेयर इनस्टेबिलिटी’ नामक प्रक्रिया से गुजरते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप तारा छिन्न-भिन्न हो जाता है और उसका कुछ भी नहीं बचता। महाविलय में शामिल सूरज से 85 गुना वजनी सुपर ब्लैक होल भी इसी श्रेणी में आता है। सवाल यह है कि अगर यह विराट तारे के ढहने से नहीं बना तो फिर यह बना कैसे?

इस स्टडी की को-राइटर सूसन स्कॉट का कहना है कि ब्लैक होल ब्रह्मांड के वैक्यूम क्लीनर की तरह हैं। वे अपने रास्ते में आने वाली सब चीजें हजम कर जाते हैं जिनमें तारे और गैस के बादल शामिल हैं। वे दूसरे ब्लैक होल्स को भी निगल जाते हैं। इस प्रक्रिया में बड़े से बड़े ब्लैक होल का निर्माण संभव है। मुमकिन है कि 85 सौर-द्रव्यमान वाला ब्लैक होल भी कुछ इसी तरह से बना हो।

दो ब्लैक होल्स का विलय जिस समय हुआ, उस वक्त ब्रह्मांड की उम्र करीब सात अरब वर्ष थी जो कि उसकी वर्तमान उम्र की लगभग आधी है। उनके विलय से 142 सौर-द्रव्यमान वाला विराट ब्लैक होल बना। ग्रेविटेशनल वेव के पर्यवेक्षणों के दौरान पाया गया कि यह अब तक का सबसे बड़ा ब्लैक होल है। 100 से 100000 सौर-द्रव्यमान वाले ब्लैक होल ‘इंटरमीडियेट मास ब्लैक होल’ (आइएमबीएच) कहलाते हैं। ये ब्लैक होल आकाशगंगाओं के बीच में स्थित ‘सुपरमैसिव’ ब्लैक होल्स से हल्के होते हैं। हमारी मिल्की-वे आकाश गंगा में भी एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है।

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