पहले शिवसेना अब अकाली दल? बीजेपी का साथ छोडे़गा एक और पुराना साथी

नई दिल्‍ली

पहले ही शिवसेना को खो चुकी बीजेपी से एक और पुराना साथी दूर जा सकता है। कृषि विधेयकों को लेकर शिरोमणि अकाली दल (SAD) के बीजेपी से गहरे मतभेद हो गए हैं। दोनों के बीच का गठबंधन टूटना लगभग तय माना जा रहा है। 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में बीजेपी के पास वापस जाकर SAD किसानों को नाराज से बचना चाहेगी। SAD के राज्‍यसभा सांसद नरेश गुजराल के अनुसार, एक हफ्ते के भीतर गठबंधन के भविष्‍य को लेकर फैसला ले लिया जाएगा। पार्टी ने अपने कैडर से फीडबैक मांगा है।

शिवसेना छोड़ गई… SAD क्‍या करेगी?
पार्टी जल्‍द ही कोर कमिटी की बैठक बुलाकर बीजेपी संग गठबंधन पर फैसला लेगी। गुजराल ने कहा, “हमे अपने कैडर से अगले 4-5 दिन में फीडबैक मांगा है। उसके बाद कोर कमिटी की बैठक में गठबंधन पर फैसला लेंगे।” गुजराल ने याद दिलाया कि शिवसेना और अकाली दल ही बीजेपी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं जो कभी उसे छोड़कर नहीं गए, न कि नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जो गए और फिर लौट आए। उन्‍होंने कहा, “शिवसेना पहले ही उन्‍हें (बीजेपी) छोड़ चुकी है। SAD और BJP के बीच भी दूरी उभरी है।”पंजाब के मुख्‍यमंत्री कैप्‍टन अमरिंदर सिंह ने अकाली दल को चुनौती दी है कि अगर उसकी नीयत साफ है तो वह एनडीए से बाहर आकर दिखाए।

किसानों का गुस्‍सा नहीं झेलना चाहती पार्टी
पंजाब के किसानों ने 25 सितंबर को बंद बुलाया है। अकाली दल को लगता है कि किसानों का विरोध पंजाब तक सीमित न रहकर, उत्‍तर प्रदेश, मध्‍य प्रदेश और राजस्‍थान जैसे राज्‍यों तक पहुंच सकता है। अकाली दल के एक विधायक ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, “किसान इस कानून के खिलाफ कई दिन से प्रकाश सिंह बादल के घर के बाहर धरने पर बैठे हैं। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। हम यह नहीं झेल सकते वर्ना अगले चुनाव में कांग्रेस बड़ी आसानी से बाजी मार ले जाएगी। पार्टी के एक अन्‍य नेता ने याद दिलाया कि कैसे दिल्‍ली और हरियाणा में पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने अकाली दल को गठबंधन में शामिल करने से मना कर दिया था।

अपनी खोई जमीन पाना चाहता है अकाली दल
मई 1996 के संसदीय चुनावों में जब बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो अकाली दल ने ही सबसे पहले सरकार बनाने में साथ दिया था। पंजाब में दोनों पार्टियां 2007 से 1017 के बीच सरकार में रही हैं। हालांकि पंजाब में अकाली दल अपनी खोई जमीन हासिल करने की कोशिश में है। कृषि विधेयकों के विरोध में केंद्रीय मंत्री का पद छोड़कर उसने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। देखना यह है कि अलगाव में वक्‍त कितना लगता है।

कृषि बिलों पर जल्‍दबाजी में सरकार: अकाली दल
गुजराल ने कहा कि जिस तरह से कृषि विधेयकों को राज्‍यसभा के भीतर जल्‍दबाजी में पास कराया गया, उससे बड़ा गलत संदेश गया है। उन्‍होंने कहा कि बिल सिलेक्‍ट कमिटी को भेजे जाने चाहिए थे। इसमें सिर्फ दो महीने और लगे। गुजराल ने कहा, “लेकिन सरकार बड़ी जल्‍दी में थी। मैंने सरकार को संसद में चेताया था कि आग को और हवा मत दो और किसानों के गुस्‍से को समझो। हम समझ नहीं पा रहे कि सरकार किसानों को ‘फायदा’ पहुंचाने के लिए जिद क्‍यों पकड़े हुए है… जो खुद कह रहे हैं कि उन्‍हें फायदा नहीं होगा। भरोसे की कमी है।”

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