कैप्टन बनाम सिद्धू! वर्तमान और भविष्य की लीडरशीप में उलझी कांग्रेस

नई दिल्ली ,

पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके लिए कांग्रेस हाईकमान पार्टी में मचे घमासान को सुलझाने के लिए तीन दिनों से सियासी मंथन में जुटा है. नवजोत सिंह सिद्धू सहित दो दर्जन विधायक और मंत्रियों के तीन सदस्यीय कमेटी के सामने बात रखने के बाद अब बारी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की है. हालांकि, मुख्‍यमंत्री अमरिंदर सिंह और पूर्व कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच मची कलह में कांग्रेस वर्तमान और भविष्य के लीडरशिप की मंझधार में फंसी हुई है.

पंजाब की सियासत में लंबी राजनीतिक पारी खेलते आ रहे मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह सूबे में पार्टी के वर्तमान होने के साथ-साथ अब अगली पारी के लिए भी पिच तैयार कर रहे हैं. हालांकि, 2017 में कैप्टन ने कहा था कि यह उनका अंतिम चुनाव होगा, लेकिन चार साल के बाद अब वो एक और पारी खेलने का दम भर रहे हैं. कांग्रेस हाईकमान भी यह बात समझ रहा है कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर ही पार्टी का चेहरा बन चुके हैं और अगला चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा.

वहीं, बीजेपी छोड़कर 2017 चुनाव से पहले कांग्रेस का दामन थामने वाले नवजोत सिंह सिद्धू की राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है. सिद्धू को कांग्रेस के पंजाब प्रभारी हरीश रावत लगातार पार्टी का भविष्य का नेता बता रहे हैं. कांग्रेस हाईकमान के रुख से भी लगता है कि पार्टी सिद्धू को पंजाब में कांग्रेस का भविष्य का चेहरा मान रही है तभी तो उनके तमाम बातों को पार्टी नजरअंदाज करती आ रही है.

पंजाब कांग्रेस में अंतरकलह पिछले चार सालों से चली आ रही है, लेकिन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वर्चस्व की लड़ाई ज्यादा ही छिड़ गई है. ऐसे में कांग्रेस हाईकमान की ओर से गठित मल्लिकार्जुन खड़गे, जयप्रकाश अग्रवाल और हरीश रावत की उच्च स्तरीय समिति ने तीन दिनों तक पंजाब के विधायकों, सांसदों और नेताओं की बात सुनी.

ऐसे में कमेटी के सामने कांग्रेस के विधायक दो हिस्सों में बंटे नजर आ रहे हैं. एक गुट कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ खड़ा है जबकि दूसरा गुट उनके खिलाफ है. सिद्धू समेत कई अन्य नेता हैं, जो कैप्‍टन के खिलाफ विरोध के स्वर उठा रहे हैं.

कैप्टन के एक और सियासी पारी खेलने के एलान के बाद कांग्रेस के दूसरी पंक्ति के नेताओं में आगे निकलने की होड़ लग गई है. पंचायत चुनाव नतीजे के बाद ही प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने भी 2022 में कैप्टन के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया. हालांकि उनके एलान के विरोध में दूसरी पंक्ति के नेताओं में डिप्टी सीएम का दावेदार बनने की होड़ लग गई.

कांग्रेस की तीन सदस्यीय कमेटी की बैठक से पहले जिस प्रकार पंजाब के करीब एक दर्जन मंत्रियों और विधायकों को फोन किए उससे साफ है कि पार्टी पंजाब में अब दूसरी पंक्ति के नेताओं को भी तरजीह दे रही है. इनमें ज्यादातर विधायक व मंत्री वे थे जो कैप्टन के विरोधी हैं. ऐसे में सबसे ज्यादा नवजोत सिंह सिद्धू के लेकर कशमकश पार्टी में बनी हुई है कि कैसे पार्टी में उन्हें एडजस्ट कर रखा जाए.

दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव के ठीक बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन से तनातनी के बीच मंत्री पद से इस्तीफा दिया तो इसके बाद पार्टी हाईकमान लगातार उन्हें पार्टी या सरकार में एडजस्ट करने की कवायद में जुटी रही. कैप्टन अमरिंदर सिंह कैबिनेट में सिद्धू को दोबारा से कैबिनेट में लेने को तैयार थे, लेकिन उन्हें शहरी विकास मंत्रालय की जगह ऊर्जा विभाग ही देना चाहते थे.

कैप्टन किसी भी सूरत में सिद्धू को उपमुख्यमंत्री या पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाने के लिए तैयार नहीं थे. वहीं, हाईकमान हर हाल में सिद्धू का कद पंजाब में बढ़ाना चाहता है. हाईकमान मानता है कि सिद्धू न केवल भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं बल्कि कांग्रेस का भविष्य भी हो सकते हैं. पंजाब प्रभारी बनने के बाद हरीश रावत बार-बार इस बात को दोहरा रहे हैं कि कैप्टन वर्तमान के नेता हैं जबकि सिद्धू भविष्य का चेहरा हैं. इसी कशमकश में पार्टी उलझी हुई है और कांग्रेस नेताओं के बीच घमासान मचा हुआ है.

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