UP चुनाव से ऐन पहले BJP ने जितिन को यूं ही नहीं किया शामिल, जीत का ‘वोट गणित’ समझिए

लखनऊ

पूर्व केंद्रीय मंत्री और राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले नेता जितिन प्रसाद कांग्रेस छोड़कर अब बीजेपी में शामिल हो गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के बाद जहां कांग्रेस को एक और बड़ा झटका लगा है वहीं बीजेपी के लिए जितिन कितने फायदेमंद साबित होने वाले हैं, इस पर भी चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जितिन के जरिए बीजेपी की कोशिश यूपी में ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने की होगी, साथ ही उन्हें यूपी बीजेपी में बड़ी भूमिका भी मिल सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल एनबीटी ऑनलाइन से बातचीत में कहते हैं, ‘जितिन के बीजेपी में जाने से कांग्रेस में गलत संदेश जाएगा। जब आपके कुछ न हो और जो है वो भी चला जाए तो यह बड़ा नुकसान है। यूपी में कांग्रेस के जो 7 विधायक थे वह भी कम हो गए हैं। कांग्रेस के लिए यूपी में बुरी स्थिति है। पिछले 30 साल में कांग्रेस नहीं पनप पाई और अब चुनौती बढ़ती जा रही है।’

‘बीजेपी को फायदे से ज्यादा कांग्रेस का नुकसान’
बृजेश शुक्ल आगे कहते हैं, ‘जितिन का आना बीजेपी के लिए फायदे का उतना बड़ा सौदा नहीं है जितना कांग्रेस के लिए नुकसान है। बीजेपी को कितना फायदा होगा यह तो समय बताएगा। जितिन न ही 2014 में जीते थे और न ही 2019 में। हां वह जिस क्षेत्र से आते हैं वहां जरूर चुनाव को कुछ फायदा हो सकता है। इसके अलावा बीजेपी को ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए बड़ा चेहरा जरूर मिल गया है।’

‘जितिन को मिल सकता है मंत्री पद’
वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक, ‘जितिन को अगले साल विधानसभा चुनाव में टिकट मिल सकता है और अगर फिर बीजेपी की सरकार बनती है तो इन्हें कैबिनेट में जगह मिल सकती है। इसके अलावा बीजेपी इनके चेहरे का उपयोग करेगी, चुनाव प्रचार में भी इन्हें लगा सकती है। इनके सभी समर्थक भी बीजेपी के साथ जुड़ जाएंगे।’

जितिन के जरिए ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने की कोशिश
वहीं जीबी पंत इस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, प्रयागराज के प्रफेसर बद्री नारायण ने बताया, ‘जितिन प्रसाद का जाना कांग्रेस के लिए बड़ा नुकसान है, बीजेपी तो जिसे भी लाएगी फायदा ही है। बीजेपी यूपी में अपना सोशल इंजीनियरिंग गठबंधन को बढ़ाने में लगी है और जितिन के रूप में एक तरह से ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने का अवसर मिला है। योगी सरकार पर ब्राह्मणों की अनदेखी के जो आरोप लग रहे थे उसे काउंटर करने की कोशिश भी है।’

जितिन ने ब्राह्मण चेतना संवाद नाम से बनाया संगठन
बीजेपी से जुड़ने से पहले पिछले साल जितिन प्रसाद ने ब्राह्मण चेतना परिषद नाम से संगठन बनाया था। जितिन ने वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के जरिए जिले वार ब्राह्मण समाज के लोगों से संवाद किया और ब्राह्मण परिवारों से मुलाकात भी की थी।

योगी कार्यकाल में ब्राह्मणों पर हुई हिंसा को लेकर विपक्ष ने घेरा
यूपी में कुछ महीने पहले तक ब्राह्मण वर्ग की नाराजगी की चर्चा भी जोरों पर थी। कई विपक्षी दल भी ब्राह्मणों को लुभाने की सक्रिय राजनीति करने लगे थे। कांग्रेस ने योगी के कार्यकाल में ब्राह्मणों पर हुईं हिंसा के आंकड़े जारी कर सरकार को घेरा था। कुख्यात अपराधी विकास दूबे और मुख्तार अंसारी के करीबी शूटर राकेश पांडे के एनकाउंटर ने भी इस नाराजगी का गैप बढ़ाने का काम किया। दोनों ही एनकाउंटर के तरीकों पर सवाल उठे थे।

यूपी में 12 फीसदी आबादी ब्राह्मणों की
यूपी की राजनीति में देखा जाए तो ब्राह्मणों समुदाय का वर्चस्व हमेशा रहा है। यूपी में लगभग 12 फीसदी ब्राह्मण वोट बैंक है। कई विधानसभा सीटों पर ब्राह्मणों की आबादी 20 फीसदी से भी अधिक बताई जाती है। लिहाजा जीत-हार में उनकी भूमिका अहम रहती है। 2007 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने ब्राह्मण-दलित सोशल इंजिनियरिंग के जरिए अकेले दम पर 207 सीटें जीत ली थीं। ऐसे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले हर दल की नजर इस वोट बैंक पर है। समाजवादी पार्टी ने भी भगवान परशुराम की प्रतिमाएं स्थापित करने का ऐलान करके ‘ब्राह्मण कार्ड’ खेला था।

यूपी की सियासत में ब्राह्मण वोटबैंक के मायने क्या?
यूपी में ब्राह्मण पॉलिटिक्स का क्या मायने है, इसे समझने के लिए 2007 का रुख करना था। 2007 में मायावती के नेतृत्व में बीएसपी ने ब्राह्मण+दलित+मुस्लिम गठजोड़ से जीत हासिल की थी और संपूर्ण बहुमत के साथ मायावती सत्ता में आई थीं। बीएसपी ने इस चुनाव में 86 टिकट ब्राह्मणों को दिए थे। हालांकि बाद में बीएसपी से कई ब्राह्मण छिटककर बीजेपी की ओर आ गए थे। अब मौजूदा हालातों को देखते हुए यूपी में हर दल इसी तरह के समीकरण बनाने की कोशिश में है।

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