शहाबुद्दीन के बेटे और औवैसी मिलाएंगे हाथ? बिहार में सत्ता की चाबी का ये खेल बहुत बड़ा है

पटना/सिवान:

ये तो जगजाहिर हो चुका है कि शहाबुद्दीन का परिवार बड़े साहब यानि लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी से बुरी तरह नाराज है। भले ही लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब से मुलाकात की हो लेकिन दूरियां पटती हुई नहीं दिख रहीं। ताजा घटनाक्रम में ऐसा बहुत कुछ है जो सिवान से बिहार की राजनीति में नए समीकरण का इशारा दे रहा है।

ओसामा-ओवैसी की रणनीति
शनिवार को ओवैसी की पार्टी AIMIM के पांचों विधायक जब शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब से मिलने पहुंचे तो सियासी गलियारे में हलचल मच गई। बिहार में बीजेपी की बी टीम के खिताब से नवाजी जा चुकी ओवैसी की पार्टी फिलहाल न तो सत्ता के साथ है और नही विपक्ष के साथ। ऐसे में सवाल ये उठता है कि ओवैसी की पार्टी को शहाबुद्दीन के बेटे से क्या फायदा है। दरअसल ये खेल बहुत बड़ा है।
Bihar Politics: ओवैसी के 5 विधायकों ने की शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा से मुलाकात, क्या हुई बात… सियासी गलियारे में लग रहीं अटकलें

कहते हैं कि किंग से बड़ा किंग मेकर होता है। ताकत सत्ता चलाने वाले में नहीं बल्कि सत्ता की चाबी रखने वाले में होती है। इतना तो तय है कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल में अपनी पैठ न सिर्फ बनाई बल्कि 5 सीटें हासिल कर अपनी उभरती ताकत भी दिखाई। अल्पसंख्यकों को भी ओवैसी की पार्टी में अपना नया हमदर्द दिखने लगा है। लेकिन सिर्फ सीमांचल की सीटों से ओवैसी बिहार की जंग नहीं जीत सकते। जाहिर है कि पांव फैलाने जरूरी हैं। और… ऐसे में ओसामा यानि शहाबुद्दीन के बेटे उनके लिए मुफीद हैं। क्योंकि वो RJD से नाराज हैं और बीजेपी यानि NDA की तरफ जाने से रहे।

ओसामा से हमदर्दी दिखा आधार बढ़ाने की जुगत में ओवैसी
यानि ऐसे समझ लीजिए कि शहाबुद्दीन की मौत पर हमदर्दी दिखा ओवैसी की पार्टी अपना जनाधार बढ़ाने की फिराक में है। उन्हें बखूबी पता है कि सिवान और नजदीक के जिले छपरा में आज भी शहाबुद्दीन के परिवार के न सिर्फ जुबान बल्कि आंसुओं की भी जबरदस्त अहमियत है। अगर ओसामा ओवैसी के साथ हो लेते हैं तो AIMIM अल्पसंख्यकों पर अपनी पकड़ मजबूत करने का सपना थोड़े और समय तक देख सकती है।

ओसामा को भी समर्थन की जरूरत
अब बात शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब की, ओसामा ये बखूबी जानते हैं कि RJD से अलग रहकर वो सियासी जंग में बहुत कारगर साबित नहीं होंगे। क्योंकि सिवान से बाहर दूसरे जिले जैसे सीमांचल में अल्पसंख्यकों के अलग मुद्दे हैं। ऐसे में वहां के अल्पसंख्यक वोट उन्हें मिल जाएं ये पूरी तरह से पक्का नहीं कहा जा सकता। अगर ओसामा ओवैसी से हाथ मिला लेते हैं तो गैर महागठबंधन और गैर NDA से इतर उनका अपना अल्पसंख्यक वोट बैंक बन सकता है। वहीं शहाबुद्दीन की मौत के बाद कमजोर पड़े परिवार में नई जान भी आ सकती है।

ओसामा-ओवैसी के गठबंधन में कितनी ताकत की गुंजाइश?
असल मसला ये है कि अगर दोनों साथ हो भी लेते हैं तो इनके गठबंधन को अल्पसंख्यक कितना पसंद करेेंगे। पॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉक्टर संजय कुमार बताते हैं कि ओसामा को शहाबुद्दीन के नाम पर सहानुभूति मिल सकती है। लेकिन सीमांचल में दोनों के गठबंधन को पसंद करना जनता के मूड पर है। एक तरफ नाम है तो दूसरी तरफ मुद्दे हैं। जाहिर है कि इस जंग को जीतने के लिए अल्पसंख्यकों के बीच सिर्फ नाम से नहीं बल्कि काम से ही ‘काम’ बनेगा।

लेकिन जरूरी नहीं कि ये गठबंधन कारगर साबित हो। क्योंकि सिर्फ चुने हुए अल्पसंख्यक वोट बैंक के दम पर सत्ता की चाबी हासिल करने का सपना वैसे ही है जैसे जेब में एक लाख रुपये लेकर लग्जरी कार खरीदने की सोचना। मगर यकीन मान लीजिए कि अगर यह दांव हिट होता है तो आरजेडी के लिए बहुत बड़ा झटका होगा। उसका सालों पुराना MY समीकरण एक झटके में ध्वस्त हो जाएगा।

About bheldn

Check Also

कोटा में पुलिस की वर्दी फिर दागदार, निलंबित DSP पर गैंगरेप का आरोप

कोटा राजस्थान पुलिस की वर्दी पर एक बार फिर गुरुवार को बड़ा बदनामी का दाग …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *