559 गिरफ्तारियां, 10 दोषी… क्या महज पॉलिटिकल टूल है राजद्रोह कानून?

नई दिल्ली,

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दो टीवी चैनलों के खिलाफ आंध्र प्रदेश पुलिस की ओर से राजद्रोह के आरोप में कार्रवाई करने पर रोक लगा दी. 3 जून को सुप्रीम कोर्ट ने पत्रकार विनोद दुआ के खिलाफ हिमाचल प्रदेश में दर्ज राजद्रोह के मामले को खारिज कर दिया. वहीं पिछले हफ्ते लक्षद्वीप प्रशासक प्रफुल्ल पटेल की नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने पर पुलिस ने फिल्म निर्माता आयशा सुल्ताना पर राजद्रोह का मामला दर्ज कर लिया. इन घटनाओं के बाद देश में एक बार फिर राजद्रोह के खिलाफ बना कानून चर्चा में है, जो देशद्रोह कानून के नाम से ज्यादा जाना जाता है.

जानकार इसे मौजूदा दौर के हिसाब से अप्रासंगिक कानून बता रहे हैं, आंकड़े भी इसकी गवाही देते हैं. ये भी सच है कि पिछले कुछ सालों में इसका इस्तेमाल राजनीतिक वजहों से ज्यादा हुआ है.

केंद्र सरकार की एजेंसी है नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB. यह एजेंसी 2014 से 124A के तहत दर्ज हुए केस, गिरफ्तार हुए लोगों, दोषी साबित हुए आरोपियों का डेटा रख रही है. ताजा आंकड़े 2019 तक के ही हैं. एनसीआरबी का डेटा बताता है कि 2014 से 2019 के बीच 124A के तहत 326 केस दर्ज किए गए. इनमें 559 लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन महज 10 पर दोष साबित हो सका. ये दिखाता है कि राजद्रोह के कानून का किस हद तक दुरुपयोग होता है.

उम्रकैद या 3 साल की जेल
आईपीसी में धारा-124A में राजद्रोह की परिभाषा दी गई है. इसके मुताबिक, अगर कोई भी व्यक्ति सरकार के खिलाफ कुछ लिखता है या बोलता है या फिर ऐसी बातों का समर्थन भी करता है, तो उसे उम्रकैद या तीन साल की सजा हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट विराग गुप्ता कहते हैं “जब ज्यादा लोग छूट रहे हैं तो ये साबित हो जाता है कि मुकदमा गलत दायर किया गया था. गलत मुकदमे दायर इसलिए होते हैं क्योंकि गलत मुकदमे दायर करना आसान होता है और ऐसा करने पर कोई सजा भी नहीं मिलती. कानून में गलत मुकदमे दर्ज करने वाले पुलिसवालों-शिकायतकर्ताओं को सजा देने का प्रावधान है पर उनका भारत में इस्तेमाल नहीं होता. इसलिए मनमाने तरीके से एफआईआर होती है और बाद में निरस्त भी हो जाती है.”

विराग गुप्ता कहते हैं, “भारत में पटवारी और पुलिस इंस्पेक्टर ये दोनों सिविल और क्रिमिनल में प्रभावी रहते हैं. ये जो लकीर खींच देते हैं वो पत्थर की लकीर बन जाती है. उसे पलटने के लिए लोगों को हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ता है और ये प्रूफ करना पड़ता है कि ये गलत है. ये अंग्रेजों के जमाने का साम्राज्यवादी कानून है और कई स्वतंत्रता सेनानियों ने इसका विरोध किया था, तो आजाद भारत में ऐसे कानूनों की जरूरत क्या है?”

गुप्ता कहते हैं कि चाहे बंगाल हो या यूपी हो या कोई और राज्य. सभी राज्यों में रूलिंग पार्टी और पुलिस का नेक्सस बिल्कुल साफ है, इसलिए विरोधी पार्टियां राज्य की पुलिस पर भरोसा नहीं करतीं. जब देश की राजनीतिक पार्टियों को ही पुलिस पर भरोसा नहीं है तो कानूनों का दुरुपयोग होगा ही.

राजद्रोह के आरोप में ज्यादातर युवा गिरफ्तार
एक खास बात ये भी है कि पिछले 5 साल में 124A के तहत जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें से ज्यादातर 18 से 45 साल के हैं. ये बात सरकार ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताई थी. इसी साल 17 मार्च को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए युवाओं को लेकर AAP सांसद संजय सिंह ने सवाल पूछा था. इसके मुताबिक, 2015 से लेकर 2019 तक पांच सालों में 124A के तहत 445 ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनकी उम्र 45 साल से कम थी. इतना ही नहीं, 2016 में 2 और 2017 में 3 ऐसे लोगों को भी राजद्रोह के लिए गिरफ्तार किया गया, जिनकी उम्र 18 साल से भी कम थी.

बीजेपी शासित राज्यों में ज्यादातर गिरफ्तारियां
एनसीआरबी के 2019 के ही आंकड़े उठा लें तो पता चलता है कि उस साल देशभर में राजद्रोह के जितने केस दर्ज किए गए थे, उनमें से ज्यादातर बीजेपी शासित या एनडीए शासित राज्यों में दर्ज किए गए थे. सबसे ज्यादा 22 केस कर्नाटक में दर्ज हुए थे. वहां बीजेपी की सरकार है और बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री हैं. दूसरे नंबर पर असम है, जहां 17 केस दर्ज हुए थे. वहां भी बीजेपी की सरकार है और उस वक्त सर्वानंद सोनोवाल सीएम थे. तीसरे नंबर पर जम्मू-कश्मीर रहा, जहां 11 मामले दर्ज हुए थे. यहां 2019 में राष्ट्रपति शासन लगा था या ये कहें कि अप्रत्यक्ष तौर पर केंद्र की ही सरकार रही.

आखिर में बात इसके इतिहास की…
17वीं सदी में जब इंग्लैंड में सरकार और वहां के साम्राज्य के खिलाफ आवाजें उठने लगीं तो अपनी सत्ता बचाने के लिए राजद्रोह कानून लाया गया. यही कानून 1870 में अंग्रेजों के जरिए भारत में आया. 1860 में जब आईपीसी यानी इंडियन पीनल कोड लागू हुई, तब उसमें राजद्रोह कानून नहीं था, लेकिन 1870 में आईपीसी में संशोधन कर 124A को जोड़ा गया.

इसका इस्तेमाल स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने और सेनानियों को गिरफ्तार करने के लिए किया गया. महात्मा गांधी से लेकर भगत सिंह तक पर 124A लगाई गई थी. लेकिन आजादी के बाद जब भारत का अपना संविधान लागू हुआ तो भी ये धारा जारी रही.हैरानी की बात ये भी है कि जिस ब्रिटेन से ये कानून हमारे संविधान में आया, वहां ये कानून 2009 में खत्म किया जा चुका है, लेकिन भारत में ये कानून आज भी लागू है

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