हर चौथा टीबी मरीज भारतीय, 2025 तक कैसे खत्म होगी बीमारी?

नई दिल्ली,

मार्च 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘टीबी मुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत की थी. उस समय में पीएम मोदी ने कहा था कि दुनिया ने टीबी को खत्म करने के लिए 2030 का समय तय किया है, लेकिन भारत ने अपने लिए ये लक्ष्य 2025 तय किया है. भारत का लक्ष्य है कि 2025 तक देश को टीबी (Tuberculosis) मुक्त कर लिया जाए.

भारत के लिए ये ऐलान इसलिए भी अहम है क्योंकि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज भारत में ही हैं. 2025 में अब साढ़े चार साल से भी कम वक्त बचा है. ऐसे में क्या इतने कम वक्त में हजारों साल पुरानी बीमार से पीछा छुड़ा पाना संभव है? आंकड़े बताते हैं कि इस लक्ष्य को पाने में भारत को शायद और वक्त लग सकता है.

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, हर साल दुनिया में जितने टीबी के मरीज सामने आते हैं, उनमें से सबसे ज्यादा मामले भारत में होते हैं. डब्ल्यूएचओ की ‘ग्लोबल ट्यूबरकुलोसिस रिपोर्ट 2020’ की मानें तो 2019 में दुनिया में टीबी के 26% मामले भारत में सामने आए. यानी, 2019 में दुनिया में मिलने वाला टीबी का हर चौथा मरीज भारतीय था. भारत के बाद दूसरे नंबर पर इंडोनेशिया और फिर तीसरे नंबर पर चीन है.

कोरोना का असर टीबी मरीजों पर पड़ा?
देश में कोरोना संक्रमण का असर टीबी मरीजों पर भी पड़ा. ये बात सरकार ने भी मानी है. वो इसलिए क्योंकि 2020 में 2019 की तुलना में टीबी मरीजों की संख्या में करीब 25% की कमी आई है.

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी ‘एनुअल टीबी रिपोर्ट 2021’ के मुताबिक, 2020 में देश में टीबी के 18.05 लाख मामले सामने आए, जबकि 2019 में 24.03 लाख मामले सामने आए थे. इस रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा इसलिए क्योंकि पिछले साल लॉकडाउन के दो महीनों में टीबी के मामले सबसे कम दर्ज किए गए. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि लॉकडाउन और कोरोना की वजह से लोग टीबी की जांच कराने नहीं जा रहे हों.

स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट कहती है कि 2020 के शुरुआती दो महीनों यानी जनवरी और फरवरी में देश में 4.11 लाख से ज्यादा टीबी के मामले सामने आए थे. उसके बाद मार्च और अप्रैल में सिर्फ 2.53 लाख मामले ही दर्ज हुए. जबकि, मई से दिसंबर के बीच 11.41 लाख मरीज मिले.2020 में टीबी की वजह से कितने मरीजों की जान गई, इसका आंकड़ा सरकार ने अभी नहीं दिया है. लेकिन 2019 में टीबी की वजह से करीब 90 हजार लोगों की जान चली गई थी.

क्या 2025 तक पूरा हो सकेगा टारगेट?
मोदी सरकार की ओर से 2025 तक भारत को टीबी मुक्त बनाने का अभियान जोर शोर से चल रहा है. पीएम मोदी कई मौकों पर इस बात को दोहरा भी चुके हैं. लेकिन क्या ये संभव है? इस बात को अभी कहा नहीं जा सकता, लेकिन डब्ल्यूएचओ का कहना है कि 2025 तक टीबी के मामलों में कमी तभी आ सकती है जब हर साल 10% की दर से केस घटे.स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2017 में 2025 तक टीबी के खात्मे के लिए एक प्लान पेश किया था. इसमें सरकार ने 2025 तक हर एक लाख आबादी पर टीबी मरीजों की संख्या 44 सीमित करने का लक्ष्य रखा है.

डब्लूएचओ के मुताबिक, 2019 में भारत में हर एक लाख आबादी पर 193 टीबी मरीज थे. जबकि, स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि 2020 में हर एक लाख आबादी पर टीबी मरीजों की संख्या 131 हो गई. यानी, एक साल में 32% मरीज कम हो गए. ये आंकड़े अच्छे हैं, लेकिन इन पर पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि पिछले साल कोविड की वजह से भारत में टीबी के मामले भी कम सामने आए. इस वजह से हर एक लाख आबादी पर टीबी मरीजों की संख्या भी घट गई.

टीबी प्रोग्राम का बजट बढ़ा, लेकिन ज्यादा रिलीज ही नहीं हुआ
एनुअल टीबी रिपोर्ट 2021 के मुताबिक, सरकार लगातार टीबी प्रोग्राम का बजट बढ़ा रही है, लेकिन चिंता वाली बात ये है कि बजट बढ़ा तो दिया जाता है लेकिन रिलीज नहीं किया जाता. 2015-16 से 2020-21 के बीच टीबी प्रोग्राम का बजट 385% से ज्यादा बढ़ा है, लेकिन सरकार इसमें से थोड़ा बहुत ही रिलीज कर पाती है.

2020-21 में केंद्र सरकार ने टीबी प्रोग्राम के लिए 3,110 करोड़ रुपए का बजट रखा. राज्य सरकारों ने टीबी से लड़ने के लिए 3,554 करोड़ रुपए मांगे, लेकिन केंद्र की ओर से 450 करोड़ रुपए का फंड ही जारी किया गया. हर साल राज्यों की ओर से जितना फंड मांगा जाता है, उसका कुछ हिस्सा ही केंद्र जारी कर पाती है.

मोदी सरकार ने 2025 तक टीबी को देश से मिटाने का फैसला किया है, लेकिन कोविड का असर टीबी मरीजों की संख्या और उनके इलाज में भी साफ दिखा है. इसी साल मार्च में डब्ल्यूचएओ ने कहा था कि दुनियाभर में कोविड की वजह से 14 लाख से ज्यादा टीबी मरीजों को इलाज नहीं मिल सका है और इस वजह से 50 हजार से ज्यादा मौतें होने की आशंका है. डब्ल्यूएचओ ने चेतावनी देते हुए कहा था ये डेथ रेट के मामले में दुनिया को 2010 के स्तर पर ले जा सकता है.कोरोना की तरह ही टीबी भी एक संक्रामक बीमारी है, लेकिन अगर वक्त रहते इसका इलाज कराया जाए तो इससे ठीक हुआ जा सकता है.

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