अयोध्याः राम मंदिर के लिए भूमि सौदे पर विवाद, नजूल जमीन की जांच शुरू

अयोध्या,

यूपी के अयोध्या में राम मंदिर के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से किए गए कुछ भूमि सौदे सवालों के घेरे में हैं. इन सबके बीच अब रामकोट क्षेत्र में तकरीबन ढाई करोड़ रुपये में खरीदी गई जमीन के सौदे पर संकट के बादल गहराने लगे हैं. सूत्रों की मानें तो अयोध्या के जिलाधिकारी अनुज झा इस जमीन के नजूल अभिलेख की जांच पड़ताल करा रहे हैं.

बताया जाता है कि डीएम ने नजूल अमीन रमेश भारती से भी इस बारे में जानकारी ली है. गौरतलब है कि बिना फ्री होल्ड कराए हुए जमीन की रजिस्ट्री नहीं हो सकती और न ही खारिज-दाखिल.22 फरवरी 2021 को अयोध्या के महंत देवेंद्र प्रसाद आचार्य से अयोध्या के मेयर ऋषि उपाध्याय के भांजे दीप नारायण उपाध्याय ने गाटा संख्या 135 की 890 वर्गमीटर जमीन 20 लाख रुपये में खरीदी थी. 11 मई 2021 को दीप नारायण ने यही जमीन श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी.

इसी जमीन की प्रशासनिक स्तर पर जांच शुरू हो गई है. ट्रस्ट की ओर से इस जमीन का सौदा सीधे न कर बिचौलिए के माध्यम से किए जाने के आरोप भी लग रहे हैं. उसके बाद इस जमीन पर चौबुर्जी मंदिर के महंत बृज मोहन दास ने यह कहकर अपनी दावेदारी जता दी कि वे इस नजूल की जमीन के सिकमी (कब्जाशुदा) काश्तकार हैं और दशकों से उनके गुरु का जमीन पर कब्जा रहा था.

बृज मोहन दास ने दावा किया था कि इस जमीन पर वे खेती करते रहे हैं लेकिन एडीएम ने उनसे सरकारी जमीन का हवाला देते हुए जमीन खाली करने और इसे रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को देने की बात कही. राम मंदिर की बात सुन उन्होंने जमीन खाली कर राम मंदिर के लिए दे दिया लेकिन उन्हें बाद में पता चला कि इस जमीन को पहले 20 लाख में देवेंद्र प्रसाद आचार्य से खरीदा गया और तीन महीने बाद राम मंदिर ट्रस्ट को ढाई करोड़ रुपये में बेच दिया गया. जबकि वे तो ट्रस्ट के नाम पर जमीन दे चुके थे फिर लाखों से लेकर करोड़ों तक में खरीद बिक्री का क्या मतलब.

डीएम के संरक्षण में रहती है नजूल जमीन
अब नजूल जमीन की खरीद फरोख्त को लेकर शुरू हुई जांच पड़ताल ने इस जमीन को लेकर नई मुसीबत खड़ी कर दी है. ऐसा इसलिए, क्योंकि नजूल की जमीन सीधे तौर पर जिले के नजूल अधिकारी यानी एडीएम फाइनेंस और डीएम के संरक्षण में होती है और वह नजूल की कब्जा जमीन को खाली कराता है या कब्जेदार के नाम तयशुदा सरकारी मालियत के आधार पर फ्री होल्ड करता है. इसलिए नई जांच अगर हुई तो ट्रस्ट के सामने इस जमीन को लेकर एक नई मुसीबत खड़ी हो सकती है. वहीं, अगर जमीन को लेकर ऐसी कोई अनियमितता नहीं मिलती है तो ट्रस्ट को बड़ी राहत मिल जाएगी.

क्या कहते हैं कानून के जानकार
अयोध्या के वरिष्ठ सिविल अधिवक्ता रणजीत लाल वर्मा इस बारे में कहते हैं कि बगैर फ्री होल्ड हुए नजूल की जमीन की रजिस्ट्री नहीं होती. नजूल की जमीन जिसके कब्जे में होती है वह उसका मालिक नहीं होता. उस जमीन का मालिक सरकार होती है. कभी-कभी नजूल की जमीन पर मकान बना हो तो लोग नगरपालिका में मकान दर्ज कराकर उसकी रजिस्ट्री कर देते हैं. ऐसे जमीन भी बिक जाती है लेकिन यह भी वैधानिक तरीका नहीं है और नजूल अधिकारी, नजूल जमीन को लेकर कार्रवाई कर सकता है.

उन्होंने कहा कि अगर किसी खाली या खेती वाली जमीन की रजिस्ट्री होती है और ऐसे खरीद-फरोख्त की जानकारी नजूल अधिकारी या जिले के डीएम को होती है तो वह स्वतः संज्ञान ले सकता है. रणजीत लाल वर्मा ने कहा कि डीएम अगर अपनी जांच में अनियमितता पाता है तो वह जमीन की रजिस्ट्री कैंसिल करा सकता है. इसके अलावा अगर दीवानी न्यायालय में इसको लेकर कोई मुकदमा होता है तो वहां से भी ऐसा आदेश हो सकता है.Live TV

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