नीट में ओबीसी रिजर्वेशन का क्‍या है मामला? PM मोदी तक पहुंची बात

नई दिल्ली

नए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 12 जुलाई को नेशनल एलिजिबिलिटी एंड एंट्रेंस टेस्‍ट (नीट) की तारीखों का ऐलान किया। यह परीक्षा एमबीबीएस और बीडीएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए अनिवार्य है। परीक्षा राष्‍ट्रीय स्‍तर पर होती है। हालांकि, इस साल की घोषणा में भी एक बात साफ है। इसमें कहा गया है कि इस बार भी यह नेशनल एग्‍जाम अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण मानदंडों को लागू किए बिना ही होगा। इसके तहत ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण की सीमा तय है। इसी के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया। नीट में ओबीसी के लिए सरकार की ओर से आरक्षण नहीं लागू किए जाने के विरोध में आवाज बुलंद होने लगी। कई छात्र संगठन इसे लेकर देशव्‍यापी हड़ताल की धमकी भी चुके हैं।

मेडिकल एंट्रेंस टेस्‍ट नीट में ओबीसी का ऑल इंडिया कोटा लागू करने को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल और भूपेंद्र यादव ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ज्ञापन भी सौंपा। तमाम अभ्‍यर्थी मेडिकल एजुकेशन के अखिल भारतीय कोटे में ओबीसी आरक्षण देने की लंबे समय से मांग कर रहे हैं। देश की विभिन्‍न अदालतों में कई मुकदमे भी हुए हैं। लेकिन, यह मामला लंबे समय से लटका है। आखिर यह मामला क्‍या है, सरकार का इसे लेकर क्‍या रुख है, कहां पेच फंसा है? आइए, यहां इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं।मेडिकल एंट्रेस टेस्‍ट नीट में ओबीसी का ऑल इंडिया कोटा लागू करने को लेकर केंद्रीय राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल और भूपेंद्र यादव ने बुधवार को प्रधानमंत्री को ज्ञापन दिया।

क्‍या है मामला?
देश में नीट के जरिये चिकित्सा शिक्षा में दाखिले होते हैं। इस परीक्षा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के लोगों को आरक्षण मिलता है। लेकिन, परीक्षा में ओबीसी आरक्षण न दिए जाने को लेकर सवाल उठते रहे हैं। दरअसल, 1979 में जनता पार्टी सरकार ने सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के मुद्दों को लेकर एक आयोग गठित किया था। इस आयोग का मुखिया सांसद बीपी मंडल को बनाया गया था।

मंडल ने तर्क दिया था कि ओबीसी देश की पूरी आबादी में करीब 52 फीसदी हैं। यह वर्ग अभाव का सामना करता रहा है। आयोग ने केंद्र सरकार की नौकरियों और इस वर्ग के लिए उसके शैक्षणिक संस्थानों में सीटों में 27 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की थी। केंद्र सरकार के तहत नौकरियों में आरक्षण 1992 में शुरू हो गया। लेकिन, ओबीसी से जुड़े छात्रों को एडमिशन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में इस वर्ग के लिए आरक्षण की पुष्टि इस शर्त के साथ की कि उम्मीदवारों के परिवारों की कमाई सालाना 8 लाख रुपये से अधिक न हो।

हालांकि, जिन संस्‍थानों को राज्य सरकारें चलाती हैं, उनमें अलग से निर्धारित अखिल भारतीय कोटा सीटों में 27 फीसदी आरक्षण लागू करना मुश्किल रहा है। राज्य सरकारों के चिकित्सा संस्थानों में ओबीसी आरक्षण को समझने के लिए 1984 में सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को समझना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या कहा था?
शीर्ष अदालत के निर्देश में कहा गया था कि सभी राज्यों को ग्रेजुएशन में मेडिकल और डेंटल कॉलेजों में 15 फीसदी सीटें और पोस्‍ट ग्रेजुएशन में 50 फीसदी सीटों को सेंट्रल पूल के लिए रखना होगा। बाकी सीटें स्‍टेट पूल में जाएंगी। स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) की ओर से काउंसलिंग के बाद छात्रों को केंद्रीय पूल में सीटें दी जाती हैं।

लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एक और ऑर्डर
एक और कानूनी लड़ाई के बाद 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि राज्य अपने पूल में भी अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए क्रमशः 15 फीसदी और 7.5 फीसदी सीटों के साथ आरक्षण मानदंडों को लागू कर सकते हैं। ऑर्डर में ओबीसी का कोई जिक्र नहीं था। बाद में भारतीय चिकित्सा परिषद ने 2010 में मेडिकल और डेंटल कोर्सों में प्रवेश के लिए राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के साथ अपने नियमों को लागू किया। 2017 में ‘नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस्‍ट टेस्‍ट’ को पूरी तरह से लागू किया गया।

क्‍या है सरकार की मंशा?
हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑल इंडिया मेडिकल एजुकेशन कोर्ट में ओबीसी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के आरक्षण के मुद्दे की समीक्षा की। साथ ही संबंधित मंत्रालयों को इसे प्राथमिकता के आधार पर हल करने का निर्देश दिया। एक सूत्र ने बताया कि समीक्षा बैठक में प्रधानमंत्री ने इच्छा व्यक्त की कि चिकित्सा शिक्षा के अखिल भारतीय कोटा (एआईक्यू) में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा संबंधित मंत्रालयों की ओर से प्राथमिकता के आधार पर हल किया जाए। पीएम ने स्वास्थ्य मंत्रालय से चिकित्सा शिक्षा के लिए विभिन्न राज्यों की ओर से ईडब्ल्यूएस आरक्षण के कार्यान्वयन की स्थिति की समीक्षा करने को भी कहा। इस बैठक में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री मनसुख मंडाविया, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, कानून एवं न्याय और समाज कल्याण सचिवों के साथ-साथ अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हुए। बैठक में दो कोटे के मुद्दे पर चर्चा की गई।

पीएम से ओबीसी सांसदों के प्रतिनिधमंडल ने मुलाकात की
एनडीए के ओबीसी सांसदों के एक प्रतिनिधमंडल ने बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। उसने अखिल भारतीय चिकित्सा शिक्षा कोटे में ओबीसी और आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण लागू करने की मांग की। इस प्रतिनिधिमंडल में भाजपा के भूपेंद्र यादव, गणेश सिंह, सुरेद्र सिंह नागर और अपना दल (सोनेलाल) की अनुप्रिया पटेल शामिल थे। प्रतिनिधिमंडल ने प्रधानमंत्री को एक पत्र सौंपा और अंडरग्रेजुएट और पोस्टग्रेजुएट चिकित्सा पाठ्यक्रमों में ‘ऑल इंडिया कोटा’ में ओबीसी और आर्थिक रूप से पिछड़े (ईडब्ल्यूएस) वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आरक्षण लागू करने की मांग की।

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