जब चंबल के डाकू ने रोका नेहरू का रास्‍ता, बोला- सुराज के काज में हमारी भेंट स्‍वीकार करें

लखनऊ

वह साल था 1937… पूरे देश में एक अलग जोश था। उपनिवेशवादी अंग्रेज सरकार भारतीयों को प्रांतीय शासन के प्रबंध का अधिकार देने पर राजी हो गई थी। इसकी व्‍यवस्‍था ब्रिटिश संसद के 1935 के अधिनियम में की गई थी। जनता को दूर क्षितिज पर आजादी की लाल‍िमा दिखाई देने लगी थी। आखिर पहली बार देश में चुनाव कराए जाने थे। इस गहमागहमी के बीच जवाहर लाल नेहरू संयुक्‍त प्रांत, मध्‍य प्रांत में दौरे पर दौरे क रहे थे।

चुनाव से पहले ऐसी ही एक उमस भरी शाम थी। जवाहर लाल नेहरू संयुक्‍त प्रांत के दौर पर थे। उन दिनों नेहरू जीप में चला करते थे। उनकी जीप चंबल के बीहड़ों से होकर गुजर रही थी। बीहड़ तो चंबल के आज भी हैं लेकिन नाममात्र के। आज हर जगह पक्‍की सड़कें हैं, नदियों के पुल हैं लेकिन 1937 में ऐसा न था।

पगडंडी नुमा सड़कें थीं जो कब बीहड़ों में गुम हो जाती थीं पता ही नहीं चलता था। बीहड़ भी घनी कंटीली झाड़‍ियों वाले। इन बीहड़ों में रहते थे चंबल के डाकू जो खुद को बागी कहलाना पसंद करते थे। इनमें से अधिकांश व्‍यवस्‍था के सताए लोग थे जो गुट बनाकर समाज के धनीवर्ग से पैसों की उगाही करते थे। बताते हैं कि इसके बावजूद भी उनके कुछ उसूल थे, वे कमजोर को नहीं सताते थे और कहीं अगर डाका डालना हो तो पहले से उसकी जानकारी दे देते थे।

सूदखोर साहूकार जानते थे कि पूरे गांव में बसने वाले न‍िरीह ग्रामीण उनकी अपेक्षा इन बागियों के ज्‍यादा करीब थे। इसलिए गांव में सुरक्ष‍ित रहकर कारोबार करना है तो बागियों और जनता के बीच तालमेल बैठाकर चलना- यही उनकी एकमात्र व्‍यापार नीति थी। ये बागी अंग्रेज पुलिस से भिड़ने में नहीं कतराते थे और उनके असलहे लूट ले जाते थे। इनमें से कई के सिर पर हजारों के इनाम थे। रॉबिनहुड की छवि के बावजूद साधारण जनता इन‍ बागियों से भय ही खाती थी।

नेहरू जी की जीप इन्‍हीं बागियों के गढ़ के बीच ऊंची-नीची डगर पर हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ रही थी। शाम का धुंधलका हो गया था कि अचानक ड्राइवर ने झटके से गाड़ी रोक दी। सामने पतली सी सड़क पर आठ-दस लोग खड़े थे। नेहरू जी ने चौंक कर ऊपर देखा। उन्‍होंने गाड़ी बंद करने का इशारा किया।

जब तक वह कुछ समझ पाते कि कंटीली झाड़‍ियों के पीछे से किसी ने जोर से पुकारा, ‘को है रे … मौड़ाओ?'(कौन है लड़को?) सड़क रोके खड़े उन लोगों में से एक ने जवाब दिया, ‘है कोऊ सेठिया’ ( कोई सेठ लगता है)। यह सुनकर झाड़‍ियों के पीछे से एक साढ़े छ: फिट का मजबूत शरीर का शख्‍स बाहर आया। … जीप में सवार लोग समझ चुके थे कि उन्‍हें कोई अमीर सेठ समझकर चंबल के डकैतों ने रोक लिया है।

इस असमंजस को तोड़ते हुए नेहरू जीप से फौरन उतरे और उस ऊंचे कद के शख्‍स के पास पहुंचकर बोले, ‘हां… बोलो… मैं हूं जवाहर लाल।’ झींगुरों की झनझनाट से गूंजता बीहड़ कुछ देर के लिए मानो और शांत हो गया। जो शख्‍स तनकर नेहरू के सामने खड़ा था, उसके सख्‍त काले चेहरे पर चमक रही आंखें कुछ झुक सी गईं जैसे शर्मिंदा हो गया हो। नेहरू बोले, ‘जल्‍दी बोलो क्‍या काम है? हमें दूर जाना है।’

बागियों के उस सरदार ने अपने कोट की जेब में हाथ डालकर मुट्ठी भर नोट निकाले और नेहरू के सामने हाथ फैला दिया। उसके मुंह से बस इतना ही न‍िकला, ‘बहुत नाम सुना था आपका, आज दर्शन हो गए। सुराज के काज के लिए हमारी छोटी सी भेंट।’

अगले दिन आस पास गांवों में यह कहानी गूंज रही थी कि नेहरू जी बागियों से मिलने बीहड़ में आए थे और वादा कर गए हैं कि देश को आजादी मिल कर ही रहेगी। फिरंगी सात समंदर पार अपने मुल्‍क लौट जाएंगे। आज आजादी के इतने बरस हो गए हैं नेता आज भी हैं, डाकू भी हैं, चुनावों की भागदौड़ आज भी है लेकिन यह वाकया आज भी अपनी रंगत बरकरार रखे हुए है।

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