ममता का खुला अटैक पर कांग्रेस चुप… किस पसोपेश में देश की सबसे पुरानी पार्टी?

नई दिल्‍ली

कांग्रेस बड़े मझधार में फंस गई है। देश की सबसे पुरानी पार्टी को झटके पर झटके देने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को वह साथ लेकर चलने को मजबूर है। संसद के शीतकालीन सत्र से ठीक पहले टीएमसी ने कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया है। ममता के जहर की कड़वाहट कांग्रेस के गले नहीं उतर रही है। लेकिन, वह लाचार है। दुहाई विपक्ष के नाम पर एकजुटता की है। हालांकि, बंगाल की सीएम ने इसे लेकर कोई लिहाज नहीं किया है। वह खुलकर कांग्रेस को बुरा-भला और विपक्ष का नेतृत्‍व करने में असमर्थ बता चुकी हैं।

मेघालय में कांग्रेस के 17 में से 12 विधायक गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा भी शामिल हैं। पूर्वोत्तर राज्य में कांग्रेस के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है। इससे पहले कांग्रेस नेता कीर्ति आजाद और हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए थे। कांग्रेस की पृष्ठभूमि वाले कई अन्य नेता पिछले कुछ महीनों में तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए हैं। इनमें पार्टी के पूर्व सांसद सुष्मिता देव, लुईजिन्हो फालेरियो और अभिजीत मुखर्जी प्रमुख हैं।

बीते कुछ समय में कांग्रेस को टीएमसी ने जितने झटके दिए हैं, उतना नुकसान तो सत्‍तारूढ़ दल बीजेपी ने भी उसका नहीं किया है। टीएमसी की मार से कांग्रेस बिलबिलाई हुई है। पर, अफसोस कुछ कर नहीं सकती है। बीजेपी को सत्‍ता से बेदखल करने के लिए वह हर तरह का ‘बलिदान’ देने को तैयार है।

क्‍यों खून का घूंट पीकर बैठी है कांग्रेस?
इसे कुछ-कुछ गुरुवार को कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी के आधिकारिक आवास पर बुलाई गई बैठक से समझा जा सकता है। इस बैठक में संसद के आगामी सत्र में बीजेपी को घेरने की तैयारियों के साथ टीएमसी की चोट का मुद्दा हावी रहा। बैठक से पहले, बाद में और इसके दौरान रह-रहकर कई कांग्रेसियों का गुस्‍सा टीएमसी पर उबाल मारता रहा। लेकिन, कई प्रमुख राज्‍यों में अगले साल चुनाव से पहले विपक्ष में बिखराव का मैसेज न चला जाए, इसे देखते हुए कांग्रेस खून का घूंट पीकर बैठी है।

बताया जाता है कि इस बैठक के दौरान कई कांग्रेसियों ने सवाल भी उठाया कि जो पार्टी कांग्रेस को ही कमजोर करने में लगी है, उसे आखिर साथ क्‍यों लिया जाए? इस पर कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी का जवाब साफ था। उन्‍होंने कहा कि संसद में जनहित और देशहित सर्वोपरि है। पार्टी के वरिष्‍ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी सभी विपक्षी दलों को साथ लेकर चलने की बात कही। लेकिन, उन्‍होंने इस बैठक से पहले टीएमसी की सेंधमारी पर यह भी कहा था कि यह एक साजिश के तहत हो रहा है। कांग्रेस प्रवक्ता गौरव वल्लभ ने भी इसे साजिश ही बताया था। उन्‍होंने कहा था कि इसका मकसद कांग्रेस को कमजोर करना और भाजपा को मजबूत करना है। तृणमूल कांग्रेस वही कर रही है।

ममता का कांग्रेस पर खुला वार
वहीं, ममता बनर्जी इसे लेकर कोई लिहाज करती नहीं दिख रही हैं। उन्‍हें जो लगता है, वह साफ कह भी रही हैं और कर भी रही हैं। बंगाल में भाजपा को पटखनी देने के बाद से ही ममता बनर्जी आक्रामक हैं। भवानीपुर उपचुनाव में रिकॉर्डतोड़ मतों से जीत ने उनके मनोबल को और बढ़ा दिया है। ममता राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को घेरना चाहती हैं। यूं कहें कि मुख्य विपक्षी पार्टी की जगह लेना चाहती हैं। वह इसके लिए तोड़फोड़ भी कर रही हैं। हर बार दिल्‍ली आने पर कांग्रेस अध्‍यक्ष से मिलने वाली ममता बनर्जी ने इस बार वह भी नहीं किया। यानी ममता के इरादे साफ हैं।

ममता किसी भी हाल में अब बंगाल में सिमटकर नहीं रह जाना चाहती हैं। वह तृणमूल कांग्रेस को नेशनल लेवल पर ले जाना चाहती हैं। हाल में इसे लेकर ममता ने पार्टी के मुखपत्र ‘जागो बांग्‍ला’ में एक लेख भी लिखा था। इसमें उन्‍होंने साफ कहा था कि भाजपा को सत्‍ता से हटाने की कांग्रेस के बस की बात नहीं है। यह काम सिर्फ तृणमूल कांग्रेस कर सकती है। उन्‍होंने यह भी कहा था कि कांग्रेस ने दो लोकसभा चुनाव में लोगों का विश्‍वास तोड़ा है। भाजपा के खिलाफ लड़ने में वह पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। यह बात अब साबित हो चुकी है। पूरे देश ने अब टीएमसी से आस लगा ली है।

कांग्रेस के पास क्‍या नहीं है विकल्‍प?
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कांग्रेस टीएमसी का इतना लिहाज क्‍यों कर रही है? वह खुलकर क्‍यों नहीं बोल पा रही है? क्‍या उसके पास वाकई कोई विकल्‍प नहीं है? इन सवालों का जवाब एक है। वह है ‘मौके की नजाकत’। कांग्रेस टीएमसी की हर चाल को खूब समझ भी रही है और उसे दीदी के इरादों का इल्‍म भी है। पूर्व की यूपीए सरकारों में टीएमसी उसके घटक दलों में रही है। वह ममता और उनकी राजनीति को बहुत बारीकी से समझती है।

हालांकि, अभी कुछ करने और कहने का मुफीद समय नहीं है। कांग्रेस ने टीएमसी की तरह उतना ही तगड़ा पलटवार किया तो उसे भी पता है कि पहले से ही कमजोर और बिखरे विपक्ष को और नुकसान होगा। कांग्रेस के एजेंडे में अभी सिर्फ एक ही चीज है। वह है बीजेपी को 2024 के आम चुनाव में सत्‍ता से बेदखल करना।

ऐसा तभी मुमकिन है जब विपक्ष को हर कीमत पर साथ रखा जाए। जरा सी भी खेमेबाजी का सीधे-सीधे बीजेपी को फायदा होगा। फिर कई राज्‍यों में अगले साल चुनाव भी हैं। यहां भी कांग्रेस अपनी खोई जमीन को कुछ हद तक वापस पाना चाहती है। ऐसे में विपक्ष में खुला बिखराव हुआ तो बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोलने में धार कमजोर पड़ेगी। तीन कृषि कानूनों की वापसी में उसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। इन कानूनों की वापसी के बाद कांग्रेस का मनोबल बढ़ा हुआ है। ऐसे में वह बैठ बैठाए बीजेपी को कोई मौका नहीं देना चाहती है।

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