पांच कदम जो बता रहे हैं चुनावों में फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं अखिलेश यादव

नई दिल्ली ,

उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव चुनावी रणभूमि में उतर चुके हैं. एक तरफ जहां जाति आधार वाली छोटी पार्टियों से हाथ मिलाकर सियासी समीकरण को मजूबत किया तो वहीं दूसरे दलों से जनाधार वाले नेताओं की एंट्री के लिए सपा के दरवाजे खोल दिए हैं. इतना ही नहीं पश्चिम यूपी में जाट-मुस्लिम कम्बिनेशन को मजबूत करने के लिए जयंत चौधरी को भी अपने साथ मिला लिया है. ऐसे में अखिलेश के पांच कदम जो बता रहे हैं कि कैसे 2022 के चुनाव में फ्रंटफुट पर खेल रहे हैं और बीजेपी बनाम सपा के बीच मुकाबले को कड़ा करने में जुटे हैं.

1. छोटे दलों के साथ बड़ा गठबंधन
सपा प्रमुख अखिलेश यादव 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बसपा की बजाय जाति आधार वाली छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन कर रहे हैं, जिनकी ओबीसी जातियों पर पकड़ है. पूर्वांचल में राजभर, कुर्मी और नोनिया समाज के वोटों को साधे रखने के लिए अखिलेश यादव ने ओम प्रकाश राजभर की भारतीय सुहेलदेव पार्टी, संजय चौहान की जनवादी पार्टी और कृष्णा पटेल की अपना दल के साथ गठबंधन किया है.

रुहेलखंड और बृज के इलाके में मौर्य, कुशवाहा, शाक्य और सैनी वोटों को जोड़ने के लिए केशव देव मौर्य की महान दल के साथ गठबंधन किया जबकि पश्चिम यूपी में जाट समाज के वोटों के लिए जयंत चौधरी की आरएलडी के साथ हाथ मिला रखा है. इसके अलावा भी तमाम छोटी पार्टियां हैं, जिनके साथ चुनावी तालमेल कर रखा है. अखिलेश यादव इस बार 40 फीसदी वोटों को हासिल करने के लिए काम कर रहे हैं, जिसके लिए तमाम छोटे-छोटे दलों को अपने साथ मिला लिया. इस फॉर्मूले पर बीजेपी 2017 में 15 साल के बाद सत्ता में वापसी करने में कामयाब रही थी.

2. दूसरे दल के नेताओं की एंट्री
2022 के चुनाव से ठीक पहले अखिलेश यादव ने दूसरे दलों के नेताओं की एंट्री के लिए सपा के दरवाजे खोल दिए हैं. बसपा और कांग्रेस के मजबूत जनाधार वाले तमाम नेताओं को अखिलेश अपने साथ मिलाने में कामयाब रहे हैं. रामअचल राजभर से लेकर लालजी वर्मा, आरएस कुशवाहा, कादिर राणा, त्रिभुवन दत्त, केके गौतम जैसे बसपा के बड़े नेताओं को अपने साथ मिलाया.

वहीं, सलीम शेरवानी, अन्नू टंडन, राजाराम पाल हरेंद्र मलिक, चौधरी बीरेंद्र सिंह और आरएके चौधरी जैसे नेताओं को भी अपने साथ लिया है. पिछले तीन महीनों में अखिलेश ने विपक्षी दलों के करीब दो सौ बड़े नेताओं की सपा में एंट्री कराई है. इस तरह अखिलेश यह संदेश देने में सफल रहे हैं कि बीजेपी का विकल्प सपा ही बन सकती है. इतना ही नहीं सीतापुर से बीजेपी के मौजूदा विधायक को भी सपा में शामिल कर लिया है. हालांकि, सपा के विधायक सुभाष पासी और चार एमएलसी हाल ही में अखिलेश की साइकिल से उतरकर बीजेपी में शामिल हुए हैं.

3. सहयोगी दलों के साथ अभियान तेज
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा होने में भले ही तीन महीने बाकी हों, लेकिन अखिलेश यादव अभी से ही अपने सहयोगी दलों के साथ रैलियां कर चुनावी हवा बनाने में जुट गए हैं. गाजीपुर और मऊ में ओम प्रकाश राजभर की भारतीय सुहेलदेव समाज पार्टी की रैली के मंच पर अखिलेश यादव हुंकार भरते दिखे तो लखनऊ में डा. संजय चौहान की जनवादी सोशलिस्ट पार्टी की जनक्रांति महारैली को संबोधित किया.

वहीं, अब 7 दिसंबर को पश्चिम यूपी के मेरठ में अखिलेश यादव आरएलडी के अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ चुनावी अभियान की शुरुआत करेंगे. इतना ही नहीं महान दल के केशव देव मौर्य के साथ भी मैनपुरी और लखनऊ में सपा प्रमुख कार्यक्रम कर चुके हैं. अखिलेश यादव सहयोगी दलों के नेताओं के साथ मंच शेयर सपा और सहयोगी दल के कार्यकर्ताओं में बेहतर तालमेल बनाने की है ताकि चुनाव में एक दूसरे के वोट आसानी से ट्रांसफर हो सकें.

4 जाट-मुस्लिम कैंबिनेशन मजबूत किया
पश्चिम यूपी की सियासत में जाट और मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल का खेल बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखते हैं. 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे से जाट और मुस्लिम एक दूसरे के खिलाफ हुए तो बीजेपी ने पश्चिम यूपी में विपक्ष का सफाया कर दिया. किसान आंदोलन के चलते जाट-मुस्लिम एक साथ आए हैं, जिन्हें साधने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने जाट समाज के नेता और आरएलडी के अध्यक्ष जयंत चौधरी के साथ गठबंधन किया. इस तरह से पश्चिम यूपी में जाट-मुस्लिम कम्बिनेशन को मजबूत करते दिख रहे हैं, जो पश्चिमी यूपी में बीजेपी के लिए सियासी राह में रोड़ा बन गई है.

5. शिवपाल-ओवैसी को अहमियत नहीं
सपा प्रमुख अखिलेश यादव 2022 के चुनाव में बहुत सधी हुई सियासी चाल चल रहे हैं. बीजेपी को किसी तरह से ध्रुवीकरण करने का मौका वो नहीं दे रहे हैं. इतना ही नहीं बीजेपी को सपा पर यादव और मुस्लिम परस्त होने के आरोपों से भी बचाने में अभी तक सफल दिख रहे हैं, जिसके चलते अभी तक न तो अपने चाचा शिवपाल यादव को अहमियत दे रहे हैं और न ही असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को तवज्जो.

अखिलेश यह बात अच्छे से समझ गए हैं कि 2022 के चुनाव में सपा बनाम बीजेपी की लड़ाई में यादव और मुस्लिम को वोटर कहीं नहीं जा रहा है. इसीलिए शिवपाल के लाख कहने के बाद भी अखिलेश ने उनकी पार्टी के साथ किसी तरह का कोई समझौता नहीं किया. हालांकि, बस इतना कहते जरूर दिखे हैं कि सत्ता में आने पर चाचा को पूरा सम्मान दिया जाएगा जबकि ओवैसी को लेकर किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं. इतना ही नहीं अखिलेश अपने मंच पर भी मुस्लिम नेताओं के साथ दूरी बनाकर रख रहे हैं. इस तरह अखिलेश 2022 के चुनाव में बीजेपी के खिलाफ मजबूती के साथ फ्रंटफुट पर खड़े नजर आ रहे हैं.

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