जीवन का सबसे बड़ा नुकसान क्या, उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला ने बताया

नई दिल्ली

देश के दिग्गज उद्योगपति और आदित्य बिड़ला ग्रुप के मालिक कुमार मंगलम बिड़ला के लिए जीवन का सबसे बड़ा नुकसान हिंदुस्तान जिंक का नियंत्रण अपने हाथ में नहीं ले पाना है। आदित्य बिड़ला हिंदुस्तान जिंक को खरीदने में विफल रहे और साल 2002 में इसे वेदांता ने खरीद लिया था।साल 2002 में हिंदुस्तान जिंक का निजीकरण किया गया था। यह दुनिया में जिंक की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है। बिड़ला ने कहा कि वह हिंदुस्तान जिंक को खरीदने में विफल रहे। बिड़ला ने कहा, “हिंदुस्तान जिंक के पास कुछ इन्वेंटरी थी जिसकी गणना नहीं की जा सकी और इस वजह से उनके हाथ से हिंदुस्तान जिंक निकल गया।”

अगले दशक में ग्रोथ
बिड़ला ने कहा कि आने वाला दशक केपैक्स महोत्सव होगा। उन्होंने कहा कि अगले दशक में कैपिटल एक्सपेंडिचर पर कंपनियों की ग्रोथ निर्भर करेगी। आदित्य बिड़ला ने कहा है कि प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां अपनी कैपेसिटी बढ़ाने में जुटी हैं और इस वजह से उन्हें कैपेक्स को रिवाइव करने का मौका मिल रहा है।

साल 2002 में Hindustan जिंक बिकी
सरकार ने साल 2002 में हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड  में 26 फीसदी हिस्सेदारी 445 करोड़ रुपये में वेदांता ग्रुप की सहयोगी कंपनी स्टरलाइट को बेच दी थी। आरोप है कि इसकी असल कीमत 39,000 करोड़ रुपये थी। उस समय देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं।

विवादों में हिंदुस्तान जिंक
साल 2002 में विनिवेश  में कथित अनियमितताओं के बावजूद प्रारंभिक जांच बंद कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को मामले जांच करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा, “इसके लिए पर्याप्त सामग्री है। सीबीआई को रेग्युलर केस रजिस्टर करने का आदेश दिया जाता है।” सीबीआई को समय-समय पर इस मामले में हुई प्रगति से अदालत को अवगत कराना होगा। कोर्ट ने साथ ही सरकार को हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में अपनी बाकी 29.5 फीसदी हिस्सेदारी बेचने की अनुमति दे दी। साल 2012 में यूपीए सरकार ने इसे बेचने का फैसला किया था।

साल 2014 में अपील दायर
2014 में सेंट्रल पब्लिक सेक्टर एंटरप्राइजेज यानी CPSE ने कोर्ट में एक अपील दायर की थी। इस अपील में कहा गया था कि साल 2002 में जब हिंदुस्तान जिंक का विनिवेश किया गया था, तब इसके शेयर की कीमत कम आंकी गई थी।

कब-कब हुई बिक्री
केंद्र ने सबसे पहले 1991-92 में हिंदुस्तान जिंक में 24.08 फीसदी हिस्सेदारी बेची थी जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे। अप्रैल 2002 में सरकार ने कंपनी में 26 फीसदी हिस्सेदारी 445 करोड़ रुपये में स्टलाइट को बेच दी थी। स्टरलाइट ने 20 फीसदी हिस्सेदारी ओपन मार्केट से खरीदकर अपनी हिस्सेदारी 46 फीसदी पहुंचा दी थी।

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