नूपुर शर्मा विवाद: आलोचना से परे नहीं है सुप्रीम कोर्ट के जज का संवैधानिक पद

नई दिल्ली

संवैधानिक अदालतों के जजों की निष्ठा सिर्फ और सिर्फ भारतीय संविधान के प्रति है ताकि देश में कानून का शासन कायम रखा जा सके। इस बात पर जोर देते हुए सुप्रीम कोर्ट के सबसे नए जज जस्टिस जमशेद बुरजोर पारदीवाला ने रविवार को एक साफ-सुथरा लेकिन कड़वा भाषण दिया। उनके लंबे भाषण के दौरान ऐसा लगा कि वो नूपुर शर्मा की याचिका पर जरूरत से ज्यादा की गई टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर हुई अपनी घनघोर आलोचना का जवाब दे रहे थे। नूपुर शर्मा ने पैगंबर विवाद में अपने खिलाफ देशभर में दर्ज हुए अलग-अलग मुकदमों को एक साथ करने की गुहार सुप्रीम कोर्ट से लगाई थी। उनकी अपील थी कि चूंकि उन्हें बलात्कार और जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, इसलिए मुकदमों को फेस करने के लिए यहां-वहां का यात्रा करना उनके लिए खतरे से खाली नहीं होगा।

जस्टिस पारदीवाला ने क्या-क्या कहा, जानें
जस्टिस पारदीवाला ने कानून के शासन और जजों के दायित्वों पर विद्वतापूर्ण संबोधन के जरिए लोगों को यह संदेश देने का प्रयास किया कि ‘जनता की आवाज, भगवान की आवाज है’- यह चुनावों से इतर लोकतंत्र में कहीं और काम नहीं कर सकता। उन्होंने कहा, ‘एक तरफ बहुसंख्यक आबादी के हितों को साधना और दूसरी तरफ कानून के शासन की धाक बनाए रखना कठिन काम है। इसके लिए रस्सी पर चलने जैसी बेहद कौशलपूर्ण न्यायिक समझ की जरूरत होती है। लोग क्या कहेंगे, क्या सोचेंगे- यह ऐसी धारणा है जो प्रत्येक जज के मन में सामाजिक महत्व के मुद्दों पर फैसला लिखते वक्त उमड़ती रहती है। तब अपने दायित्व के प्रति दृढ़ता, संवैधानिक मूल्यों के प्रति आपकी निष्ठा और कानून के शासन का इकबाल कायम रखने की प्रतिबद्धता ही जज को सही न्याय देने को प्रेरित करता है।’

क्या कोई नूपुर पर जस्टिस पारदीवाला की टिप्पणी से कोई सहमत होगा?
ज्यादातर लोग जस्टिस पारदीवाला की इस बात से भी सहमत होंगे कि जजों को उनके फैसलों के लिए व्यक्तिगत हमले का निशाना नहीं बनाना चाहिए, भले ही किसी के नजरिए से वह फैसला कानूनी मानदंडों पर खरा नहीं उतरता हो या उसमें कोई और कमी हो। लेकिन क्या उदयपुर के कन्हैया लाल की निर्मम हत्या का जिम्मेदार नूपुर शर्मा के उस कथित ईशनिंदा वाले बयान को बताकर भी पारदीवाला ने सही किया जिसे मौलाना ही कुरान का हिस्सा बताते हैं? क्या पारदीवाला को यह टिप्पणी करनी भी चाहिए थी? क्या फैसला देते वक्त यह टिप्पणी करने की जरूरत भी थी? इतना तो निश्चित है कि ‘सर तन से जुदा’ की हत्या पर ऐसी टिप्पणी ‘कानून का शासन’ कायम रखने में जजों की भूमिका को आगे तो बिल्कुल नहीं बढ़ाता है। संवैधानिक न्यायालयों की अवधारणा को छोड़ दें तो भी मजिस्ट्रेट का संवैधानिक दायित्व होता है कि वह आरोपी के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करे और निष्पक्ष सुनवाई हो, यह भी आरोपी का संवैधानिक अधिकार है।

पूर्वग्रह से ग्रस्त या FIR से इतर टिप्पणियां उचित नहीं
संवैधानिक अदालत का एक सर्वोच्च दायित्व यह है कि वह आरोपी के प्रति पूर्वग्रह से ग्रस्त होकर ऐसी टिप्पणियां नहीं करे जिसका एफआईआर में जिक्र नहीं हो। और अगर इस दायित्व को नजरअंदाज करते हुए किसी जज ने अवांछित टिप्पणियां की हैं तो क्या इसकी सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से आलोचना नहीं होनी चाहिए? क्या संविधान आम जनता को सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज की बिल्कुल अनुचित टिप्पणियों या साफ तौर से गलत फैसलों की आलोचना करने से रोकता है?

जस्टिस पारदीवाला सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचे, यह भी तो जानें
जस्टिस पारदीवाला ने स्वतंत्र न्यायापालिका की ऐसी स्वप्नलोकी अवधारणा बताई जो कार्यपालिका से बिल्कुल कटी-छंटी हो। इस परिप्रेक्ष्य में पारदीवाला की सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में नियुक्ति की ही बात कर ली जाए। वो गुजरात हाई कोर्ट में तीसरे और देशभर उच्च न्यायालयों के जजों के वरिष्ठता क्रम में 49वें पायदान पर थे। अचानक सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में उनके नाम की चर्चा हुई और 5 मई को घोषणा भी हो गई।

कानून का शासन और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति की परिपाटी तो यह कहती है कि पारदीवाला से जितने जज वरिष्ठ हैं, उनके नामों पर विचार पहले होना चाहिए था। लेकिन पारदीवाला को उनसे पांच से आठ वर्ष तक वरिष्ठ कई जजों की योग्यता को दरकिनार करके सुप्रीम कोर्ट लाया गया। सोचिए, जस्टिस पारदीवाला के सामने अगर किसी सरकारी अधिकारी की याचिका आई होती जिसमें वह अपने से आठ वर्ष जूनियर के प्रमोशन के खिलाफ शिकायत की होती तो वो क्या फैसला देते? कानून का शासन सिर्फ भाषण का विषय नहीं हो सकता है। इसके डीएनए में स्टील की नसें और शानदार दिमाग होना चाहिए।

तब कहां गया कानून का शासन?
जस्टिस पारदीवाला की सुप्रीम कोर्ट जज के रूप में नियुक्ति को लेकर एक और गजब चीज हुई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सरकार पर कॉलेजियम के सुझावों को लंबे समय तक लटकाने का आरोप मढ़ते रहते हैं, लेकिन क्या गजब की बात है कि पारदीवाला की नियुक्ति को सरकार ने तीन दिन में ही हरी झंडी दे दी। उन्होंने 9 मई को पद की शपथ ली। क्या कोई आम जनता को समझा पाएगा कि जब कोविड के कारण उच्च न्यायालयों में जजों के पद वर्षों से खाली हैं, तब पारदीवाला की सुप्रीम कोर्ट में सुपरसोनिक स्पीड से नियुक्ति के पीछे क्या राज है?

यहां लोगों की आवाज का कोई मायने नहीं है। आम जनता के पास जजों की नियुक्ति पर सवाल उठाने का अधिकार ही कहां है? उन्हें यह अधिकार मिलना भी नहीं चाहिए, लेकिन उन्हें इतना तो आश्वासन मिलना ही चाहिए कि किसी जज की सर्वोच्च न्यायालय में त्वरित नियुक्ति करते हुए कानून का शासन, परिपाटी और परंपरा को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। क्या कार्यपालिका सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पर दबाव बनाती है, यह सवाल देश की सर्वोच्च अदालत के गलियारों में उठता रहता है।

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