स्‍मृति, निशंक के अधूरे काम को पूरा करेंगे धर्मेंद्र प्रधान, इतिहास बदलने की बढ़ती मांग के बीच शिक्षा मंत्री का आश्वासन

नई दिल्‍ली

शिक्षा व्‍यवस्‍था में बड़े बदलाव की तैयारी है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसके लिए कमर कस ली है। राष्‍ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP) के जरिये इसे अमलीजामा पहनाया जाएगा। धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा व्‍यवस्‍था में आमूलचूल बदलाव की पैरवी की है। वह मानते हैं कि यह भारतीय मूल्‍यों पर आधारित होनी चाहिए। इसमें ‘स्‍टूडेंट-फर्स्‍ट’ की सोच होनी चाहिए। धर्मेंद्र प्रधान का यह आश्‍वासन इतिहास बदलने की बढ़ती बहस के बीच आया है। उनके पूर्ववर्ती रमेश पोखरियाल निशंक और स्‍मृति ईरानी ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाए थे। लेकिन, जमीन पर ये महसूस नहीं हुए। धर्मेंद्र प्रधान ने इसका बीड़ा उठाया है। हाल में एनसीईआरटी की किताबों में कई बदलाव हुए हैं। ‘आधारहीन’ इतिहास पढ़ाने के लिए एनसीईआरटी पर सवाल भी उठ चुके हैं।

वाराणसी में तीन दिवसीय अखिल भारतीय शिक्षा समागम के समापन समारोह पर धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा व्‍यवस्‍था में बदलाव के संकेत दिए। उन्‍होंने ऐसी शिक्षा व्‍यवस्‍था बनाने पर जोर दिया जो भविष्‍य के लिए संभावनाएं खोलती हो। जो भारतीय मूल्‍यों पर आधारित हो। जो स्‍टूडेंट-फर्स्‍ट के सिद्धांत पर काम करती हो। धर्मेंद्र प्रधान ने देशभर में शिक्षाविदों से इसमें अपना सहयोग देने की अपील की है। धर्मेंद्र प्रधान की भारत को एक सशक्‍त ज्ञान से लबरेज मुल्‍क के तौर पर देखने की इच्‍छा है।

प्रधान ने इस दौरान नई शिक्षा नीति का जिक्र कर आगे का रोडमैप भी पेश किया। उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में ऐसे कई कंपोनेंट हैं जो एजुकेशन सिस्‍टम में मील का पत्‍थर साबित हो सकते हैं। इनमें मल्‍टी-मोडल एजुकेशन, अकैडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट्स, मल्‍टीपल एंट्री-एग्जिट और स्किल डेवलपमेंट शामिल हैं। वह मानते हैं कि नौजवानों को जॉब खोजने वाला नहीं रोजगार पैदा करने वाला बनना होगा।

इतिहास पर उठते रहे हैं सवाल
धमेंद्र प्रधान ने साफ संकेत दे दिए हैं कि आगे शिक्षा व्‍यवस्‍था में बड़े स्‍तर पर बदलाव देखने को मिल सकता है। शिक्षा मंत्री का यह आवश्‍वासन ऐसे समय में आया है जब देशभर में इतिहास बदलने की बहस ने जोर पकड़ रखा है। यहां तक एनसीईआरटी की किताबों में कई बदलाव भी हुए हैं। यह बदलाव 2014 में एनडीए सरकार के सत्‍ता में आने के बाद से ही शुरू हो गया था। किताबों में आक्रांताओं और मुगलों के इतिहास का बखान करने वाले चैप्‍टरों को रिवाइज किया गया है। हाल में अपने नए सिलेबस में सीबीएसई ने कक्षा 10 की समाज विज्ञान की पुस्तक से पाकिस्तानी शायर फैज अहमद फैज की शायरी और 11वीं की इतिहास पुस्तक से इस्लाम की स्थापना, उसके उदय और विस्तार की कहानी को हटा दिया। इसी तरह 12वीं की किताब से मुगल साम्राज्य के शासन-प्रशासन पर एक अध्याय में बदलाव किया गया।

खुद एनसीईआरटी सवालों के घेरे में चुका है। कुछ समय पहले इतिहासकार विक्रम संपत ने इसे लेकर बड़ा आरोप लगाया था। उन्‍होंने कहा था कि NCERT की किताबों में हिंदुओं के इतिहास को दबाया गया। संपत ने कई खामियां गिनाई थीं। उन्‍होंने इसके लिए 7वीं क्‍लास की हिस्‍ट्री बुक का हवाला दिया था। उन्‍होंने कहा था कि इसमें चोल साम्राज्‍य को 3 पन्‍नों में निपटा दिया गया। दिल्‍ली सल्‍तनत के लिए एक पूरा चैप्‍टर है। चैप्‍टर 4 पूरी तरह से मुगल साम्राज्‍य को समर्पित है। चैप्‍टर 5 में भी मुस्लिम शासकों की बनवाई इमारतों को तरजीह दी गई है। मुगलों के हाथों 1662 में अहोम की हार का जिक्र है। लेकिन, 1671 में हुई सरायघाट की लड़ाई का जिक्र नहीं है। भक्ति और सूफी आंदोलन को लेकर दिए गए ब्‍योरे को भी उन्‍होंने कटघरे में खड़ा किया था। इस बहस ने जल्‍द ही बड़ा रूप ले लिया था। इसके बाद कई इतिहासकारों ने एनसीईआरटी की किताबों के पन्‍ने शेयर करते हुए उनमें कमियां गिनाई थीं।

तब बगले झांकने लगा था एनसीईआरटी
कुछ समय पहले शिवांक वर्मा ने एनसीईआरटी से आरटीआई के जरिये कुछ जानकारी मांगी थी। यह मुगलशासकों की तरफ से युद्ध के दौरान मंदिरों को ढहाए जाने और बाद में उनकी मरम्मत कराए जाने को लेकर थी। 12वीं की हिस्ट्री की किताब में थीम्स ऑफ इंडियन हिस्ट्री पार्ट-टू में इसका जिक्र है। सवाल का जवाब देने की बजाय एनसीआरटी ने दो टूक शब्दों में कह दिया था कि विभाग के पास मांगी गई जानकारी के संबंध में फाइल में कोई सूचना उपलब्ध नहीं है। इसके बाद सवाल उठने लगे थे। सवाल ये उठे थे कि क्या एनसीईआरटी की हिस्ट्री बुक्स में आधारहीन इतिहास पढ़ाया जा रहा है। आरटीआई में एक सवाल था कि औरंगजेब और शाहजहां ने कितने मंदिरों की मरम्मत कराई थी। यह मामला मीडिया में भी सुर्खियां बना था।

बीजेपी कहां दे रही है जोर?
धर्मेंद्र प्रधान से पहले स्मृति ईरानी और रमेश पोखरियाल निशंक भी भारतीय सांस्‍कृतिक मूल्‍यों की रोशनी में इतिहास और शिक्षा व्‍यवस्‍था को बदलने की कोशिश कर चुके हैं। अपने-अपने स्‍तर पर दोनों ने इस दिशा में कदम भी बढ़ाए। यह और बात है कि इन कदमों का असर जमीनी स्‍तर पर महसूस नहीं हुआ। बीजेपी सरकार इस बात को कहती रही है कि मुगल विदेशी आक्रांता थे। भारतीय वीरों के शौर्य के बजाय किताबों को पढ़ने पर लगता है कि वे आक्रांताओं की गौरवगाथा बता रही हों। वह इसमें उसी के अनुसार बदलाव की पक्षधर रही है।

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