शेर पर मचा शोर! अशोक स्तंभ के डिजाइन पर विपक्ष ने उठाए सवाल, सरकार का पलटवार

नई दिल्ली,

नया संसद भवन…विशालकाय अशोक स्तंभ. इसका अनावरण सोमवार को जितने जोरदार अंदाज में किया गया, उस पर विवाद भी अब उतना ही जोरदार देखने को मिल रहा है. नए संसद भवन पर जो अशोक स्तंभ लगा है- उसमें लगे शेर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इतिहास से छेडछाड की गई है और अशोक स्तंभ के शेर को बदला गया है.विपक्ष का आरोप है कि हमारे राष्ट्रीय चिन्ह में जो शेर हैं वो शांत है और उसका मुंह बंद है जबकि नए संसद भवन में लगे अशोक स्तंभ का शेर आक्रामक और उसका मुंह खुला है.

अशोक स्तंभ को लेकर विपक्ष के क्या आरोप?
पीएम मोदी ने नए संसद भवन की छत पर विशालकाय अशोक स्तंभ का अनावरण किया तो विपक्ष ने सवालों और आरोपों की पूरी लिस्ट तैयार कर डाली. सबसे ताजा आरोप ये कि इतिहास से छेड़छाड़ की गई और सवाल ये कि अशोक स्तंभ में जो शेर है वो बदल क्यों दिया. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने ट्वीट जिसमें कुछ लिखा तो नहीं बस दो शेरों की तस्वीरें लगा दी. इसमें दाईं ओर दिख रहा शेर वो है जो नए संसद भवन की छत पर लगे अशोक स्तंभ में है. ट्वीट में बाईं ओर महुआ ने जिस शेर को लगाया है वो पारंपरिक अशोक स्तंभ पर दिखाई देता है. महुआ ने अपने दूसरे ट्विट में लिखा-सच बोलना चाहिए. काफी पहले ही सत्यमेव जयते सही मायने में सिंहमेव जयते में बदल चुका है.

महुआ मोइत्रा के आरोपों को बीजेपी ने ये कहकर खारिज कर दिया कि उन्हें सवाल खड़े करने की आदत है. बीजेपी की दलील जो भी हो. लेकिन देश के जाने माने इतिहासकार इरफान हबीब भी ये कह रहे हैं कि नए संसद संसद भवन पर लगे अशोक स्तंभ का शेर गुस्से मे है. उसका मुंह खुला है जबकि ऐतिहासक अशोक स्तंभ का शेर बेहत शांत है.

इस बीच विशालकाय अशोक स्तंभ में लगे शेर को लेकर सियासत भी फुल स्पीड में है. सियासत ऐसी कि आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और बीजेपी के कपिल मिश्रा की सोशल मीडिया पर भिडंत हो गई. संजय सिंह ने ट्वीट किया कि मैं 130 करोड़ भारतवासियों से पूछना चाहता हूँ राष्ट्रीय चिन्ह बदलने वालों को ‘राष्ट्र विरोधी’ बोलना चाहिये की नही बोलना चाहिये.

संजय सिंह के ट्विट पर कपिल मिश्रा ने भी जवाब दिया. उन्होंने लिखा कि संजय सिंह जी, भगवंत मान जी वाली दवाई पीकर ट्वीट मत किया कीजिये, आप झेल नहीं पाते. अशोक चिन्ह के शेर को आदमखोर कह कर आप केवल खुद की बची खुची इज्जत का केजरीवाल बनवा रहे हो. अशोक चिन्ह के शेर को आदमखोर कह कर आप केवल खुद की बची खुची इज्जत का केजरीवाल बनवा रहे हो.

अनावरण पर पीएम की मौजूदगी पर क्यों बवाल?
शेर वाले विवाद से पहले ये विवाद खडा हुआ था कि अशोक स्तंभ का अनावरण प्रधानमंत्री ने क्यों किया. AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने उस अनावरण के दौरान पीएम मोदी की मौजूदगी पर सवाल उठा दिए थे. उन्होंने इसे संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन बता दिया. उन्होंने कहा था कि संविधान संसद, सरकार और न्यायपालिका की शक्तियों को अलग करता है. सरकार के प्रमुख के रूप में, प्रधानमंत्री मोदी को नए संसद भवन के ऊपर राष्ट्रीय प्रतीक का अनावरण नहीं करना चाहिए था. लोकसभा का अध्यक्ष लोकसभा का प्रतिनिधित्व करता है जो सरकार के अधीनस्थ नहीं है. प्रधानमंत्री ने सभी संवैधानिक मानदंडों का उल्लंघन किया है.

उधर, कांग्रेस ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि जब संसद सारी पार्टियों का है तो संसद से जुड़े कार्यक्रम में दूसरी पार्टियों को न्योता क्यों नहीं दिया गया. CPM की तरफ से भी इस पूरे विवाद पर एक ट्वीट किया गया. उनके मुताबिक पीएम ने अनावरण के दौरान पूजा-पाठ किया, जो ठीक नहीं था. लेकिन अब विपक्ष के तमाम आरोपों पर केंद्रीय मंत्रियों से लेकर बीजेपी के प्रवक्ता तक सभी जवाब दे रहे हैं.

सरकार ने क्या तर्क दिया, कैसे किया बचाव?
अमित मालवीय ने विपक्ष की समझ पर सवाल उठाते हुए लिखा कि नए संसद भवन में जो अशोक स्तंभ रखा गया है, वो पूरी तरह सारनाथ वाले मॉडल से ही प्रेरित है. उसमें किसी तरह का कोई बदलाव नहीं किया गया है. विपक्ष ने एक प्रिंट हुआ 2डी मॉडल देखा था, अब वो उसकी तुलना इस 3डी आकृति से कर रहे हैं. ये लोग पूरी तरह भटक चुके हैं. वहीं स्मृति ईरानी ने भी इस विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि जिन लोगों ने संविधान तोड़ा, वे अशोक स्तंभ का क्या कहेंगे. जो मां काली का सम्मान नहीं कर सकते, वे अशोक स्तंभ का क्या करेंगे. मूर्तिकार ने अपनी तरफ से कुछ भी नहीं बदला है.

केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने एक ट्वीट कर विपक्ष को समझाने का प्रयास किया है. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि अगर जिस सारनाथ मॉडल से प्रेरित होकर ये अशोक स्तंभ बनाया गया है, इसके आकार में बदलाव नहीं किया जाता तो इतनी ऊंचाई से ये किसी को नहीं दिखने वाला था. इन एक्सपर्ट को ये भी समझना चाहिए कि असल सारनाथ ग्राउंड लेवल पर स्थित है, लेकिन ये नया और विशालकाय अशोक स्तंभ है, ये जमीन से 33 मीटर की ऊंचाई पर है.

अब उन तमाम सवालों के जवाब जानने के लिए आजतक ने मूर्तिकार सुनील देवरे से खास बातचीत की है. जब सुनील से शेरों के मुंह ज्यादा खुले होने पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने इसे नकारते हुए बताया कि हमे एक स्पष्ट ब्रीफ दिया गया था. इस विशालकाय अशोक स्तंभ बनाने में हमे 9 महीने के करीब लग गए. सरकार से कोई हमे सीधा कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिला था. हमने किसी के कहने पर कोई बदलाव नहीं किया है. सारनाथ में मौजूद स्तंभ का ही ये कॉपी है.

अशोक स्तंभ का इतिहास क्या है?
वैसे इस विवाद से इतर अशोक स्तंभ का अपना एक अनोखा इतिहास है, इसकी अहम पहचान है. भारत सिर्फ एक महान लोकतंत्र नहीं है बल्कि इसके पास एक महान विरासत भी है. अशोक स्तंभ को भी पूरी दुनिया उसी नजरिए से देखती है, उसी वजह से इतना सम्मान देती है. संवैधानिक रूप से भारत सरकार ने 26 जनवरी, 1950 को राष्ट्रीय चिन्ह के तौर पर अशोक स्तंभ को अपनाया था क्योंकि इसे शासन…संस्कृति और शांति का सबसे बड़ा प्रतीक माना गया था.

अब 1950 में तो अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय चिन्ह माना गया, लेकिन इसकी कल्पना तो हजारों साल पहले सम्राट अशोक द्वारा ही कर दी गई थी. सम्राट अशोक की राजनीति और इस अशोक स्तंभ का एक गहरा नाता रहा है. इसे समझने के लिए आपको 273 ईसा पूर्व के कालखंड में चलना होगा जब भारत वर्ष में मौर्य वंश के तीसरे राजा….सम्राट अशोक का शासन था. ये वो दौर था जब सम्राट अशोक को एक क्रूर शासक माना जाता था लेकिन कंलिंग युद्ध में हुए नरसंहार को देखकर सम्राट अशोक को बहुत आघात लगा और वो राजपाट त्यागकर बौद्ध धर्म की शरण में चले गये. इसके बाद बौद्ध धर्म के प्रचार में सम्राट अशोक ने देशभर में इसके प्रतीकों के रूप में चारों दिशाओं में गर्जना करते चार शेरों की आकृति वाले स्तंभ का निर्माण करवाया. शेरों को शामिल करने के पीछे ये प्रमाण मिलता है कि भगवान बुद्ध को सिंह का पर्याय माना जाता है…बुद्ध के सौ नामों में से शाक्य सिंह, नर सिंह नाम का उल्लेख मिलता है.

वैसे अशोक स्तंभ से जुड़ा एक और तथ्य हैरान भी करता है और रोमांच भी पैदा करता है. अगर आपने कभी अशोक स्तंभ को करीब से देखा होगा तो उसमें कहने को कुल चार शेर होते हैं, लेकिन हर बार दिखते सिर्फ तीन हैं. गोलाकार आकृति की वजह किसी भी दिशा से देखने के बाद भी एक शेर दिखाई नहीं देता है. अशोक स्तंभ के नीचे एक सांड और एक घोड़े की आकृति दिखाई देती है. इन दोनों आकृतियों के बीच में एक चक्र भी है जिसे हमारे राष्ट्रीय ध्वज में शामिल किया गया है. इसके अलावा अशोक स्तंभ के नीचे सत्यमेव जयते लिखा गया है जो मुण्डकोपनिषद का सूत्र है. इसका अर्थ है ‘सत्य की ही विजय होती है’.

अशोक स्तंभ से जुड़े कायदे-कानून
वैसे इतिहास और अहमियत के अलावा इस अशोक स्तंभ को लेकर कुछ नियम कानून भी बनाए गए हैं. उनका पालन होना हर बार जरूरी है. ऐसा नहीं होने पर जेल से लेकर जुर्माना तक, कुछ भी हो सकता है. अशोक स्तंभ का इस्तेमाल सिर्फ़ ….संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्ति कर सकते हैं.. इसमें भारत के राष्ट्रपति..उप राष्ट्रपति…प्रधानमंत्री..केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, उप राज्यपाल, न्यायपालिका और सरकारी संस्थाओं के उच्च अधिकारी शामिल हैं. लेकिन रिटायर होने के बाद कोई भी पूर्व अधिकारी पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद या विधायक बिना अधिकार के इस राष्ट्रीय चिन्ह का इस्तेमाल नहीं कर सकते. आपको बता दें कि देश में जब राष्ट्रीय चिन्हों के दुरुपयोग का प्रचलन बढऩे लगा तो इसे रोकने के लिए विशेष कानून बनाने की जरूरत पड़ी. भारतीय राष्ट्रीय चिन्ह (दुरुपयोग की रोकथाम) एक्ट 2005 बनाया गया जिसे 2007 में अपडेट किया गया.भारतीय राष्ट्रीय चिन्ह (दुरुपयोग की रोकथाम) एक्ट के तहत अगर कोई आम नागरिक अशोक स्तंभ का इस्तेमाल करता है तो उसे 2 वर्ष की कैद और 5000 रुपए तक का जुर्माना हो सकता है.

 

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