सारनाथ की रेप्लिका पर इतना हंगामा, कभी मौर्यकालीन सांड को ही उठाकर लगा दिया गया था राष्ट्रपति भवन में

नई दिल्ली

सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनने वाली नई संसद भवन की छत पर लगी राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न अशोक स्तंभ की रेप्लिका को लेकर विवाद मचा हुआ है। विवाद है रेप्लिका में बने चारों शेरों की भावभंगिमा पर। विपक्ष का आरोप है कि सारनाथ के मूल अशोक स्तंभ के शेर सौम्य हैं लेकिन रेप्लिका में बने शेर गुस्सैल, आक्रामक और डरावने हैं। आलोचक इसे राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न से छेड़छाड़ बता रहे हैं जबकि सरकार ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। रेप्लिका बनाने वाले सुनील देवड़ा ने भी आरोपों को बेबुनियाद बताया है। ताजा विवाद के बीच आइए जानते हैं सम्राट अशोक के ही बनवाए एक और मशहूर स्तंभ रामपुरवा की कहानी। पीएम मोदी तो जो नई संसद बनवा रहे हैं, उसकी छत पर सारनाथ अशोक स्तंभ की नकल लगाई गई है लेकिन संसद भवन के बगल में स्थित राष्ट्रपति भवन में तो सीधे-सीधे अशोक की बनवाई एक मूल मूर्ति ही लगा दी गई। कहानी रामपुरवा सांड की जिसका निर्माण ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में हुआ था।

राष्ट्रपति भवन में रेप्लिका नहीं, ऑरिजिनल रामपुरवा बुल
राष्ट्रपति भवन के मुख्य प्रवेश द्वार (फोरकोर्ट एंट्रेंस) पर सेन्ट्रल पिलर्स के बीच में एक तख्त पर रामपुरवा बुल लगाया गया है। यह कोई प्रतिकृति नहीं बल्कि मौर्य काल में बनवाई गई मूल मूर्ति है। यह मौर्यकालीन कला के कुछ सबसे शानदार नमूनों में से एक है। अशोक के काल में जितने भी शीर्ष यानी Capitals (Capital आर्किटेक्चर का एक टर्म है जिसका मतलब है किसी स्तंभ का सबसे ऊपरी हिस्सा, कॉलम का टोपमोस्ट हिस्सा) बने हैं, उनमें बुल कैपिटल सबसे मशहूर मूर्तियों में से एक माना जाता है। ये पॉलिस किए हुए बलुआ पत्थर से बना हुआ है। इसका निर्माण ईसा पूर्व तीसरी सदी में हुआ था। इसका वजन 5 टन है। रामपुरवा बुल अशोक स्तंभों में मिले 7 एनिमल कैपिटल्स (ऐसे स्तंभ जिनके शीर्ष पर जानवर बने हुए हों) में से एक हैं।

रामपुरवा नाम क्यों पड़ा?
राष्ट्रपति भवन में स्थापित इस मूर्ति का नाम उस जगह पर पड़ा है, जहां खुदाई में ये मिला था। दरअसल, 1907 में बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के रामपुरवा नाम के ऐतिहासिक गांव में पुरातात्विक खुदाई के दौरान मौर्यकालीन 2 कैपिटल्स मिले थे। एक लॉयन कैपिटल था तो दूसरा बुल कैपिटल। रामपुरवा नाम के गांव में मिलने की वजह से इन्हें क्रमशः रामपुरवा लॉयन कैपिटल और रामपुरवा बुल कैपिटल कहा जाता है। रामपुरवा गांव नेपाल सीमा के नजदीक है।रामपुरवा लॉयन कैपिटल को कोलकाता के इंडियन म्यूजियम में रखा गया है। इसका चेहरा खंडित हो चुका है। रामपुरवा शेर बैठने की मुद्रा में है। उसके अगले दोनों पैर सीधे हैं और पीछे के दोनों पैर बैठने की मुद्रा में मुड़े हुए हैं।

रामपुरवा की ऐतिहासिकता
रामपुरवा ऐतिहासिक गांव है। कहा जाता है कि जब राजकुमार सिद्धार्थ ने घर छोड़ने का फैसला किया तो उन्होंने अनोमा नदी के किनारे इसी गांव में अपना मुंडन कराया था। मुंडन कराने के बाद राजकुमार सिद्धार्थ ने संन्यासी का वेश धारण किया और अपने सार्थी छन्दक और प्रिय घोड़े कंथक को वहीं से लौटा दिया। ज्ञान प्राप्ति के बाद राजकुमार सिद्धार्थ ही गौतम बुद्ध कहलाए।

रामपुरवा बुल की खास बातें
रामपुरवा बुल का आधार एक घंटी के आकार का है। आधार के रूप में उल्टा कमल बना हुआ है। शीर्ष पर ये शानदार बैल है। शीर्षफलक के चारों और पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां बनीं हुई हैं। बुल को बहुत ही करीने से बनाया गया है। इसकी त्वचा बहुत मुलायम प्रतीत होती है। संवेदनशील नथूने, कोमल त्वचा, सचेत कान, मजबूत टांग…रामपुरवा बुल शानदार के साथ ही जानदार भी दिखता है। यह भारतीय शिल्प कला का एक उत्कृष्ट नमूना है, मास्टरपीस है। ये अत्यंत सूक्ष्म और विशुद्ध नक्काशी का शानदार उदाहरण है। इसका स्पर्श मखमली अहसास देता है। रामपुरवा बुल का वजह 5 टन तक है।

राष्ट्रपति भवन में रामपुरवा बुल लगाए जाने के पीछे की कहानी
1947-48 में लंदन के बर्लिंगटन हाउस में हुई इंडियन आर्ट की महा प्रदर्शनी में जो कलाकृतियां शामिल हुईं, उनमें रामपुरवा बुल भी शामिल था। 1948 में इसके वहां से वापस दिल्ली आने के बाद इसे राष्ट्रपति भवन में कलाप्रेमियों के देखने के लिए अस्थायी तौर पर रख लिया गया।

1960 में जनपथ पर नैशनल म्यूजियम बिल्डिंग तैयार होने के पर रामपुरवा बुल को राष्ट्रपति भवन से वहां शिफ्ट किया जाना था। लेकिन, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद और प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने फैसला लिया था कि इस अनमोल कलाकृति को किसी म्यूजियम में भेजने के बजाय राष्ट्रपति भवन में ही रखा जाएगा।

नेहरू ने बुल को सेंट्रल एशियन एंटिकिटीज म्यूजियम में भेजे जाने का किया था विरोध
राष्ट्रपति भवन में रामपुरवा बुल को स्थापित करने के लिए जगह के तौर पर दो स्थानों पर विचार किया गया। पहला- दरबार हाल का एंट्रेंस और दूसरा फोरकोर्ट। एक सुझाव ये आया कि फोरकोर्ट के एंट्रेस के पास बाहर इस बुल को एक छतरी के नीचे स्थापित किया जाए ताकि धूप और बारिश से इसे नुकसान न पहुंचे। ये सुझाव भी आया कि बुल को सेंट्रल एशियन एंटिकिटीज म्यूजियम में शिफ्ट कर देना चाहिए। लेकिन पंडित नेहरू ने 13 जनवरी 1952 को इसके खिलाफ पत्र लिखा, ‘मैं इस बुल को जनता के देखने के लिए प्रमुखता से प्रदर्शित करना चाहूंगा। मुझे इसे एशियन एंटीक्वीटीज म्यूजियम के अंधेरे में इसे दफन करने का विचार पसंद नहीं है।’ उन्होंने यह भी कहा कि वे इस ऐतिहासिक टुकड़े को किसी भी प्रकार की क्षति नहीं होने देना चाहते क्योंकि, ‘यह बहुत अमूल्य और कीमती है।’

1948 से ही राष्ट्रपति भवन का हिस्सा है रामपुरवा बुल
आखिरकार, तमाम चर्चाओं के बाद ये फैसला लिया गया कि रामपुरवा बुल को फोरकोर्ट एंट्रेंस के बरामदे में अगले वाले हिस्से पर दो सेंट्रल पिलर्स के बीच में लगाया जाए। इससे बुल अलग-अलग मौसमों से होने वाले नुकसान से भी बच जाएगा और आम जनता को इसे देखने में कोई दिक्कत भी नहीं होगी। इस तरह 1948 से ही रामपुरवा बुल राष्ट्रपति भवन का हिस्सा बना रहा।

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