जिनसे उम्मीद थी वो भी पीछे हट रहे, लड़ रहे बस इसलिए कि लड़ने की मजबूरी है…राष्ट्रपति चुनाव में सिन्हा का हाल

नई दिल्ली

तस्वीर नंबर 1, जगह- बिहार की राजधानी पटना। शुक्रवार का दिन। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार यशवंत सिन्हा की प्रेस कॉन्फ्रेंस। धीर-गंभीर चेहरे पर शिकन की रेखाएं। बार-बार भिंच रही मुट्ठी। बगल में सुधींद्र कुलकर्णी। लटका हुआ चेहरा। भाव ऐसे जैसे प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच गंभीर चिंतन-मनन में डूबे हैं। चश्मे के पीछे से झांकती आंखे जैसे शून्य को निहार रहीं। कुलकर्णी के बगल में टीएमसी के सांसद बिहारी यानी शत्रुघ्न सिन्हा। मुट्ठी के सहारे ठुड्डी ठहराए। उनका भी चेहरा लटका हुआ है। अब दूसरी तस्वीर देखिए। पटना की ही। आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, यशवंत सिन्हा, सुधींद्र कुलकर्णी और शत्रुघ्न सिन्हा एक दूसरे का हाथ पकड़ ऊपर की ओर लहरा रहे। चेहरे या तो लटके हुए हैं या फिर जबरन मुस्कुराने की कोशिश करते दिख रहे। असल में ये दोनों तस्वीरें अपने आप में राष्ट्रपति चुनाव में यशवंत सिन्हा की उम्मीदों का हाल बयां कर रही हैं।

पिछले महीने विपक्षी दलों ने जब यशवंत सिन्हा को संयुक्त उम्मीदवार बनाने का ऐलान किया तब ऐसा लग रहा था कि राष्ट्रपति चुनाव रोचक होगा। एनडीए का पलड़ा भले ही थोड़ा सा भारी रहे लेकिन विपक्ष की तरफ से दमदार टक्कर मिलेगी। लेकिन जैसे-जैसे राष्ट्रपति चुनाव करीब आता गया, सिन्हा एक तरह से मुकाबले से ही बाहर हो गए। अब चूंकि पर्चा भर दिया है तो लड़ने की मजबूरी है। लड़ते हुए दिखने की भी मजबूरी है। लड़ रहे हैं इसलिए कि अब लड़ना जरूरी है। आखिर जिनके साथ से आस था जब वो भी अकेला छोड़ रहे तो जीत की उम्मीद कर भी कैसे सकते हैं।

मूर्मू की उम्मीदवारी से बदल गए हालात
ममता बनर्जी की पहल पर 21 जून को हुई विपक्षी दलों की बैठक में सिन्हा की उम्मीदवारी का फैसला किया गया। उनसे पहले शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला और गोपाल कृष्ण गांधी ने उम्मीदवार बनने से इनकार कर दिया था। विपक्ष की उस बैठक से बीएसपी, बीजेडी, टीडीपी, अकाली दल, आईएसआर कांग्रेस जैसे कई दल दूर रहे। फिर भी सिन्हा को समूचे विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार के तौर पर पेश करके 2024 से पहले विपक्षी एकजुटता के इजहार की भरपूर कोशिश हुई। लेकिन हालात तब बदल गए जब बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए ने द्रौपदी मूर्मू के रूप में अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया। बीजेपी के आदिवासी कार्ड से विपक्षी एकजुटता की चादर में लगे पैबंद उधड़ गए। जिनसे सिन्हा को आस थी उनमें से कई एक-एक करके उन्हें छोड़ने लगे।

जिनकी पहल पर लड़ने को राजी हुए, अब वही पसोपेश में
सिन्हा की मुश्किल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जिनकी पहल पर वह उम्मीदवारी के लिए राजी हुए, अब उनके ही समर्थन पर संशय है। बात हो रही है ममता बनर्जी की। द्रौपदी मूर्मू के नाम के ऐलान के बाद पहले तो दीदी ने सिन्हा को पश्चिम बंगाल आने से मना कर दिया। कह दिया कि प्रचार अभियान के तहत बंगाल आने की जरूरत नहीं है, वह संभाल लेंगी। बाद में द्रौपदी मूर्मू को लेकर ममता के सॉफ्ट स्टैंड के बाद सिन्हा को टीएमसी के समर्थन पर भी संशय के बादल छा गए हैं। सिन्हा को समर्थन को लेकर ममता बनर्जी का पसोपेश तब सामने आया जब उन्होंने यह कहा कि अगर मोदी सरकार पहले ही मूर्मू के नाम का ऐलान कर देती तो राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार को लेकर आम सहमति बन सकती है। दीदी ने कहा कि सरकार ने राष्ट्रपति चुनाव को लेकर उनसे संपर्क तो किया लेकिन मूर्मू के नाम का खुलासा नहीं किया।

ममता बनर्जी के पसोपेश की वजह
एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार को लेकर ममता बनर्जी के अचानक नरम रुख अख्तियार करने के पीछे उनकी एक बड़ी मजबूरी है। दरअसल बंगाल में आदिवासी समुदाय की हिस्सेदारी 6 प्रतिशत के करीब है। इनकी तादाद करीब 53 लाख है। खास बात ये है कि पश्चिम बंगाल में आदिवासी जनसंख्या पूरे राज्य में बिखरी हुई नहीं बल्कि कुछ खास हिस्सों जैसे नॉर्थ बंगाल और जंगल महल में केंद्रित है। मूर्मू आदिवासियों के संथाल समुदाय से आती हैं। पश्चिम बंगाल की आदिवासी आबादी में 80 प्रतिशत संथाल हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में आदिवासी इलाकों में बीजेपी का प्रदर्शन काफी अच्छा था। लिहाजा ममता को आदिवासी वोटबैंक छिटकने का डर सता रहा है।

तब साथ का दिया भरोसा, अब मार लिए यू-टर्न
द्रौपदी मूर्मू की जीत तो एक तरह से तभी तय हो गई जब नवीन पटनायक की बीजेडी और जगन मोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस ने उन्हें समर्थन का ऐलान किया। एक तरफ मूर्मू की दावेदारी लगातार मजबूत हो रही है, दूसरी तरफ यशवंत सिन्हा को समर्थन का भरोसा देने वाले कई दल यू-टर्न ले चुके हैं। राष्ट्रपति चुनाव को लेकर दिल्ली में 15 और 21 जून को हुई बैठक से बीएसपी, अकाली जैसे कई दल दूर रहे। लेकिन जो विपक्षी दल बैठक में मौजूद रहें और जिन्होंने सिन्हा की उम्मीदवारी का समर्थन किया था, उनमें से कई अब पलटी मार चुके हैं।

विधायकों की बगावत की वजह से महाराष्ट्र की सत्ता से हाथ धोने वाली शिवसेना ने इस डर से यू-टर्न ले लिया कि कहीं सांसद भी बगावत न कर दें। इसी तरह झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भी सिन्हा की उम्मीदवारी का समर्थन किया था लेकिन बीजेपी के आदिवासी कार्ड की वजह से उसे भी यू-टर्न लेने को मजबूर होना पड़ा। हेमंत सोरेन ने मूर्मू के समर्थन का ऐलान कर दिया। विपक्ष में शामिल बीएसपी और अकाली दल ने भी मूर्मू के साथ हैं। यूपी के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की अगुआई वाले गठबंधन का हिस्सा रहे सुभासपा के मुखिया ओम प्रकाश राजभर ने भी सपा को झटका देते हुए मूर्मू को समर्थन का ऐलान कर दिया। 18 जुलाई को चुनाव तो होंगे लेकिन नतीजे पहले से तय दिख रहे हैं- सिन्हा की हार, मूर्मू की जीत। साफ है, सिन्हा हारी बाजी खेल रहे हैं।

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