लोकतंत्र में नेता, मानहानि और अभिव्यक्ति की आजादी, आलोचना तो सुन लीजिए जनाब!

लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी और सार्वजनिक जीवन की हस्तियों की आलोचना का अधिकार देता है। यहां तक कि अमेरिका और दूसरे देशों में हस्तियों की झूठ पर आधारित आलोचना भी मानहानि के दायरे में नहीं आती जबतक कि वह दुर्भावना वाली न हो। नेताओं के लिए यह नागवार लग सकता है। तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने 1991-96 तक पांच सालों में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ मानहानि के 213 मुकदमे किए थे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी को खारिज करते हुए कहा था, ‘पब्लिक फिगर के तौर पर आपकों आलोचनाओं का सामना करना ही पड़ेगा।’

उसके बाद से हर विचारधारा के नेता और भी ज्यादा संवेदनशील हो चुके हैं। कभी-कभी ये चुभन इस हद तक पहुंच जाती है कि हास्यास्पद लगती है। यूपी के मथुरा के एक सरकारी सफाईकर्मी बॉबी खरे के ही मामले को लीजिए।वह शहर में एक कूड़ा उठान केंद्र पर अपने कार्ट में कूड़ा लोड करने का अपना रोज का नियमित काम ही कर रहे थे। उनका ध्यान नहीं गया कि उनके कार्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीरों वाले पोस्टर भी हैं। किसी ने उनके कार्ट में पड़े इन पोस्टरों के साथ उनकी तस्वीर खींच ली और उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। पोस्ट वायरल हो गया।

बीजेपी समर्थकों ने इसे दोनों नेताओं के अपमान के तौर पर लिया। उन्होंने बॉबी को घेरा तो उनका जवाब था कि वह तो सिर्फ कूड़े में पड़े पोस्टरों को कार्ट में रखा है। उन्हें निगम कार्यालय में तलब कर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया। उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछा गया कि आपको क्यों न बर्खास्त किया जाए। बॉबी ने उसी दिन नोटिस का जवाब भी दे दिया लेकिन ऐसा करके भी वह बच नहीं पाए।हमें खुद से पूछना होगा कि बॉबी ने जो किया क्या वह गलत था? वह किस बात की माफी मांग रहे थे? असल में वह कौन सी ‘गलती’ थी जिसको न दोहराने का वह वादा कर रहे थे?

भारत में तमाम अखबार, पत्रिकाएं शीर्ष नेताओं की तस्वीरों से अटी-पटी रहती हैं। थोक के भाव में नेताओं के पोस्टर भी दिखते हैं। अंत में ये रद्दी में जाती हैं और उनका निस्तारण करना होता है। चुनाव के दौरान सभी पार्टियों के नेताओं के हजारों पोस्टर लगते रहते हैं। जब रैली खत्म होती है तो हजारों पोस्टरों को इकट्ठा किया जाता है और उनका ठोस कचरे के तौर पर निस्तारण होता है। इस प्रक्रिया में सफाईकर्मियों के कार्ट में भी नेताओं की तस्वीरें दिखना बहुत ही सामान्य है। तो इसमें क्या है? सफाई के सामान्य काम के पीछे साजिश और अपमान की मंशा क्यों ढूंढना? हर स्वीपर के लिए अपने इकट्ठे किए गए हर पोस्टर, न्यूजपेपर और मैगजीन की तस्वीरों को छिपाना संभव नहीं है।

अगर पोस्टर को कार्ट में रखने पर बर्खास्तगी का जोखिम हो तो चुनावी रैलियों के बाद उन्हें कौन साफ करेगा, निस्तारण करेगा? क्या गिरफ्तारी या बर्खास्तगी के डर से उन पोस्टरों को ग्राउंड पर वैसे ही छोड़ दिया जा सकता है? क्या पोस्टरों को लोग पैरों से कुचलते हुए आगे बढ़ें, वह ठीक है लेकिन उसी पोस्टर को स्वीपर उठाकर कार्ट में डाले तो ये गलत है?

पूरे भारतभर में लोग अपने-अपने घरों के पुराने अखबारों और पुरानी पत्रिकाओं को कबाड़ियों के हाथों बेचते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इन तमाम पत्र-पत्रिकाओं पर आपकी तस्वीरें छपी होती हैं। क्या आपकी इन तस्वीरों को कबाड़ में बेचने वाले आपका अपमान कर रहे हैं? क्या आपकी उन तस्वीरों को बेचने और खरीदने वालों की गिरफ्तारी का कोई तुक बनता है? बिल्कुल नहीं।

प्राइम मिनिस्टर, मुझे पूरा भरोसा है कि बॉबी खरे मामले को लेकर आप भी हैरान होंगे। कृपया अपने समर्थकों से कहिए कि निष्ठा प्रदर्शन के लिए बेतुकापन की हद तक न जाएं। बॉबी के मामले में जनता की सहानुभूति उनके साथ है और यही सही भी है। आपकी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए आपके समर्थकों का ये हद पार करना आपकी छवि को ही नुकसान पहुंचा सकता है। अच्छी बात ये है कि इस मामले की परिणति खुशी देने वाली है। प्लीज जब भी इस तरह के मामले आएं, उन सब में यही सुनिश्चित कीजिए।

एक अन्य मामले में फिल्म निर्माता अविनाश दास को गृह मंत्री अमित शाह के एक नौकरशाह के साथ वाली 5 साल पुरानी तस्वीर को सोशल मीडिया पर शेयर करने के लिए गिरफ्तार लिया गया। नौकरशाह पर हाल में भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। लेकिन दास की गिरफ्तारी क्यों? मेरी शराब किंग विजय माल्या के साथ भी तस्वीरें हैं जो अब डिफॉल्टर हैं और ब्रिटेन भाग गए हैं। अगर कोई मेरी माल्या के साथ तस्वीर प्रकाशित करता है तो क्या इसका यह मतलब होगा कि मेरा अपमान किया जा रहा है? क्या इसका यह मतलब होगा कि मैं उनके रैकेट का हिस्सा हूं? सैकड़ों नेताओं, नौकरशाहों और पत्रकारों की माल्या के साथ तस्वीरें होंगी। क्या वो तस्वीरें ऐसी चीज हैं जिन्हें छिपाया जाना चाहिए?

43 प्रतिशत सांसद आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं। उनमें से कई मामले बेहद गंभीर प्रकृति के हैं। राज्यों की विधानसभाओं में ये आंकड़ा तो और भी ज्यादा है। क्या इन सांसदों से मिलना और उनके साथ फोटो नहीं लिया जाना चाहिए? क्या ऐसी तस्वीरों का प्रकाशन मानहानि है? हमारे नेताओं को अपने समर्थकों को यह याद दिलाने की जरूरत है कि जयललिता के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा। हस्तियों को कानूनी कार्रवाई की अति किए बगैर आलोचनाओं का सामना करना चाहिए।

स्वामीनाथन अय्यर का लेख

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