सियासी संकट, अध्यक्ष पर संशय, जी-23 में असंतोष, कांग्रेस की यात्रा से निकलेगा रास्ता?

नई दिल्ली

देश पर आजादी के बाद 70 सालों तक हुकूमत करने वाली कांग्रेस आज नेपथ्य में है। जिस पार्टी में महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, इंदिरा और राजीव गांधी जैसे नेताओं की मौजूदगी थी वह आज केंद्र की सत्ता में आने के लिए तरस रही है। आलम तो यह है कि राहुल गांधी के पद छोड़ने के बाद कोई नया अध्यक्ष नहीं मिल रहा है। इसके अलावा उसके ही पार्टी के नेता बगावत पर उतर आए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल के अलावा प्रवक्ता जयवीर शेरगिल और उससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे युवा नेता पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। हालिया कांग्रेस छोड़ने वाले गुलाम नबी आजाद पर तो जैसे पार्टी के ही नेताओं ने विरोध के स्वर बुलंद कर लिए। त्यागपत्र में राहुल का नाम लेने पर तो जैसे न जाने कितने कांग्रेसियों को मिर्ची लग गई। जो आजाद कल तक पार्टी के लिए आदरणीय थे अब उनका डीएनए मोदीफाइड बता दिया गया।

इन सबके बीच कांग्रेस 7 सितंबर से भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत करने जा रही है। इसमें 117 नेता शामिल होंगे जिसकी शुरुआत कन्याकुमारी से शुरू होगी और कश्मीर में खत्म होगी। देर आए दुरुस्त आए की राह पर चलने वाली कांग्रेस को देखकर लग रहा है कि कहीं न कहीं यह जी-23 नेताओं की बगावत का असर तो नहीं। कहीं सोनिया राहुल के खिलाफ ईडी की जांच ने पार्टी का एक्टिव मोड तो नहीं ऑन कर दिया। महंगाई बेरोजगारी के खिलाफ जो लड़ाई पार्टी अब लड़ रही है क्या वह पहले नहीं हो सकता था। ऐसे तमाम सवाल हैं जो इस दौरान राजनीति के जानकारों के मन में कौंध रहे हैं।

भारत जोड़ो यात्रा फूंकेगी जान?
कांग्रेस का भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत 7 सितंबर से होगी। इसकी शरुआत कन्याकुमारी से होगी और कश्मीर में जाकर इस यात्रा का अंत होगा। 150 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में 12 राज्य और 2 केंद्र शासित प्रदेश शामिल होंगे। इसमें 117 नेताओं के शामिल होने की बात कही गई है। जयराम रमेश, पवन खेड़ा, युवा नेता कन्हैया कुमार,दिग्विजय सिंह सरीखे बड़े नेता राहुल गांधी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलेंगे। 3500 किमी तक की यात्रा पैदल पूरी की जाएगी। इस यात्रा से कांग्रेस का संदेश साफ है कि वह भाजपा और संघ की विचारधारा से लोहा लेने के मूड में है। इसके अलावा वह देश में बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से लड़ रहे लोगों को अपने साथ मिलाना चाहती है। कांग्रेस की नजर 2024 के आम चुनाव पर है क्योंकि पार्टी 8 साल से सत्ता से बाहर है।

कांग्रेस के आस्तित्व पर संकट और पार्टी नेताओं का किनारा
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज यानि शनिवार को केरल के दौरे पर हैं। यहां उन्होंने कांग्रेस सहित कम्युनिस्ट पार्टी पर सीधा हमला बोला। बात कांग्रेस की हो रही है तो उसी पर बात करते हैं। शाह ने केरल के तिरुवंतपुरम में कहा कि कांग्रेस देश से गायब हो रही है। यदि केरल में किसी का भविष्य है तो वह बीजेपी है। बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने तो आज प्रेस कॉन्फ्रेंस कर एक बार फिर नेशनल हेराल्ड का जिन्न निकाल दिया। कांग्रेसी नेता और यूपी के 4 बार के सीएम रह चुके चंद्रबाबू नायडू की किताब का हवाला देते हुए निशाना साधा। पात्रा ने कहा कि उनकी किताब से यह सिद्ध होता है कि नेशनल हेराल्ड की स्थापाना गांधी परिवार की सेवा के लिए ही की गई थी।

भाजपा की तरफ से लगातार ऐसे बयान सामने आते हैं जिसमें पार्टी के भविष्य को लेकर प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है। दूसरी ओर ऐसे सवालों को और बल मिल जाता है जब उन्हीं के पार्टी के नेता अंदर ही अंदर बगावत का बिगुल फूंक देते हैं। कांग्रेस के साथ एक और दिक्कत है। अबतक जिसने भी कांग्रेस का दमन छोड़ भाजपा या कोई और पार्टी ज्वाइन की है पार्टी उन्हें छोड़ते वक्त मना नहीं पाई। असम के मौजूदा सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने खुद माना है कि अगर राहुल गांधी उस दिन कुत्ते को बिस्किट देने की जगह उनकी बात सुन लेते तो तस्वीर कुछ और होती। मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री के पद पर मौजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश के अपीलिंग नेताओं में शुमार किए जाते थे, फिर क्या हुआ कमलनाथ से नाराजगी ने सरकार ही गिरा दी। पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह की पार्टी छोड़ने की वजह ही सिर्फ इतनी थी कि उनकी सोनिया गांधी ने सुनी नहीं और सिद्धू से उनकी अनबन ने सारा खेल कर दिया। फिलहाल कैप्टन एक नई पार्टी बना चुके हैं जिसका गठबंधन बीजेपी के साथ है। कुलदीप बिश्नोई, जयवीर शेरगिल, कपिल सिब्बल सरीखे ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने पार्टी से अलग-अलग वजहों से किनारा कर लिया।

कांग्रेस सीखना नहीं चाहती
इतिहास उठाकर अगर देखें तो ऐसा नहीं है कि कांग्रेस की कभी हार नहीं हुई। पार्टी राज्य और केंद्र में हारी लेकिन फिर वापसी भी की। मध्य प्रदेश में 15 साल, राजस्थान में 5 साल और छत्तीसगढ़ में भी 15 साल बाद सत्ता का स्वाद चखा। एक बार को लगा कि कांग्रेस एक बार फिर वापसी कर रही है लेकिन कुछ महीनों के बाद मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र(गठबंधन में) में क्या हुआ हम सब जानते हैं। झारखंड और राजस्थान में तो हमेशा खतरा बना रहता है। कांग्रेस के एक साथ समस्य है कि वह सीखती नहीं है या सीखना नहीं चाहती है। पार्टी से कई कद्दावर नेताओं का किनारा भी पार्टी को बदलाव की ओर नहीं ले जाता उल्टा औरल प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। कांग्रेस को कम से कम मौजूदा मोदी सरकार, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार से सीखना चाहिए। पीएम नरेंद्र मोदी के नाम एक भी चुनाव न हारने का तमगा है। पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के नेतृत्व में 2024 की तैयारी शुरी कर चुकी है।

केरल और तेलंगाना गढ़ न होने के बावजूद वहां संभावनाएं तलाश रही है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल तो हिमाचल और गुजरात चुनाव की तैयारी शुरू कर चुके हैं। जगह-जगह जाकर लोगों के संबोधित कर रहे हैं, भाजपा की कमियां गिना रहे हैं लेकिन वहीं कांग्रेस को देखें तो वह इन चुनावों से दूर अपनों को ही संभालने में जुटी है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि चुनाव की तारीख नजदीक आते ही मंचों से किए गए चुनावी वादों से चुनाव नहीं जीते जाते। उत्तर प्रदेश और उससे पहले 2019 के आम चुनाव में हम यह देख चुके हैं।

महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ लड़ाई अब क्यों… कहीं देर तो नहीं
कांग्रेस को हालांकि अब महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ मुखर होते हुए देखा गया है। राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं को इसके खिलाफ सड़कों पर खूब प्रदर्शन करते देखा गया। सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत कई नेताओं ने मोदी सरकार के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन करते देखा गया था। हालांकि उसी दौरान सोनिया और राहुल से नेशनल हेराल्ड मामले में ईडी की पूछताछ ने भी कई कांग्रेसियों को विरोध का एक मौका दे दिया था। सोनिया और राहुल के तेवर तो उस समय देखने लायक थे। 5 अगस्त की तारीख तो याद ही होगी। महंगाई, बेरोजगारी और जीएसटी के खिलाफ कांग्रेस का हल्लाबोल सबने देखा। लगा पार्टी में मोदी सरकार के खिलाफ लड़ने की उर्जा आ गई। संसद से लेकर राष्ट्रपति भवन तक मार्च चला। प्रधानमंत्री आवास का घेराव करने का भी प्रोग्राम था लेकिन हो न पाया। इससे सवाल यह उठता है कि कांग्रेस को महंगाई और बेरोजगारी अब क्यों दिखाई पड़ रही है। कहीं यह जी-23 नेताओं का पार्टी से मोहभंग और अलविद कहने का नतीजा तो नहीं।

गांधी परिवार से इतर क्यों नहीं सोच पाती है कांग्रेस
यह बात सच है कि गांधी परिवार के कई लोग देश के प्रधानमंत्री पद पर बैठे। इनमें पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी और संजय गांधी। पार्टी का अध्यक्ष पद यदा कदा ही गैर गांधी परिवार के अलावा किसी के पास रह हो। कांग्रेस में एक बात और जो देखने में मिल रही है कि वह CWC यानि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में नए अध्यक्ष पद का न चुन पाना। इसकी एक वजह जो देखने में आ रही है वह यह कि कांग्रेस का एक धड़ा अब भी राहुल गांधी को अध्यक्ष पद के रूप में देखना चाहता है। इस जिद की वजह से पार्टी के बाहर यह संदेश जा रहा है कि पार्टी अब भी गांधी परिवार से ऊपर किसी को अध्यक्ष पद के रूप में देख ही नहीं पाती है। हालांकि राहुल गांधी पहले ही क्लियर कर चुके हैं कि वह इस पद पर दोबारा नहीं आना चाहते हैं लेकिन कई नेताओं की जिद कहें या क्या कांग्रेस को अब भी नए चेहरे की तलाश है।

वहीं एक बात और, कई लोगों का मानना है कि मोदी के खिलाफ राहुल गांधी को उतारना भी अन्य विपक्षी पार्टियों को रास नहीं आता है। महागठबंधन में एकजुटता न होना भी मोदी सरकार को और मजबूत करती है। कारण यह है कि इस महागठबंधन में कई लोग हैं जो पीएम की कुर्सी पर नजर गड़ाए बैठे हैं। इनमें ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल आदि हैं। ऐसे में कांग्रेस का कई असफलताओं के बाद राहुल को आगे करना भी लड़ाई को और कमजोर करता है।

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