गुजरात चुनाव में भी मंदिर-दरगाह को ले आयी है भाजपा, जानिए इस बार क्या है मामला

नई दिल्ली

गुजरात में भाजपा के चुनावी प्रचार का एक चर्चित बिंदु पंचमहल जिले का कालिका माता मंदिर है। 11वीं शताब्दी का कालिका माता मंदिर पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार का उद्घाटन 18 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

राज्य की भाजपा सरकार का दावा है कि परिसर में बने दरगाह को “सौहार्दपूर्ण तरीके से स्थानांतरित” करने के बाद मंदिर के ‘शिखर और कलश’ का पुनर्निर्माण कराया गया था। मंदिर परिसर के पुनर्विकास के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर का ‘शिखर ध्वज’ फहराया था। पार्टी के अनुसार, यह आक्रमणकारियों द्वारा शिखर को तोड़कर उस पर दरगाह बनाने के 500 साल बाद किया गया था।

भाजपा ने बनाया चुनावी मुद्दा
भाजपा के स्टार प्रचारक पावागढ़ को पीएम मोदी के तहत “भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक गौरव को पुनः प्राप्त करने और पुनर्स्थापित करने” के उदाहरण के रूप में उद्धृत कर रहे हैं।

गुरुवार को पावागढ़ की तलहटी में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, ”पहले पावागढ़ मंदिर को बिना शिखर के देखना दिल दहला देने वाला अनुभव होता था। यह आक्रमणकारियों द्वारा किया गया 500 साल पुराना अपमान था। मैंने इसे बदलने की कसम खाई थी… क्या कांग्रेस के शासन में पावागढ़ अस्तित्व में नहीं था? लेकिन वे शक्तिपीठ की शक्ति को नहीं देख पा रहे थे, जो मैं देख सकता था। हमने गुजरात की आस्था के अपमान को समाप्त करने के लिए एक अभियान चलाया … कांग्रेस पार्टी को विश्वास और पूजा का अपमान करने में मज़ा आता है … मुझे नहीं पता कि उनके साथ क्या समस्या है।”

शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी आणंद जिले में थे, वहां उन्होंने पावागढ़ मंदिर के बारे में बोलते हुए कांग्रेस पर ‘गुलामी की मानसिकता’ रखने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, ”कांग्रेस में गुलामी की मानसिकता है। इसके अनेक उदाहरण हैं। एक उदाहरण पावागढ़ का काली मंदिर है, जिस पर 500 साल पहले आक्रमणकारियों ने हमला कर दिया था। उन्होंने महाकाली मंदिर को तोड़ दिया था और उसके शिखर को नष्ट कर दिया था।

500 साल तक मंदिर का शिखर नष्ट रहा, वहां कोई झंडा नहीं फहराया गया। यह कांग्रेस की मानसिकता है… क्या आजादी के बाद उसे ठीक नहीं कराया जाना चाहिए था? यह अब मोदी के कारण नहीं हुआ है। आपके वोट की ताकत के कारण हुआ है… उनकी गुलामी की मानसिकता उन्हें देश की आस्था पर गर्व करने की अनुमति नहीं देती है।”

क्या है मंदिर का इतिहास?
जून में पुनर्निर्मित मंदिर परिसर के उद्घाटन के दौरान कालिका माता मंदिर के ट्रस्टियों के एक नोट जारी किया था। उसके अनुसार, चंपानेर शहर स्थित मंदिर राजपूतों द्वारा शासित राज्य का हिस्सा था।कहा जाता है कि यहां मां सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। इसलिए, कालिका माता मंदिर एक शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित है। यूनेस्को ने चंपानेर-पावागढ़ को विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया है।
दरगाह का विवाद

ट्रस्ट द्वारा जारी नोट के अनुसार, 15वीं शताब्दी में सुल्तान महमूद बेगड़ा ने चंपानेर पर हमला कर, उसे जीत लिया। वहीं उन्होंने अपनी राजधानी स्थापित की। इस दौरान ही मंदिर के शिखर को नष्ट कर दिया गया। माना जाता है कि सदनशाह पीर दरगाह उस समय के आसपास बनाई गई थी।कहा जाता है कि सदानशाह पीर मूल रूप से एक हिंदू फकीर थे। उन्होंने महमूद बेगड़ा के दरबार का हिस्सा बनने के लिए इस्लाम धर्म अपना लिया था। हालांकि उन्होंने मंदिर को नष्ट होने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अब दरगाह कहां है?
ट्रस्ट के एक सदस्य ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दरगाह को स्थानांतरित करना पुनर्विकास कार्य का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा था। ट्रस्टी ने कहा, “हमने बंदोबस्त के रूप में दरगाह का पुनर्निर्माण भी कराया।” मंदिर और दरगाह का पुनर्निर्माण अहमदाबाद के वास्तुकार आशीष सोमपुरा ने किया था, जो अयोध्या में राम मंदिर भी बना रहे हैं।दरगाह पहले महाकाली मंदिर के गर्भगृह के ऊपर स्थित था। अब दरगाह को उसी परिसर में एक स्वतंत्र संरचना के रूप में लगभग 50 फीट की दूरी पर स्थानांतरित कर दिया गया है।

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