सड़क हादसों में नंबर-1 है उत्तराखंड, मौत के आंकड़े भयानक

देहरादून

भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार खिलाड़ी ऋषभ पंत की गाड़ी हादसे का शिकार हो गई, जिसमें पंत बुरी तरह से घायल हो गए। अस्पताल में भर्ती पंत की हालत फिलहाल स्थिर है। दिल्ली-देहरादून हाइवे पर स्टार क्रिकेटर के साथ हादसे के बाद एक बार फिर प्रदेश में बढ़ते सड़क हादसों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। उत्तराखंड सड़क हादसों के मामले में देश के सबसे खतरनाक प्रदेशों में गिना जाता है। यहां हादसे में मरने वाले लोगों की संख्या भी अन्य राज्यों और राष्ट्रीय औसत के मुकाबले काफी ज्यादा है।

साल 2022 में तो उत्तराखंड में सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों की संख्या 20 फीसदी बढ़ी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल यहां हर दिन सड़क हादसों तीन लोगों की मौत हुई है। हर दिन औसतन तीन लोग घायल भी हुए हैं। प्रदेश में पिछले पांच साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो हादसों में जान गंवाने वालों की संख्या हर साल बढ़ी है। साल 2018 में प्रदेश में 1468 सड़क हादसे हुए थे। इसमें से 1047 लोगों की जान चली गई थी।

2019 में 1352 हादसों में 867 लोगों की मौत हुई। कोरोना काल के दौरान जब लॉकडाउन में कर्फ्यू जैसे हालत थे, तब भी यहां 1042 सड़क हादसे हुए, जिनमें 674 लोगों की मौत हो गई। 2021 में उत्तराखंड में 1405 दुर्घटनाएं हुईं और 820 लोगों की जान गई। साल 2022 में जब कोरोना के सभी प्रतिबंध हटा लिए गए, तब प्रदेश में हादसों में मरने वाले लोगों की संख्या ने सबको चौंका दिया। इस साल नवंबर तक 1516 सड़क हादसे हुए, जिनमें 1022 लोगों की मौत हुई। यह पिछले कई सालों के मुकाबले सबसे ज्यादा है।

मोटे तौर पर देखें तो पांच साल के भीतर उत्तराखंड में 6 हजार 700 सड़क हादसे हुए और 4 हजार 400 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उत्तराखंड के मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यहां हादसे में मरने वाले लोगों की संख्या राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है। देश में हर 100 हादसों में 25 से 30 लोगों की जान जाती है लेकिन उत्तराखंड में प्रति 100 रोड हादसों में मरने वाले लोगों की संख्या 60-70 होती है।

पैदल चलने वाले भी सुरक्षित नहीं
सड़क हादसों में ज्यादातर ऐसे होते हैं, जिनमें गाड़ियां एक दूसरे या फिर डिवाइडर से टकरा जाती हैं। उत्तराखंड के लिए एक और चौंकाने वाली बात ये है कि यहां सड़कों पर पैदल चलना भी सुरक्षित नहीं है। एक आंकड़े के मुताबिक, दो साल के भीतर प्रदेश के नैशनल और स्टेट हाइवे पर 273 यात्री पैदल चलते हुए हादसों के शिकार हो गए और अपनी जान गंवा दी। हिमाचल के बाद उत्तराखंड इस मामले में देश में दूसरे नंबर पर आता है। हर साल पैदल यात्रियों के मरने की संख्या बढ़ती चली जा रही है। साल 2015 में 106 लोग पैदल चलते हुए हादसे का शिकार हो गए और काल के गाल में समा गए। वहीं साल 2018 में यह आंकड़ा बढ़कर 146 पहुंच गया।

क्यों हो रहे हैं ये हादसे
उत्तराखंड में बढ़ते हादसों का प्रमुख कारण तेज रफ्तार को बताया जाता है। ऋषभ पंत के साथ हादसे में भी यही बात सामने आई थी। कई बार ऐसा होता है कि ड्राइवर आराम नहीं करते और लंबी दूरी की यात्रा में नींद आने के कारण हादसे का शिकार हो जाते हैं। शराब पीकर गाड़ी चलाने की घटनाएं भी सामने आती हैं। पहाड़ी इलाकों में गाड़ी को लगातार चलाते रहना भी खतरनाक साबित हो रहा है। बिना आराम और सर्विसिंग दिए गाड़ी चलाने से कई बार तकनीकी खराबी ने हादसे करा दिए और लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।

उत्तराखंड की खराब सड़कों को भी इसके लिए जिम्मेदार बताया जाता है। पहाड़ी इलाकों में खतरनाक मोड़ों पर गाड़ी चलाना मुश्किल होता है। कई बार वही हादसों के करण बन जाते हैं। ओवरलोडिंग और तेज रफ्तार भी बड़े जानलेवा हादसों के लिए जिम्मेदार है।

हादसों में इतनी मौतें क्यों
उत्तराखंड में हादसों में मरने वालों का आंकड़ा सबसे ज्यादा हैरान करने वाला होता है। हादसे का शिकार हुए 60 से 70 फीसदी लोगों की जान चली जाती है। यह राष्ट्रीय औसत से तकरीबन 40 फीसदी ज्यादा है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि ज्यादा मौतें समय पर उपचार न मिलने के कारण होती हैं। पहाड़ के दुर्गम इलाकों में होने वाले हादसों में रेस्क्यू करने में काफी समस्या होती है, इससे कई लोगों की मौत हो जाती है।

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