कोलकाता रहे हों या दिल्ली तेवर वही पुराने, धनखड़ की बेबाकी ऐसी कि सुप्रीम कोर्ट को भी सुना दिया

नई दिल्ली

गांव के सरकारी स्कूल से पढ़े राजस्थानी जाट, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ कानून के बड़े जानकार हैं। मोदी सरकार के कार्यकाल में बंगाल का गवर्नर रहते वह काफी चर्चा में रहे। पहले फिजिक्स और बाद में कानून की पढ़ाई करने वाले धनखड़ कानूनी मसलों पर खुलकर बात करते रहे हैं। जब वह बंगाल के राज्यपाल थे तो ममता बनर्जी सरकार के कई फैसलों पर उन्होंने न सिर्फ आपत्ति जताई बल्कि विधेयकों को लौटा भी दिया। अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने अनिश्चितकाल के लिए विधानसभा को स्थगित कर दिया। कई ऐसे मौके आए जब बंगाल में गवर्नर vs ममता सरकार का सीन बन गया। टीएमसी आरोप लगाती कि गवर्नर चुनी हुई सरकार की संवैधानिकता को चुनौती दे रहे हैं। कुछ ऐसे ही आरोप हम दिल्ली में एलजी vs केजरीवाल सरकार के बीच विवाद में सुनते रहे हैं। गवर्नर के बाद जब उन्होंने उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली, तो कोलकाता वाला तेवर दिल्ली में भी देखने को मिल रहा है। पहले ही दिन धनखड़ ने उस मुद्दे की चर्चा कर डाली जिस पर दूसरे नेता बात करने से कतरा रहे थे। राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने अपने पहले संबोधन में NJAC पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के इतिहास में ऐसी मिसाल नहीं मिलती जब नियम के तहत की गई संवैधानिक पहल को न्यायिक ढंग से खारिज कर दिया गया हो। उनका इशारा संसद में पारित राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की तरफ था। अब एक बार फिर उन्होंने न्यायापालिका को नसीहत देते हुए मर्यादा याद दिलाई है।

केशवानंद केस में सुप्रीम कोर्ट पर उठाए सवाल
पिछले 24 घंटे से धनखड़ एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उन्होंने केशवानंद भारती मामले में उस ऐतिहासिक फैसले पर सवाल उठाया है जिसने देश में ‘संविधान के मूलभूत ढांचे का सिद्धांत’ दिया था। धनखड़ ने कहा कि न्यायपालिका, संसद की संप्रभुता से समझौता नहीं कर सकती। उन्होंने दो टूक कहा कि अगर संसद के बनाए कानून को किसी भी आधार पर कोई संस्था अमान्य ठहराती है तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं होगा। उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे में तो यह कहना मुश्किल होगा क्या हम लोकतांत्रिक देश हैं?

संवैधानिक संस्थाओं की सीमा समझाते हुए धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम को निरस्त करने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसा कहीं नहीं हुआ है। लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए संसदीय संप्रभुता सर्वोपरि है। मीडिया में धनखड़ के बयान की काफी चर्चा है।

खेल प्रेमी हैं धनखड़
1951 में राजस्थान के झुंझुनू जिले में जन्मे धनखड़ खूब किताबें पढ़ते हैं। कम लोग जानते होंगे कि वह खेल प्रेमी भी हैं। वह राजस्थान ओलंपिक संघ और राजस्थान टेनिस संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं। संगीत सुनना उन्हें पसंद है। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई किठाना गांव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में हुई थी। फिजिक्स में बीएससी (ऑनर्स) करने के बाद उन्होंने राजस्थान विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री हासिल की।

वकालत और सियासत
धनखड़ ने वकील के तौर पर करियर की शुरुआत की थी। 1990 में वह राजस्थान हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित हुए। धनखड़ सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस करते रहे। 30 जुलाई 2019 को पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का पद ग्रहण करने से पहले तक वह राजस्थान के वरिष्ठ अधिवक्ता थे। 1987 में धनखड़ राजस्थान उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में चुने गए सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे।

सियासी सफर की बात करें तो उन्हें तीन दशकों का अनुभव है। 1989 में वह सक्रिय राजनीति में आए और झुंझुनू लोकसभा सीट से पहली बार संसद पहुंचे। 1990 में चंद्रशेखर सरकार में उन्होंने केंद्रीय मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद वह राजस्थान की राजनीति में ऐक्टिव हुए। 1993 में वह अजमेर की किशनगढ़ सीट से राजस्थान विधानसभा के लिए चुने गए।

जब बंगाल पहुंचे धनखड़
जुलाई 2019 में धनखड़ को बंगाल का गवर्नर बनाया गया, उसके बाद ममता सरकार से उनका ’36 का आंकड़ा’ देखा गया। भाजपा ने जब उन्हें उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया तो कहा गया कि सत्ताधारी पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह किसानों की हितैषी है। जाट फैक्टर को भी एक वजह बताया गया। इसे राजस्थान और हरियाणा में होने वाले चुनाव से जोड़ा गया, जहां जाट मतदाताओं की संख्या अच्छी है।

सियासी गणित की बातें अपनी जगह हैं लेकिन धनखड़ ने कम समय में बता दिया है कि वे कोलकाता में हों या दिल्ली में तेवर वही रहने वाला है। बंगाल का गवर्नर रहते उन्होंने कहा था कि बंगाल में संविधान की रक्षा करने के लिए खून का घूंट पीकर काम कर रहा हूं। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि बंगाल में शासन का आतंक है। अब उपराष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने ‘लक्ष्मण रेखा’ खींचने की कोशिश की है।

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