‘दिल्ली सरकार का काम रोक रहे एलजी, ये कहना हवाई किला बनाने जैसा…’ SC में जोरदार दलीलें

नई दिल्ली

दिल्ली में सर्विसेज पर कंट्रोल किसका? केंद्र सरकार का या फिर दिल्ली सरकार का? इस पर विवाद जारी है। इस मुद्दे पर जबतब दिल्ली के एलजी और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच विवाद होता रहा है। इस बीच केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अधिकारी दिल्ली सरकार को गंभीरता से नहीं ले रहे, ये एक मिथक है। राष्ट्रीय राजधानी में अधिकारियों के तबादले और तैनाती का अधिकार किसके पास है, इसे लेकर सुनवाई के दौरान केंद्र ने सर्वोच्च अदालत को बताया कि 1991 में गवर्नमेंट ऑफ नैशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली ऐक्ट (GNCTD Act) लागू होने के बाद से ही केंद्र और दिल्ली की सरकार में अलग-अलग पार्टियों ने सौहार्द के साथ शासन किया है। केंद्र की तरफ से दिल्ली सरकार में तैनात अधिकारी पूरे समर्पण और मेहनत से काम कर रहे हैं।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘पिछले तीन दशकों में एलजी ने दिल्ली सरकार के साथ मतभेद की वजह से सिर्फ 7 मामलों को राष्ट्रपति के पास भेजा है। ऐसे में यह सवाल कहां पैदा होता कि एलजी या नौकरशाह दिल्ली सरकार के कामकाज को रोक रहे हैं? कुछ दूसरे मकसद से कोर्ट के अंदर और बाहर जानबूझकर ऐसी धारणा बनाई जा रही है। अदालतें संवैधानिक सवालों से निपट सकती हैं लेकिन धारणाओं से नहीं।’

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी और ऐडवोकेट शादान फरासत की दलीलों का जवाब देते हुए सॉलिसिटर जनरल ने सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह, कृष्ण मुरारी, हिमा कोहली और पीएस नरसिम्हा की बेंच को बताया कि 2018 में केंद्र-दिल्ली विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की बेंच के पहले फैसले के बाद एलजी ने 18000 से ज्यादा सरकारी फाइलों को मंजूरी दी है। ये फाइलें नीतिगत फैसलों और दूसरे मुद्दों से जुड़ी थीं लेकिन किसी में एलजी ने बिना किसी मतभेद के मंजूरी दी।

आम आदमी पार्टी सरकार की तरफ से सिंघवी ने दलील दी कि सर्विसेज पर दिल्ली सरकार को पूरा कंट्रोल होना चाहिए, इसमें अधिकारियों के तबादले और तैनाती भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि चुनी हुई सरकार का नौकरशाहों पर नियंत्रण नहीं होने से अधिकारी उदासीन हो रहे हैं और मंत्रियों की बात नहीं सुन रहे। इससे दिल्ली में नीतिगत फैसलों को लागू करना नामुमकिन हो रहा है।

इस पर मेहता ने कहा कि ये दलील हवाई किला बनाने की तरह है। उन्होंने दलील दी, ‘किसी नौकरशाह के लिए एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट बहुत अहम होता है। भले ही दिल्ली सरकार में केंद्र नौकरशाहों की तैनाती करे, लेकिन मुख्यमंत्री ही चीफ सेक्रटरी और अलग-अलग विभागों के प्रिंसिपल सेक्रटरीज का एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट लिखते हैं।’

सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘जीएनसीटीडी ऐक्ट के तहत नौकरशाह मंत्रियों और मुख्यमंत्री के कानूनी निर्देशों पर काम करने के लिए बाध्य हैं। वे नाफरमानी या उदासीनता के जरिए अपना एनुअल कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट खराब करने का जोखिम नहीं उठा सकते। पिछले तीन सालों में मुख्यमंत्री ने बिना किसी अपवाद के दिल्ली सरकार में तैनात नौकरशाहों के एसीआर में कुल 10 अंकों में से 9 या साढ़े 9 देते आए हैं। क्या यह अधिकारियों की नाफरमानी को दिखाता है?’

तुषार मेहला ने कहा, ‘केंद्र को दिल्ली सरकार की तरफ से किसी भी सेक्रटरी या अधिकारी के नाफरमानी या उदासीनता की शिकायत नहीं मिली है।’ उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली को संसद ने जानबूझकर रणनीतिक वजहों से विशेष केंद्रशासित प्रदेश बनाया है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नियमों में साफ-साफ एलजी, सीएम, मंत्रिपरिषद, मंत्रियों के साथ-साथ नौकरशाहों की भूमिका और राष्ट्रीय राजधानी का प्रशासन कैसे हो, ये बताया गया है।

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