दिल्‍ली Vs केंद्र: खींचतान से पब्लिक परेशान… अफसरों ने फंड रोका, कई प्रोजेक्‍ट ठप, सैलरी-पेंशन तक अटकी

नई दिल्ली

पिछले कुछ महीनों से दिल्ली सरकार का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। न तो किसी नई परियोजना पर काम शुरू हो पा रहा है और न पहले से चल रहे काम समय पर पूरे हो रहे हैं। सरकार की कई अहम योजनाएं ठप हैं, या उन पर काम बेहद धीमी गति से चल रहा है। लगभग सभी जरूरी काम अटके हुए हैं। मोहल्ला क्लिनिकों में टेस्ट नहीं हो रहे, डॉक्टरों को समय पर सैलरी नहीं मिल रही, सरकारी अस्पतालों में पर्ची बनवाने के लिए लोगों को लंबी कतारों में लगना पड़ रहा है, बसों में तैनात मार्शलों की सैलरी और रिटायर्ड डीटीसी कर्मचारियों को पेंशन भी महीनों तक रुकी रही। यहां तक कि बिजली सब्सिडी के बदले में सरकार से मिलने वाला पैसा लेने के लिए बिजली कंपनियों को कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। फूड ट्रक पॉलिसी, दिल्ली इलेक्ट्रॉनिक सिटी, दिल्ली बाजार पोर्टल की लॉन्चिंग भी अटकी हुई है।

दिल्ली सरकार का दावा है कि वित्त विभाग के प्रमुख सचिव आशीष चंद्र वर्मा की तरफ से फंड जारी करने में बार-बार अड़ंगा लगाया जा रहा है। इसके चलते सरकार को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, जिसका असर तमाम परियोजनाओं पर तो पड़ ही रहा है, साथ में कर्मचारियों की सैलरी और पेंशन देने तक में देरी हो रही है। दूसरे विभागों के अधिकारी भी सरकार के कामों में खुलकर सहयोग नहीं कर रहे हैं। इसके चलते पिछले 6-7 महीनों से सरकार के कामकाज पर गंभीर असर पड़ रहा है और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

मोहल्ला क्लिनिकों पर संकट
फंड रोकने की वजह से मोहल्ला क्लिनिक के डॉक्टरों को सितंबर से नवंबर तक सैलरी ही नहीं मिली। यहां तक कि वित्त विभाग ने बकाया फंड से सैलरी देने की अनुमति भी नहीं दी। काफी जद्दोजहद के बाद दिसंबर में जब वित्तीय अनुदान की दूसरी किश्त जारी हुई, तब जाकर 4 महीने बाद मोहल्ला क्लिनिकों के डॉक्टर्स और स्टाफ को सैलरी मिल पाई। इस दौरान क्लिनिक में डॉक्टरों की कमी का सामना करना पड़ा। समय पर फंड नहीं दिए जाने से मोहल्ला क्लिनिकों का किराया देने में भी देरी हुई। सितंबर से उनका रेंट रुका हुआ था, जिसके चलते 100 से ज्यादा मोहल्ला क्लिनिकों पर बंद होने का खतरा मंडरा रहा था। मोहल्ला क्लिनिकों के बिजली के बिल भी रुके हुए थे। कई जगहों पर डॉक्टरों ने अपनी जेब से बिल भरे, ताकि क्लिनिक बंद न हो। टेस्ट के लिए जिन लैब्स के साथ समझौता किया हुआ है, उनका कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करने में देरी के चलते टेस्ट भी बंद हो गए। जुलाई में भेजे गए बिल दिसंबर तक क्लियर नहीं हुए, जिसके चलते नवंबर में कंपनी ने सारे टेस्ट रोक दिए। इसका खामियाजा उन मरीजों को भुगतना पड़ा, जिन्हें इन क्लिनिकों में मुफ्त इलाज और टेस्ट की सुविधा मिल रही थी।

मार्शलों की सैलरी भी अटकी
डीटीसी की बसों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात मार्शलों को भी पिछले तीन-चार महीनों से सैलरी नहीं मिली है। सैलरी को लेकर वे आए दिन सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि देरी वित्त विभाग की तरफ से की जा रही है और डीटीसी को 55 करोड़ रुपये जारी नहीं किए जा रहे। कई मार्शल काम छोड़कर जाने लगे हैं या नई नौकरी ढूंढ रहे हैं। इससे बसों में यात्रियों, खासकर महिला यात्रियों की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा होने का डर है। डीटीसी के रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन भी अक्टूबर से रुकी हुई है। बार-बार अनुरोध के बावजूद वित्त विभाग फाइल क्लियर नहीं कर रहा। क्लस्टर बसों के परिचालन के बदले में किए जाने वाले भुगतान में भी देरी हुई और नवंबर में भेजे गए प्रस्ताव को जनवरी में मंजूरी दी गई। इससे क्लस्टर बस चलाने वाले ड्राइवर-कंडक्टरों को भी समय पर सैलरी नहीं मिल पाई।

सब्सिडी की रकम जारी करने में भी रोड़ा
वित्त विभाग के प्रमुख सचिव ने फाइलों में छिटपुट कारणों का हवाला देकर बिजली कंपनियों को सब्सिडी की एवज में किए जाने वाले भुगतान को भी लंबे समय तक रोके रखा, जो इलेक्ट्रिसिटी एक्ट और हाई कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन था। बाद में बिजली कंपनियों ने कोर्ट का रुख किया, तब कोर्ट के आदेश के बाद 23 दिसंबर को तीसरे क्वॉर्टर के लिए 211.87 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसमें भी कोर्ट के आदेश का उल्लंघन हुआ, क्योंकि कोर्ट ने अभी तक का सारा अमाउंट क्लियर करने का निर्देश दिया था। सब्सिडी का पैसा जारी करने में हुई इस देरी से दिल्ली में बिजली आपूर्ति प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया था।

अस्पतालों में हो रही भारी दिक्कत
दिल्ली के सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में आने वाले मरीजों को आजकल मैनुअल तरीके से पर्ची कटवानी पड़ रही है। अस्पतालों में जून से ही डेटा एंट्री ऑपरेटर नहीं हैं। वित्त विभाग ने न तो डेटा एंट्री ऑपरेटर हायर करने के लिए नए सिरे से टेंडरिंग करने की अनुमति दी और न ही वर्तमान में काम कर रहे ऑपरेटरों के कॉन्ट्रैक्ट की समय सीमा बढ़ाने की मंजूरी दी। अस्पतालों की तरफ से लगातार वित्त विभाग को चिट्ठियां लिखकर बताया गया कि इस तरह अचानक ऑपरेटरों की सेवाएं खत्म कर देने से अस्पतालों में अव्यवस्था पैदा हो सकती है और मरीजों को भारी दिक्कत हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद वित्त विभाग ने प्रस्ताव को मंजूरी नहीं दी। नतीजन मरीजों को अस्पतालों में पर्ची बनवाने के लिए धक्के खाने पड़ रहे हैं।

दिल्ली जल बोर्ड के काम पर असर
दिल्ली जल बोर्ड का फंड तो जून 2022 से रुका हुआ है। यहां तक कि विधानसभा से पास हुए बजट में जल बोर्ड के लिए जो 6400 करोड़ रुपये अलॉट किए गए थे, उनमें से भी वित्त विभाग ने अभी तक केवल 1900 करोड़ रुपये ही जारी किए है। इसके चलते जल बोर्ड की कई परियोजनाओं पर गंभीर असर पड़ रहा है। खासकर यमुना की सफाई के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट और 24 घंटे जलापूर्ति सुनिश्चित के लिए वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण जुड़ी परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं। समय पर पेमेंट ना होने से पानी और सीवर की लाइनें बिछा रहे ठेकेदार भी काम अधूरा छोड़कर भाग गए। पिछले दिनों विधानसभा की याचिका समिति ने भी इस बारे में जवाब लेने के लिए वित्त विभाग के प्रमुख सचिव को तलब किया था।

बुजुर्गों की पेंशन भी लटकी
दिल्ली के लाखों बुजुर्ग जीवनयापन के लिए दिल्ली सरकार से मिलने वाली ओल्ड एज पेंशन पर निर्भर हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से फंड्स न मिलने के कारण पेंशन भी समय पर जारी नहीं हो पा रही है। इसके चलते बुजुर्गों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। सितंबर से नवंबर तक लगातार तीन महीने पेंशन रुकी रही। इस मामले में भी दिल्ली सरकार के वित्त विभाग के प्रमुख सचिव द्वारा फाइल क्लियर करने में देरी की गई और सरकार की तरफ से लगातार दबाव बनाए जाने के बाद फाइल क्लियर की। तब जाकर 7 दिसंबर को तीन महीने की बकाया पेंशन जारी हो पाई।

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