‘कूड़ादान’ बना डाली वंदे भारत एक्‍सप्रेस… उफ्फ! कैसे हैं हम, बस सफर कर लिया और पीछे छोड़ दी गंध

नई दिल्‍ली

फेंकी हुई पानी की बोतलें। तितरे-बितरे फैले खाने के डिब्‍बे, पॉलीथीन बैग्‍स और पैकेट। लोग अपने घरों में ऐसी गंदगी देख बिलबिला जाते हैं। लेकिन, बाहर निकलते और सफर करते हुए नहीं। इस दौरान एटिट्यूड यू-टर्न मार लेता है। किसी बात से फर्क पड़ना बंद हो जाता है। इसका नमूना एक बार फिर देखने को मिला है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी अवनीश शरण ने वंदे भारत एक्‍सप्रेस की तस्‍वीर शेयर की है। इसमें ट्रेन के अंदर कचरे का अंबार दिखाई देता है। फर्श पर गंदगी ही गंदगी दिखाई देती है। तस्‍वीर में झाड़ू पकड़े सफाईकर्मी हैरान-परेशान सा दिखता है। वंदे भारत एक्‍सप्रेस ‘मेक इन इंडिया’ मुहिम का चेहरा है। इसके ड‍िब्‍बे चेन्‍नई में इंटीग्रल कोच फैक्‍ट्री में बने हैं। यह राजधानी और शताब्‍दी के टक्‍कर की ट्रेन है। इस ट्रेन में यात्रियों की सुविधा का खास ख्‍याल रखा जाता है। इसके बाद भी ट्रेन में ऐसी गंदगी हो तो इसके लिए किसी और को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। अगर हम ही अपनी चीजों का ख्‍याल नहीं रखेंगे तो दुनिया की कोई सरकार चाहकर भी कुछ नहीं कर सकती है।

ट्रेन की तस्‍वीर शेयर करते ही अवनीश शरण की पोस्‍ट वायरल हो गई। लोग इस पर जमकर प्रतिक्रियाएं देने लगें। लोगों ने लिखा कि अपने देश में लोग कर्तव्‍य नहीं जानते हैं। सिर्फ अधिकारों की बात करते हैं। लोग बेहतर सुविधाएं और अच्‍छा इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर चाहते हैं। यह और बात है कि उन्‍हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि इसे साफ कैसे रखा जाए और देखभाल कैसे की जाए। आईएएस अधिकारी ने तस्‍वीर शेयर करते हुए भारतीय संविधान की प्रस्‍तावना के पहले तीन शब्‍द ‘वी द पीपल’ लिखा है। कई लोग वंदे भारत एक्‍सप्रेस के अंदर कूड़ा-करकट देखकर भड़क गए।

जब घर रखते हैं साफ तो ट्रेन क्‍यों नहीं?
लोग अपने घरों में साफ-सफाई का खूब ध्‍यान रखते हैं। द‍िनभर में कई बार झाड़ू-पोछा लगाते हैं। फर्श पर जरा भी गंदगी बर्दाश्‍त नहीं करते हैं। यही सेंसिटिविटी बाहर नहीं दिखती है। ट्रेनों का ही उदाहरण लेते हैं। कुछ भी खा-पीकर लोग ट्रेन में फेंक देते हैं। ट्रेन के सफर की शुरुआत करने से अंत तक यह कूड़ेदान में तब्‍दील हो चुकी होती है। टॉयलेट गंध मारने लगते हैं। सिंक से बदबू आने लगती है। फर्श पर जगह-जगह गंदगी दिखाई देती है। फिर हम शिकायत करते हैं। जबकि सच यह है कि हममें से ही कई लोग टॉयलेट करने के बाद कभी भी फ्लश नहीं चलाते हैं। खाना खाने के बाद डस्‍टबिन तलाशने की भी जहमत नहीं उठाते हैं।

पैसे नहीं कमाती सरकार, ये हमारी चीजें हैं
सरकार कहीं कमाने नहीं जाती है। सड़क, ट्रेन, भवन और पुल सहित तमाम इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर निर्माण करने के लिए सरकार हमसे ही पैसा वसूलती है। यह पैसा टैक्‍स के तौर पर वसूला जाता है। देश का हर नागरिक टैक्‍स देता है। फिर चाहे वह प्रत्‍यक्ष रूप में हो या परोक्ष तौर पर। इस इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर की मरम्‍मत और रखरखाव में होने वाला खर्च भी हमें देते हैं। अगर हम अपनी ट्रेन, स्‍मारकों, पार्कों और सड़कों को साफ नहीं रखते हैं तो यह हमारा दुर्भाग्‍य है। सरकार से सारी अपेक्षा नहीं की जा सकती है।

तोड़-फोड़ के लिए आखिर ट्रेनें क्‍यों बनती हैं निशाना?
देशभर में कहीं भी विरोध हो और कैसा भी हो, सबसे पहले प्रदर्शनकारी ट्रेन की पटरियों पर दिखाई देते हैं। ऐसे कई मामले देखने को मिले हैं जब ट्रेनों और बसों को प्रदर्शन के दौरान आग के हवाले किया गया। यह भी समझ के परे है कि लोग ट्रेनों पर पथराव क्‍यों करते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले साल पूरे देश में चलती ट्रेनों पर 1,500 से ज्‍यादा पथराव के मामले दर्ज किए गए। इन मामलों में 400 से ज्‍यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया। रेलवे के आंकड़ों के अनुसार, वंदे भारत ट्रेनों को भी इसका नुकसान हुआ है। इसका एक उदाहरण तो इस महीने की शुरुआत में ही मिला था। तब‍ वंदे भारत पर पथराव किया गया था। इसमें ट्रेन के कई शीशे टूट गए थे। वंदे भारत पूरी तरह से भारत में बनी है। इस पर पथराव के मामले सुर्खियों में रहे हैं। भारत को वाकई अगर स्‍वच्‍छ रेल- स्‍वच्‍छ भारत के सपने को पूरा करना है तो भारतीयों को अपनी सोच बदलनी होगी।

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