बिहार में ‘ऑपरेशन लोटस’ की प्लानिंग, राजेंद्र आर्लेकर के भेजे जाने से बिहार में क्यों है खलबली?

पटना

बनते बिगड़ते समीकरण की संभावनाओं के बीच बिहार की राजनीति इन दिनों परवान पर है। जहां तक सत्ता में शामिल महागठबंधन की बात करें तो वह भयंकर अंतर्विरोध के साथ खरामा खरामा दूरी तय कर रहा है। कुशवाहा नेता उपेंद्र कुशवाहा की राह जनता दल यू (जेडीयू) में रह कर भी जुदा जुड़ा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का भी लेंथ लाइन बिगड़ा नजर आ रहा है। मंत्रिपरिषद विस्तार को लेकर भी दोनों एक दूसरे से असहमत दिख रहे हैं। नीतीश कुमार के कभी करीबी रहे आरसीपी सिंह जनता दल यू की जड़ में मट्ठा डालने का काम कर रहे हैं। ऐसे में राज्यपाल रहे फागू चौहान का जाना और बिहार के नवनियुक्त राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर का आना सत्ता की लड़ाई में एक नया केंद्र बनता दिख रहा है। ऐसे में बिहार की राजनीति में कौन सा नया दरवाजा खुलने वाला है? क्या लोकसभा चुनाव के पहले राष्ट्रपति शासन के दौरान बीजेपी अपनी धार तेज कर बिहार में महागठबंधन के विरुद्ध मजबूत विपक्ष की तरह लड़कर परिणाम को प्रभावित करना चाहती है? ऐसे कई सवाल नए राज्यपाल के परिपेक्ष्य उठने लगे हैं।

क्यों हटाए गए राज्यपाल फागू चौहान?
राजनीतिक गलियारों में बिहार के राज्यपाल रहे फागू चौहान को मेघालय भेजे जाने को लेकर कई कारण गूंज रहे हैं। एक राय यह बनाई गई कि वीसी नियुक्ति को लेकर फागू चौहान की काफी बदनामी हुई। और बदनामी की यह आज केंद्र की सरकार को भी झुलसा रही थी। उच्चतम शिक्षा के धरातल पर कई ऐसे मामले उजागर हुए जहां दबी जुबान से ही सही पर राज्यपाल के नाम को आगे किया गया। यहां तक कि शिक्षा विभाग और राजभवन कई मामलों में आमने सामने होने के कारण केंद्र सरकार की फजीहत भी हो रही थी।

तीसरा आरोप यह भी था कि वह अतिपिछड़ा वोट बैंक को बीजेपी की ओर मोड़ने में असफल रहे। चौथा आरोप यह भी है कि राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश की राज्यपाल से अंडरस्टैंडिंग भी बन गई थी। जेडीयू नेता जगनारायण यादव तो कहते हैं कि नए राज्यपाल का आगमन राजनीति से प्रेरित है। इसे जातीय समीकरण से भी देखा जा रहा है। चुकी फागू चौहान अतिपिछड़ा वोट बैंक को बीजेपी की तरफ मोड़ने में असफल रहे।

बंगाल की तरह राज्यपाल चाहिए
जिस तरह से जगदीप धनखड़ ने पश्चिम बंगाल में राजपाल के रूप में रह कर ममता बनर्जी के विरुद्ध राजनीति के केंद्र बने रहे। फागू चौहान उस अंदाज में बिहार की राजनीति को बीजेपी से जोड़ नहीं पाए। केंद्रीय बीजेपी नेतृत्व ने भारी निराशा के बीच फागू चौहान को विदा किया है। जबकि जगदीप धनकड़ को प्रमोट करते उप राष्ट्रपति बनाया गया।

क्या कहा जो बना सत्ता के दो केंद्र
कहा जा रहा है कि राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर भी अति पिछड़ी जाति से आते हैं और उनके लाने का मकसद भी वोट की गोलबंदी करना है, ताकि लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी को फायदा हो। हुआ ऐसा कि नए राज्यपाल ने आते ही ने अपने एक बयान से ही राज्य की राजनीति को गरमा दिया है।

उन्होंने बिहार के संदर्भ में साफ कहा कि उनका प्रयास होगा राजभवन को लोक भवन में बदलने का। ताकी लोगों का पहुंचाना सुगम हो सके। यानी आते ही सत्ता के दो ध्रुव के संकेत दे डाले। और यह कहीं न कहीं राजनीति से प्रेरित भी लगता हैं। सत्ता से टकराव के मसले पर भी उन्होंने मुख्यमंत्री की सीमा और अपनी सीमा समझने की बात कह अपने तेवर का भी अहसास राज्य सरकार को करा दिया है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ ?
राजनीतिक विशेषज्ञ आलोक पांडे का मानना है कि बिहार में राज्यपाल का बदलाव नॉन पॉलिटिकल कतई नहीं है। यह पूरी तरह से चली गई राजनितिक चाल है। साथ ही यह बदलाव राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को असहज करने के ख्याल से किया गया है। मुझे तो लगता है कि यह कहीं ऑपरेशन लोटस तो नहीं? जनता दल यू के वरीय नेता जगनारायण यादव कहते हैं कि राज्यपाल रहे फागू चौहान अतिपिछड़ा वोट बैंक बीजेपी की तरफ नहीं मोड़ सके इसलिए उन्हें यहां से हटा मेघालय का राज्यपाल बना दिया।

ऐसे भी राज्यपाल तो केंद्र सरकार की कठपुतली होती है। काम आए तो ठीक नहीं तो वापसी तय होती है। देशप्राण के स्थानीय संपादक प्रवीण बागी का कहना है कि इनमें राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता का अभाव था। एक बार तो जातीय सम्मेलन में जा कर नरेंद्र मोदी को वोट देने की अपील तक कर बैठे। साथ ही बिहार में अभी राजनीतिक रूप से भरी उथल पुथल का माहौल है सरकार बदल सकती है। पार्टियां टूट सकती है। नए दावे पेश किए जा सकते थे। ऐसे में निर्णय करना या प्रतिक्रिया प्रगट करना हो सकता है। ऐसे में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने एक तेजतर्रार राजनीतिज्ञ को राज्यपाल बना कर भेजा है।

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