G20 इवेंट के बाद आगरा के किले में दरारें, आखिर धरोहरों की कीमत पर देश में क्यों गढ़े जा रहे ‘नए इतिहास

आगरा

आगरा के किले में 11 फरवरी को जी-20 कार्यक्रम आयोजित होने के बाद दीवान-ए आम की छत में दरारें दिखने लगीं। एक्सपर्ट्स ने अनुमान लगाया कि 17 वीं शताब्दी की इस इमारत के अंदर लगाए गए स्पीकरों से निकलने वाली तेज आवाज से दीवारों पर ये दरारें आई हैं। हालांकि, यह घटना महाराष्ट्र सरकार को शिवाजी महाराज की जयंती मनाने के लिए एक विश्व धरोहर घोषित इमारत में कार्यक्रम आयोजित करने से नहीं रोक पाई। महाराष्ट्र की बीजेपी समर्थित एकनाथ शिंदे की सरकार ने 19 फरवरी को औरंगजेब के उस दरबार में शिवाजी की जयंती मनाई, जहां उन्हें 1666 में बादशाह के द्वारा अपमानित किया गया था।

हैरानी की बात ये है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने महाराष्ट्र सरकार को इस ऐतिहासिक महत्व वाली इमारत में कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति नहीं दी थी। फिर भी वहां कार्यक्रम हुआ। एएसआई ने बाद में स्पष्ट किया कि इमारत के क्षतिग्रस्त हिस्से को इस कार्यक्रम से दूर रखा गया था। हालांकि, इस पूरी घटना से एक बात तो साफ हो जाती है कि हमारे मन में 357 साल पुराने अपमान का प्रतीकात्मक बदला लेने की भावना किसी ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण है। तभी तो किसी को भी इस बात की चिंता नहीं रही कि ऐतिहासिक महत्व वाले इन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय धरोहरों में कार्यक्रम आयोजित करने से उनके रख-रखाव और यथास्थिति को नुकसान पहुंच सकता है।

ऐसा पहली बार नहीं
हालांकि, भारत में यह पहली बार हो रहा है, ऐसा नहीं है। भारतीय विरासत संरक्षण की यह एक बारहमासी समस्या रही है। जब इसकी स्थापना हुई, तभी से वह इन चुनौतियों से जूझ रही है। स्वतंत्र भारत ने भी इतिहास की ‘गलतियों’ को सही करने के लिए जैसे एक अभियान छेड़ दिया था। तभी तो उसने विरासत संरक्षणवादियों और पुरातत्वविदों के विरोध को दरकिनार करते हुए गुजरात के सोमनाथ में एक नया मंदिर बनाने का फैसला किया था और इस प्रक्रिया में पुराने मंदिर के खंडहरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया। जवाहरलाल नेहरू ने ऐसा ‘इतिहास-सुधारकों’ के लिए ‘पालिम्प्सेस्ट पास्ट्स’ जैसे प्रसिद्ध संबोधन का इस्तेमाल किया था, जिसका मतलब होता है कि नया कुछ लिखने या बनाने के लिए अतीत को मिटाना।

सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के महत्वपूर्ण प्रस्तावक थे- केएम मुंशी। उन्हें तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का समर्थन हासिल था। मुंशी अपनी एक किताब में स्वीकार करते हैं कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण से पुरातत्वविद काफी नाराज हुए थे। मुंशी ने अपनी 1951 में लिखी एक पुस्तक ‘सोमनाथ: द श्राइन इटरनल’ में लिखा, ‘शुरुआत में कुछ ऐसे लोगों ने, जो जीवित मूल्यों की तुलना में मृत पत्थरों के अधिक शौकीन थे, इस बात पर अधिक बल दिया कि पुराने मंदिर के खंडहरों को एक प्राचीन स्मारक के रूप में बनाए रखा जाना चाहिए। हालांकि, हम अपने विचार पर दृढ़ थे कि सोमनाथ का मंदिर एक प्राचीन स्मारक नहीं था। यह पूरे देश की भावना में रहता था और इसका पुनर्निर्माण एक राष्ट्रीय प्रतिज्ञा थी।’

विरासत से पहले का इतिहास
दरअसल, केएम मुंशी का काम इतिहास को सहेजना नहीं था बल्कि इतिहास ‘बनाना’ था और उन्होंने इसे तब बहुत स्पष्ट कर दिया जब उन्होंने कहा कि मंदिर का संरक्षण केवल ऐतिहासिक जिज्ञासा का विषय नहीं होना चाहिए। उन्होंने लिखा, ‘मेरे कुछ विद्वान मित्रों के पास मेरी ‘बर्बरता’ को लेकर मेरे बारे में कहने के लिए बहुत मुश्किल बातें थीं। वे भूल गए कि मुझे इतिहास से लगाव है, लेकिन फिर भी मुझे रचनात्मक मूल्यों का भी शौक है।’

फिर भी एएसआई ने सोमनाथ जीर्णोद्धार का विरोध जारी रखा। इसके नतीजे के रूप में साल 1948 में स्वयं सरदार पटेल का मामले में हस्तक्षेप सामने आया। उन्होंने कहा (जैसा कि मुंशी ने उद्धृत किया था), ‘इस मंदिर के संबंध में हिंदू भावना मजबूत और व्यापक दोनों है। वर्तमान परिस्थितियों में, यह संभावना नहीं है कि मंदिर के जीर्णोद्धार से या उसके जीवन को लम्बा खींचकर वह भावना संतुष्ट हो जाएगी। मूर्ति का जीर्णोद्धार हिंदू जनता के लिए सम्मान और भावना का विषय होगा।’

डच मानवविज्ञानी पीटर वैन डेर हीर का मानना है कि सोमनाथ प्रकरण में पुरातत्वविदों और विरासत संरक्षणवादियों के जीर्णोद्धार के विरोध को एक औपनिवेशिक दृष्टिकोण के रूप में प्रचारित किया गया था, जिसे भारत के स्वतंत्र होने के साथ दूर किया जाना था। यह तर्क इस तथ्य से निकलकर सामने आता है कि साइट को लॉर्ड कर्जन (1899-1905) के वाइसरायल्टी के दौरान एक ‘प्राचीन स्मारक’ घोषित किया गया था।

कर्जन का भूला हुआ काम
लॉर्ड कर्जन को भारतीय राष्ट्रवादियों ने बंगाल का विभाजन करने वाले व्यक्ति के रूप में बदनाम किया था लेकिन उनका भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में अपेक्षाकृत सकारात्मक योगदान था। उन्होंने ताजमहल और आगरा के किले और दिल्ली में लाल किले समेत कई भारतीय स्मारकों के संरक्षण और उनके जीर्णोद्धार दोनों का काम किया था। आगरा के किले में शाहजहाँ की इमारतों में से एक पट्टिका अभी भी कर्जन के योगदान की याद दिलाती है। उन्होंने स्मारकों की सफेदी और प्लास्टर करने की प्रक्रिया का विरोध किया।

साल 1899 में आगरा के किले में दीवान-ए आम में किए गए पलस्तर के काम से वह नाराज हो गए थे। वायसराय को बताया गया कि इमारत में लगे पत्थरों को दरारों से बचाए रखने के लिए ये पलस्तर किए गए थे। कर्जन ने फिर भी इसके बाद अपील की कि रंगाई का काम बंद कर दिया जाए और इमारत को जिस स्थिति में है, उसी स्थिति में रखा जाए। वह ये जानकर भी नाखुश थे कि दिल्ली के लाल किले में दीवान-ए आम और दीवान-ए खास दोनों की छतों को फिर से रंगा जा रहा था।

पुरातत्व संरक्षण को लेकर कर्जन का अपना एक दर्शन था। उनका कहना था कि नए निर्माण (Modern Restoration) से ज्यादा पुराना और जीर्ण मूल (Originals) बेहतर होता है। एक बार कर्जन ने दिल्ली के दीवान-ए आम में मुगल सिंहासन के पीछे लगी टाइल्स को टूटा हुआ देखा। इसे 1857 की लूट के दौरान कोई उठा ले गया था। उसने इटली के शिल्पकार को वैसी ही टाइल्स बनाने के लिए दिल्ली भेजा। मुगल सिंहासन की इन टाइल्स को मूलतः वेनिस के ही शिल्पकार ऑस्टिन डी बोर्डो ने सम्राट शाहजहाँ के लिए बनाया था।

हालांकि, कर्जन का ज्यादा प्रभावी काम दिल्ली में ताज और लाल किले में मुगल उद्यानों को सजाना था। ये गार्डेन उपमहाद्वीप में बाद के सभी विरासत कार्यों के लिए बेहतरीन सैंपल माने गए। जब साल 1911 के दरबार का आयोजन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने किया, तो उनके पास कर्जन का ही मॉडल था, जिसको फॉलो किया जा सकता था। हार्डिंग ने अपने 1948 के संस्मरण, ‘माई इंडियन इयर्स, 1910-1916’ में लिखा, ‘दिल्ली का किला जो एक जंगल था, फव्वारों, पानी के नालों, हरे लॉन और झाड़ियों से जगमगा रहा था। साल 1911 का दरबार शाही धूमधाम और भव्यता में काफी बेहतरीन था और इसका केंद्र बिंदु मुगल किला था। किंग जॉर्ज पंचम और क्वीन मैरी ने मुगल किले परिसर की प्राचीर से जनता के सामने उपस्थिति दर्ज कराई, जो पहले के मुगल सम्राटों के झरोखा दर्शन की नकल थी। हालांकि, भारतीय राष्ट्रवादियों ने इसकी निंदा की। उन्हें ब्रिटिश मंशा के बारे में बहुत संदेह था।

नियम बने, फिर धज्जियां उड़ाईं
इतिहासकार जूली कोडेल लिखती हैं कि तीनों दरबारों (1877, 1903, 1911) के भारतीय प्रेस में तीखे आलोचक थे। कट्टरपंथी अमृता बाजार पत्रिका ने वायसराय के भाषण को ‘तुच्छताओं से भरा’ बताया। पानी की तरह पैसा बहाने के कारण बॉम्बे गजट ने भी दरबार का विरोध किया। बंगाली ने पूछा, ‘ब्रिटिश भारत में उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए लॉर्ड कर्जन ने क्या किया है?’ हिंदू पैट्रियट ने 1903 के दरबार को ‘एक असाधारण बर्बादी’ कहा और इसकी प्रदर्शनी को ‘पूर्व में ब्रिटेन की शक्ति और गौरव का प्रतीक’ माना।

औपनिवेशिक काल के बाद के भारत में भी धरोहरों के संरक्षण के लिए चुनौतियाँ आती रहीं। साल 1997 में, प्रसिद्ध संगीतकार यन्नी ने पृष्ठभूमि के रूप में ताजमहल के साथ एक संगीत कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसका पर्यावरणविदों और विरासत संरक्षणवादियों ने विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि तेज संगीत 17 वीं शताब्दी के मकबरे को प्रभावित कर सकता है और तेज रोशनी उन कीड़ों को आकर्षित कर सकती है जिनके मलमूत्र से इसके संगमरमर का क्षरण हो सकता है।

अदालत की मदद से संगीत का कार्यक्रम आगे टाल दिया गया, लेकिन अगली सुबह मकबरे में कीड़े पाए गए, जिससे संरक्षणवादियों की आशंका सही साबित हुई। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने स्मारक के चारों ओर शोर और प्रकाश के स्तर के लिए कुछ शर्तें निर्धारित कर दीं। हालांकि, इससे भी कोई सबक नहीं सीखा गया और यूपी सरकार ने कुछ साल बाद ‘ताज महोत्सव’ के दौरान चकाचौंध के बीच खूब शोर मचाया। आगरा के किले की हालिया घटना से ही पता चलता है कि भारत में विरासत की रक्षा करना एक कठिन लड़ाई क्यों है?

(लेखक एक पत्रकार हैं और कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में इतिहास में पीएचडी कर रहे हैं।)

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