समलैंगिक विवाह : विपक्षी दल खुलकर बोलने को राजी नहीं, सुप्रीम कोर्ट से चाहते हैं 377 जैसी पहल

नई दिल्ली

समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के सवाल पर विपक्षी दल चुप्पी साधे हुए है। क्योंकि इस यह पूरा मामला अब सुप्रीम कोर्ट में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का मामला सोमवार (13 मार्च) को 5 जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया। कोर्ट ने कहा कि इस पर अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी। केंद्र ने कोर्ट में दलील दी कि यह भारत की पारिवारिक व्यवस्था के खिलाफ है। इसमें कानूनी अड़चनें भी है।

कुछ नेताओं की व्यक्तिगत राय को छोड़कर अधिकांश दलों के नेताओं ने रिकॉर्ड से हटकर बोलते हुए कहा कि वे चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक विवाह के पक्ष में या उसके खिलाफ अपना फैसला सुनाए। जैसा कि उसने धारा 377 के मामले में किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में समलैंगिकता को अपराध मानने वाली धारा को खत्म कर दिया था।

कांग्रेस जिसने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया था। वो समलैंगिक विवाह को लेकर एक्टिव थी। पार्टी के विचार के बारे में पूछे जाने पर एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “यह शायद ही अब सोचने का मुद्दा है।” कुछ नेताओं ने निजी तौर पर तर्क दिया कि समान-सेक्स विवाह एक विदेशी कॉन्सेप्ट था और इस तरह के मुद्दे उनकी पार्टियों के एजेंडे में शामिल नहीं थे।

बृंदा करात ने समलैंगिक विवाह का किया समर्थन
समलैंगिक विवाह का खुले तौर पर समर्थन करने वालों में सीपीआई (एम) है। सीपीआई (एम) की वरिष्ठ नेता बृंदा करात ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘हम विवाह के रूप में अपने रिश्ते की कानूनी मान्यता प्राप्त करने के लिए समलैंगिक जोड़े के अधिकारों का समर्थन करते हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस तरह के अधिकार का समर्थन नहीं करती है।’

इससे पहले भी, सीपीआई (एम) और सीपीआई समान लिंग संबंधों के डिक्रिमिनलाइजेशन का स्पष्ट रूप से समर्थन करने वाली एकमात्र पार्टियां थीं, जब दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहली बार 2009 में फैसला सुनाया था कि दो वयस्कों के बीच सहमति से संभोग अवैध नहीं है।
शशि थरूर और मनीष तिवारी भी समर्थन में आए

समलैंगिक विवाह पर कांग्रेस के लोकसभा सांसद शशि थरूर ने कहा कि वह अपनी पार्टी की तरफ से नहीं बोल सकते, लेकिन वो व्यक्तिगत रूप से निश्चित समलैंगिक विवाह को मान्यता देने का समर्थन करेंगे। लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि वो निजी तौर समलैंगिक विवाह का समर्थन करते हैं, लेकिन मैं पार्टी की तरफ से नहीं बोल सकता। उन्होंने कहा कि एक सांसद के रूप में मेरा व्यक्तिगत विचार यह है कि सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा सर्वसम्मति से आईपीसी की धारा 377 को पढ़ने के बाद … यदि समान लिंग के लोग सेक्स करते हैं तो कोई आपराध नहीं है।

वरिष्ठ वकील और कांग्रेस के राज्यसभा सांसद अभिषेक सिंघवी, जो एक पक्ष के मुख्य वकील हैं। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा कि अगर बीजेपी सरकार ऐसा करती है, तो यह ज्यादातर याचिकाकर्ताओं को संतुष्ट करेगी। हालांकि, उन्होंने कहा, “यह एक काल्पनिक और अर्थहीन सवाल है, क्योंकि सरकार ने समलैंगिक विवाह का मुखर विरोध किया है और कोई भी कानून केवल स्पष्ट रूप से इसे प्रतिबंधित करेगा, इसकी अनुमति नहीं देगा। वहीं इस कांग्रेस की तरह अन्य पार्टियों ने भी इस सवाल को टाल दिया।

सूत्रों के अनुसार, एक नेता जो इस मामले में अपना व्यक्तिगत समर्थन दे सकता है, वह तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा में उसके नेता डेरेक ओ’ब्रायन हैं। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने समान लिंग विवाह को वैध बनाने की मांग करने वाले एक निजी सदस्य के विधेयक को पेश करने के लिए नोटिस दिया था, हालांकि इस मामले पर उनकी पार्टी का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं है।

जद (यू) के रुख के बारे में पूछे जाने पर पार्टी के नेता केसी त्यागी ने कहा कि मैं इस मामले में अपडेट नहीं हूं। मैं इतनी जल्दी प्रतिक्रिया नहीं दे सकता। मुझे इस पर विचार करने दें। हिंदी भाषी क्षेत्र से एक पार्टी के एक अन्य नेता ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से मानते हैं कि सरकार को “वास्तविकता” को स्वीकार करना चाहिए और समलैंगिक विवाह को वैध बनाना चाहिए, लेकिन यह उनकी अपनी राय है न कि पार्टी की।

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