UP निकाय चुनाव में कम वोटिंग करेगी सियासी उम्मीदों पर चोट! BJP से लेकर सबकी नजर बागियों पर

लखनऊ

शहरी निकाय चुनाव के पहले चरण में घटी वोटिंग ने प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ा दी हैं। खास तौर पर नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर कम वोटिंग से सियासी उम्मीदों पर ‘चोट’ लगने का खतरा और गहरा गया है। मेयर की सीटों पर भी समीकरण प्रभावित होते नजर आ रहे हैं। पहले चरण के 37 जिलों में 33 में मतदान का आंकड़ा 2017 के मुकाबले कम है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में जहां मतदान के आंकड़े चुनाव-दर-चुनाव बढ़ रहे हैं, वहीं शहरी निकाय के चुनावों में उलटा ट्रेंड देखने को मिला है। गोरखपुर, जौनपुर, मुरादाबाद और सहारनपुर को छोड़कर पहले चरण के बाकी 33 जिलों में मतदान का आंकड़ा पिछली बार से कम रहा। हालांकि, जौनपुर और मुरादाबाद में मतदान में हुई बढ़ोतरी मामूली ही है।

सहारनपुर के शहरी निकायों में कुल मतदान का आंकड़ा जरूर पिछली बार से करीब 4 प्रतिशत अधिक है, लेकिन नगर निगम में ट्रेंड उलट है। यहां इस बार करीब 55 प्रतिशत मतदान हुआ है जो 2017 के मुकाबले करीब 6 प्रतिशत कम है। 2017 में भाजपा ने यह सीट बसपा से 2000 से भी कम वोटों से जीती थी। इसकी वजह बनी थी कांग्रेस। इमरान मसूद की सरपरस्ती में लड़े कांग्रेस उम्मीदवार को 60 हजार वोट मिले थे और त्रिकोणीय लड़ाई में बसपा जीतते-जीतते रह गई। इस बार यहां भाजपा, सपा और बसपा के बीच कड़ा मुकाबला है। बसपा की चुनावी रणनीति इमरान मसूद ने संभाल रखी है और सपा के विधायक आशु मलिक ने। मलिक ने अपने भाई को चुनाव में उतारा है। यहां चुनावी माहौल जिस तरह से गर्म था, उसमें अल्पसंख्यक बहुल सीट पर वोटिंग बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन मतदाताओं ने झटका दे दिया। घटे वोट किसके लिए मुसीबत बनेंगे, इसे लेकर गुणा-गणित तेज हो गया है।

अतीक की हत्या का वोटिंग पर असर?
इसी तरह आगरा नगर निगम में भी करीब 3 प्रतिशत वोट कम पड़े हैं। सपा के गढ़ रहे फिरोजाबाद में पिछली बार त्रिकोणीय लड़ाई में भाजपा का काम बन गया था। इस बार यहां भी करीब 6 प्रतिशत कम वोटिंग हुई है। जिस प्रयागराज में अतीक अहमद की हत्या से पूरे देश में सियासी उबाल आया, वहां के भी करीब 70 प्रतिशत वोटर मेयर के चुनाव में वोट देने नहीं निकले। इन आंकड़ों से सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की ही चिंता बढ़ी हुई है। हालांकि, पार्टियों का दावा है कि उनके वोटरों और समर्थकों का उन्हें पूरा साथ मिला है।

बागियों की भूमिका हो जाएगी अब और अहम
टिकट का आस पूरी न होने के चलते भाजपा, सपा, बसपा, रालोद और कांग्रेस सहित सभी प्रमुख दलों के बागी चुनाव मैदान में हैं। मूल पार्टी के उम्मीदवार के लिए वे ‘वोटकटवा’ के तौर पर पहले ही खतरा थे। अब कम वोटिंग के आंकड़े इस संकट को और बढ़ाएंगे। आजम खान के रसूख का सवाल माने जानी वाली रामपुर नगर पालिका में महज 38 प्रतिशत वोटिंग हुई है। वहीं, उनके बेटे अब्दुल्लाह आजम की सदस्यता रद होने के चलते उपचुनाव के रंग में रंगे स्वार में वोटिंग का आंकड़ा 70 प्रतिशत से अधिक हैं। जानकारों का कहना है कि घटी वोटिंग से न केवल नगर निगम और नगर पालिकाओं के प्रमुख के पदों के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं, बल्कि पार्षद-वॉर्ड सदस्यों के चुनाव पर भी इसका असर दिखेगा। स्थानीय प्रभाव, व्यक्तिगत संपर्कों से प्रभावित होने वाली इन सीटों के नतीजे बिखरेंगे तो दलों को सदन में बहुमत हासिल कर पाना भी मुश्किल हो जाएगा।

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