निकाय चुनाव में CM योगी ने साधे ऐसे समीकरण, यूपी में बन गया BJP का ट्रिपल इंजन

नई दिल्ली,

उत्तर प्रदेश के नगर निकाय चुनाव की मतगणना जारी है. अभी तक के नतीजों से एक बात साफ है कि बीजेपी नगर निगम की मेयर से लेकर नगर पालिका और नगर पंचायत अध्यक्ष पद की सीटों पर जीत दर्ज करती नजर आ रही है. मेयर के चुनाव में सपा और कांग्रेस का तो खाता खुलता भी नजर नहीं आ रहा है जबकि बसपा जरूर बीजेपी को टक्कर देती हुई दिखी है. नगर पालिका और पंचायत में जरूर सपा को बसपा-कांग्रेस से ज्यादा सीटें मिलती दिख रही हैं, लेकिन निर्दलीय को पीछे नहीं छोड़ पाई है.यूपी में नगर निकाय की कुल 760 सीटों पर चुनाव हुए हैं, जिनमें 17 नगर निगम, 199 नगर पालिका और 544 नगर पंचायत की सीटें हैं. इसके अलावा 13 हजार के करीब वार्ड सदस्य की सीटें है.

नगर निगम की 17 मेयर सीटों में से बीजेपी 16 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है जबकि एक सीट पर बसपा आगे चल रही है. नगर पालिका अध्यक्ष की 199 सीटों में से बीजेपी 88 सीटें और उसके बाद निर्दलीय दूसरे नंबर पर रहे हैं. इसी तरह नगर पंचायत की 544 अध्यक्ष पर की सीटों में 170 सीटों पर बीजेपी और उसके बाद 150 सीट पर निर्दलीय जीत दर्ज करती दिख रही है. बसपा, सपा और कांग्रेस के उम्मीदार निर्दलीय से पीछे दिख रहे हैं.

निकाय चुनाव में सबसे ज्यादा प्रतिष्ठा बीजेपी की दांव पर लगी थी, क्योंकि शहरी इलाके हमेशा से बीजेपी के गढ़ रहे हैं. पिछली बार बीजेपी मेयर चुनाव में बेहतर प्रदर्शन था, लेकिन नगर पालिका और नगर पंचायत में पिछड़ गई थी. इस बार के चुनाव में बीजेपी ने मेयर से लेकर नगर पालिका और पंचायत अध्यक्ष सीटों पर भी जीत का परचम फहराया है.

समीकरण बीजेपी के पक्ष
निकाय चुनाव में अहम भूमिका सवर्ण मतदाताओं का रहा. शहरी क्षेत्र में ब्राह्मण, वैश्य, कायस्थ, पंजाबी मतदाता निर्णायक भूमिका में है, जिसके चलते बीजेपी ने सवर्णों को मैदान में उतारने का दांव पूरी तरह सफल रहा. मेयर के लिए बीजेपी पांच ब्राह्मण, चार वैश्य प्रत्याशी उतारकर शहरी सीटों के समीकरण को पूरी तरह से अपने पक्ष में कर लिया. सवर्ण वोटर बीजेपी का कोर वोटर्स है, जिसके चलते पार्टी ने एकतरफा जीत हासिल की है.

शहरों में बीजेपी का प्रदर्शन बेहतर रहा
शहरी इलाकों में बीजेपी का प्रदर्शन हमेशा से बेहतर रहा है. बीजेपी 2017 से पहले जब सत्ता से बाहर थी तब भी निकाय चुनाव में शानदार प्रदर्शन करती रही है. बीजेपी का राजनीतिक जनाधार शहरी इलाकों में हमेशा से रहा है, जिसके दम पर बीजेपी निकाय चुनाव में जीत दर्ज करती रही है. मौजूदा समय में बीजेपी सत्ता में रही है, जिसका सियासी फायदा भी उसे मिला है. पिछली बार 16 मेयर में 14 मेयर जीत दर्ज की थी और इस बार क्लीन स्वीप करती हुई दिख रही है.

कैंडिडेट का चयन बेहतर रहा
बीजेपी ने नगर निकाय चुनाव की तैयारी 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद ही शुरू कर दी थी. बीजेपी ने अपने मंत्री और विधायक के परिवार के सदस्यों को टिकट न देकर पार्टी के कार्यकर्ताओं को चुनावी मैदान में उतारा. इसके अलावा नगर निगम और नगर पालिक के लिए जिन सीटों पर मौजूदा मेयर और अध्यक्ष के खिलाफ माहौल नजर आ रहा था, उनका टिकट काट दिया. बीजेपी की अपनी आधी से ज्यादा मौजूदा मेयर की जगह नए और युवा चेहरे को उतारकर सत्ता विरोधी लहर निपटने की रणनीति काम आई.

योगी टीम का उतरना सफल रहा
नगर निकाय चुनाव में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक सहित सभी मंत्री पूरे दमखम के साथ जुटे थे. सीएम योगी ने ताबड़तोड़ जनसभाएं कीं. उन्होंने 75 में से आधे से ज्यादा जिलों में चुनावी रैलियां कीं. इसके अलावा दोनों डिप्टी सीएम, सभी मंत्री, विधायक, सांसद भी चुनावी रण में जुटे रहे. बीजेपी ने विधानसभा और लोकसभा की तरह निकाय चुनाव लड़ा, जिसका उसे सियासी फायदा मिला. अखिलेश यादव कुछ चुनिंदा सीटों पर ही जाकर प्रचार किए जबकि मायावती और प्रियंका गांधी नजर नहीं आईं.

पसमांदा दांव आया काम
बीजेपी ने नगर निकाय चुनाव में पहली बार 350 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे और उसमें 90 फीसदी पसमांदा मुस्लिम थे. नगर निगम में पार्षद उम्मीदवार, नगर पालिका की छह अध्यक्ष और सभासद सीटों पर मुस्लिम कैंडिडेट दिए. इसी तरह नगर पंचायत में अध्यक्ष पद की 38 सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे.

पश्चिमी यूपी की 18 नगर पंचायत अध्यक्ष के लिए मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में हैं. ब्रज क्षेत्र में 8, अवध क्षेत्र में छह, गोरखपुर क्षेत्र में दो मुस्लिम चेहरों को प्रत्याशी बना रखा है. सहारनपुर, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, शामली, गोरखपुर, जौनपुर, लखनऊ सहित कई जिलों में सभासद और पार्षदों के टिकट भी मुस्लिमों को दिए गए हैं. यह प्रयोग सफल रहा और मुस्लिम बहुल बूथों पर जीत मिली.

आधी आबादी पर बीजेपी का फोकस
बीजेपी ने आधी आबादी यानी महिला वोटर्स पर फोकस बढ़ाया था, क्योंकि निकाय चुनाव में 37 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. इसके लिए पार्टी ने महिला मोर्चा को काफी पहले से काम के लिए जमीन पर उतार रखा था. बीजेपी महिलाओं के लिए ‘सहभोज’ का आयोजन किया. इस सहभोज में मुस्लिम और दलित महिलाओं को खास तौर कर बुलाया गया था.बीजेपी के जीत में महिला मतदातओं की अहम रोल रहा.

बीएसपी की मुस्लिम दांव से बिगड़ा खेल
नगर निकाय चुनाव में बसपा ने मुस्लिम दांव चला था. नगर निगम में 64 फीसदी बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारे थे. इसके अलावा नगर पंचायत और नगर पालिका सीट पर भी मुस्लिम कार्ड खेला. सपा और कांग्रेस ने 23-23 फीसदी मुस्लिम दांव लगाया. बसपा के मुस्लिम पालिटिक्स ने सपा के सारे समीकरण को बिगाड़ दिया. बसपा ने खुद जीती और न ही सपा-कांग्रेस को जीतने दिया.

बसपा के मुस्लिम दांव की वजह से सहारनपुर, मेरठ, अलीगढ, मुरादाबाद, बरेली, लखनऊ, शाहजहांपुर सीट पर मुस्लिम वोटों के बिखराव का सीधा फायदा बीजेपी को मिला. प्रयागराज और वाराणसी में त्रिकोणीय लड़ाई मानी जा रही थी जबकि झांसी और आगरा में बीजेपी और बसपा के बीच सीधा मुकाबला रहा. फिरोजाबाद में सपा और बीजेपी लड़ी, लेकिन असदुद्दीन ओवैसी और बसपा ने खेल बिगाड़ दिया.

सपा ने फिर दोहराई 2022 की गलती
नगर निकाय चुनाव में सपा फिर 2022 वाली गलती दोहराई, जिसका चुनावी फायदा सीधा बीजेपी को मिला. सपा ने कई ऐसे प्रत्याशी को मैदान में उतारा, जो न समीकरण में कहीं फिट बैठ रहे थे और न ही उनका कोई सियासी आधार था. शाहजहांपुर में सपा ने जिसे टिकट दिया, वो बीजेपी में शामिल होकर चुनावी मैदान में उतर गई. बरेली में सपा ने अपने प्रत्याशी से नामांकन दाखिल होने के बाद पर्चा उठवाकर निर्दलीय को समर्थन दिया. रायबरेली नगर पालिका सीट पर बगावत का खामियाजा सपा को भुगतना पड़ा तो पश्चिमी यूपी में सपा ने आरएलडी के साथ तालमेल नहीं बनाकर रख सकी.

कांग्रेस अपने गढ़ से बाहर बेहाल
कांग्रेस को नगर निकाय चुनाव में करारी मात खानी पड़ी है, लेकिन अपने गढ़ को बचाए रखने में सफल रही है. रायबरेली की नगर पालिका और अमेठी की जायस सीट कांग्रेस की झोली में जाती दिख रही है. ऐसे ही अमेठी की मुसाफिरखाना सीट पर भी निर्दलीय को समर्थन कर जीत का दर्ज किया. इसके अलावा मुरादाबाद मेयर सीट पर जरूर बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन बाकी जगह पर कोई खास असर नहीं रहा. कांग्रेस के दिग्गज नेता भी चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखे, जिसके चलते पार्टी का कोर वोटबैंक दूसरे दलों में शिफ्ट हो गया. इसका बीजेपी को फायदा मिला.

 

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