कर्नाटक जीत से कितनी प्रभावित होगी गुजरात की राजनीति?, क्यों फेल हुआ गुजरात का हिट स्लोगन

अहमदाबाद

एक बड़ी जीत आत्मविश्वास से भर देती है। कर्नाटक की जीत के बाद इसकी एक झलक गुजरात कांग्रेस नेताओं में देखने को मिल रही है। कर्नाटक के चुनावों में राज्य कांग्रेस के ज्यादा नेताओं की ड्यूटी नहीं लगी थी। चुनावों में जीत के बाद विधायक दल के नेता के चुनाव के लिए दीपक बाबरिया जरूर प्रेक्षक बनकर वहां पहुंचे हैं, लेकिन कांग्रेस की जीत से प्रदेश अध्यक्ष जगदीश ठाकोर से लेकर विधायक दल के नेता अमित चावड़ा और कांग्रेस कार्यकर्ता उत्साहित दिख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि इस जीत से पार्टी को ताकत मिली है। इसका लाभ गुजरात में मिलेगा? कम से कम लोकसभा चुनावों में अच्छी रणनीति बनाकर बीजेपी को वॉकओवर देने जैसी स्थिति को रोक जा सकता है। कर्नाटक में नई सरकार की ताजपोशी के बाद कांग्रेस प्रदेश में राहुल गांधी का एक बड़ा कार्यक्रम करने की तैयारी कर रही है। तो वहीं कर्नाटक में चुनावों के बीजेपी में खामोशी है। राज्य में 128 नेताओं की कर्नाटक चुनावों में ड्यूटी लगी थी। कर्नाटक के लंबे प्रवास पर रहे नेता गुजरात वापस लौट चुके हैं लेकिन नो कमेंट के मूड में हैं।

गुजरात में हिट, कर्नाटक में फेल
बीजेपी ने गुजरात चुनावों में रिकॉर्ड तोड़ देने वाले भरोसे नी भाजप सरकार यानी ‘भरोसे वाली भाजपा सरकार’ के नारे के साथ कर्नाटक चुनाव लड़ा था। इसके साथ पार्टी ने डबल इंजन की सरकार, सपना साकार नारे का भी इस्तेमाल किया था, लेकिन पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। उसके वोट प्रतिशत में भले ही मामूली गिरावट आई लेकिन उसने काफी सीटें गंवा दीं। बीजेपी के रणनीतिकारों को बजरंग बली के मुद्दे के बाद उम्मीद थी कि पार्टी अच्छा करेगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। गुजरात के प्रदेश अध्यक्ष और बीजेपी पेज समिति से नए चाणक्य बनकर उभरे सीआर पाटिल जरूर कर्नाटक नहीं गए लेकिन उनकी कोर टीम के तमाम नेताओं की ड्यूटी कर्नाटक में रही। पाटिल की जूनियर टीम अब मंथन कर रही है कि आखिरी वे कौन से कारण रहे जिनके चलते बीजेपी को बड़ी हार हुई और उसे सिर्फ 65 सीटें ही मिल पाईं।

क्या कांग्रेस करेगी फाइट बैक?
गुजरात चुनावों में बीजेपी ने 156 सीटें जीती थी। बीजेपी ने इस बड़ी जीत को पूरे देश में भुनाया था। कांग्रेस को हिमाचल में जीत और गुजरात में हार मिली थी, लेकिन क्या कर्नाटक में मिली 136 सीटें गुजरात में उसका मनोबल बढ़ाएंगी? इस सवाल पर राजनीतिक विश्लेषक बंटे हुए हैं। कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के पीछे सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है कि पार्टी वहां पर एकजुट होकर लड़ी। इतना ही नहीं प्रत्याशियों का चयन भी काफी पहले से कर लिया था। इसके बाद पार्टी सरकार की नाकामियों को जनता तक ले जाने में सफल रही। इसके चलते बोम्मई सरकार की विदाई हो गई। वरिष्ठ पत्रकार दिलीप गोहिल कहते हैं मोरल बूस्टिंग हुई है। यह कहना कि वहां की जीत से यहां कुछ बदल जाएगा। यह बहुत जल्दबाजी होगी। अगर कांग्रेस आने वाले राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी अच्छा करती है तो फिर गुजरात में स्थिति बदल सकती है।

सौराष्ट्र हेडलाइन के चीफ एडीटर जगदीश मेहता थोड़ी अलग राय रखते हैं कि कहते हैं कि पहली कांग्रेस आपस में लड़ने की बजाए एकजुट होकर लड़ी। इसका नतीजा है कि उन्हें बड़ी विजय मिली और बीजेपी की सीटें बढ़ने की बजाए घट गईं। निश्चित तौर पर इससे कांग्रेस को फायदा मिलेगा। गुजरात कांग्रेस के कार्यकर्ताओं और नेताओं का मनोबल ऊंचा हुआ है। अब देखना यह है कि वे इस नए मनोबल से क्या हासिल करते हैं? मेहता ने कहा निश्चित तौर पर बीजेपी को नए सिरे अपनी रणनीति बनानी होगी। भ्रष्टचार के मुद्दे पर उनके पास कोई जवाब नहीं रहा। इसने पीएम मोदी के करिश्माई चुनाव प्रचार को प्रभावित किया।

वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पटेल कहते हैं कि कर्नाटक की जीत का गुजरात में कोई असर नहीं होगा। गुजरात में बीजेपी इसलिए जीतती है क्यों कांग्रेस कमजोर है। कांग्रेस क्यों कमजोर है इसके लिए कुछ कहने की जरूरत नहीं है। पटेल बेबाकी से कहते हैं अगले पांच साल तक मुझे कांग्रेस की स्थिति में परिवर्तन दिखाई नहीं देता है। कांग्रेस को जिन मुद्दों पर काम करने की जरूरत है वहीं नहीं करती है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक डॉ. जयेश शाह कहते हैं कि कर्नाटक की हार निश्चित तौर पर बीजेपी के लिए चिंता लेकर आई हैं। पार्टी को दक्षिण के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। शाह कहते हैं इससे पहले पार्टी को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कड़ी परीक्षा देनी होगी। कर्नाटक की हार में पार्टी नेताओं की बगावत, मुस्लिमों की एकतरफा वोटिंग और जेडीएस का कमजोर पड़ा बड़े कारण रहे। शाह कहते हैं कर्नाटक की जीत पर पटाखे फोड़ने से स्थिति नहीं बदलेगी। गुजरात कांग्रेस को सर से लेकर पैर तक पसीना बहाना होगा। तभी यहां वह बीजेपी का मुकाबला कर सकती है।

कर्नाटक चुनावों में रही गुजरात की गूंज
कर्नाटक के विधानसभा चुनावों गुजरात की गूंज रही। पार्टी ने गुजरात में रिकॉर्डतोड़ जीत को भुनाने के यहां के दोनों सफल नारों का उपयोग किया। भरोसे की भाजपा सरकार और डबल इंजन सरकार, सपना साकार। इसके अलावा गुजरात चुनावों में बड़ी संख्या में गुजरात के नेताओं की ड्यूटी भी लगाई गई, हालांकि उन्हें भाषा की समस्या आई। जब चुनाव आगे बढ़ा तो नंदिनी बनाम अमूल का मुद्दा भी उठा। ऐसा कहा जा रहा है कि कांग्रेस कन्नड़ा प्राइड से इसको जोड़ने में सफल रही।

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