रिटायर होने जा रहे सीनियर जज ने ऐसा क्या किया, ‘बौद्धिक बेईमानी’ कह SC ने लगाई फटकार

नई दिल्ली

लखनऊ के एक वरिष्ठ जज से सुप्रीम कोर्ट काफी नाराज है। वजह जमानत न दिए जाने से जुड़ी है। जिस केस में कस्टडी की जरूरत ही नहीं होती उसमें भी ट्रायल कोर्ट के जज ने जमानत नहीं दी। इसी पर सुप्रीम कोर्ट नाराज हो गया। ऐसे में कोर्ट ने यह कहते हुए सख्त आदेश जारी किया कि 21 मार्च को दिए आदेश में SC ने आदेश का पालन न करने को लेकर स्पष्ट चेतावनी दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ऐसे मजिस्ट्रेट से न्यायिक कामकाज वापस ले लिया जाएगा और उसे प्रशिक्षण के लिए जूडिशल एकेडमी भेज दिया जाए। SC का यह आदेश जज के करियर ग्रोथ को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में उन्होंने जस्टिस संजय किशन कौल और एहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ के समक्ष आदेश वापस लेने की विनती की।

उनकी तरफ से वरिष्ठ वकील पीएस पटवालिया ने कहा कि जज ने 33 साल न्यायपालिका की सेवा की है और अब रिटायरमेंट के करीब हैं। उनके प्रमोशन पर भी विचार हो रहा है। उन्होंने दलील दी कि अगले महीने के आखिर में जज को रिटायर होना है। हालांकि बेंच ने कहा कि उसका आदेश काफी स्पष्ट था लेकिन जज ने पालन नहीं किया। पीठ ने कहा कि आरोपी को कस्टडी में भेजने की कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि उन्हें जांच और चार्जशीट फाइल करने के दौरान कभी गिरफ्तार नहीं किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘हम आपको संदेह का लाभ नहीं दे सकते।’

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बौद्धिक बेईमानी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जजों को बेल देते समय अपने अप्रोच को बदलने की जरूरत है। कोर्ट ने कहा, ‘मैं आरोपी को बेल नहीं दूंगा- जजों का यह रवैया है, जो एक बड़ी समस्या है। जमानत न देना बौद्धिक बेईमानी है।’ पटवालिया ने सहानुभूति के नजरिए से कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश की, बेंच ने कहा कि उसका प्रतिकूल आदेश ज्यादा जरूरी था क्योंकि वह (जज) काफी सीनियर थे लेकिन उन्होंने सप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन किया। कोर्ट ने आगे कहा कि यह (जज के खिलाफ आदेश) दूसरों के लिए उदाहरण है।

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