बैंक में नहीं सीधे हाथ में नकद दी जाएगी पेंशन, इस राज्य के फैसले पर भड़के धर्मेंद्र प्रधान

नई दिल्ली

देश में कई ऐसी योजनाएं लागू कर दी गई हैं कि जिसका सीधा लाभ लोगों को उनके बैंक अकाउंट में मिलता है, यानी डायरेक्ट बैंक ट्रांसफर की सुविधा का काफी विस्तार हो चुका है। अब जब ज्यादातर राज्यों में यही परंपरा का पालन किया जा रहा है, उस समय ओडिशा ने एक ऐसा फैसला लिया है जिसे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ‘पीछ धकेलने’ वाला मान रहे हैं।

ओडिशा ने ऐसा फैसला क्यों लिया?
असल में ओडिशा में पेशन की एक योजना चलती है जिसके तहत पहले लोगों को सीधे बैंक में ही पैसा ट्रांसफर किया जाता था, लेकिन अब वही पैसा नकद में दिया जाएगा, यानी कि कैश। सरकार का तर्क है कि कई लोग अपना पैसा बैंक से नहीं निकाल पा रहे थे, कई तरह की तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था, इसी वजह से अब राज्य सरकार ने नकद पर आने का फैसला किया है।

राज्य में कौन सी पेंशन योजना चल रही?
जानकारी के लिए बता दें कि कई सालों से ओडिशा में मधु बाबू पेंशन योजना चल रही है। राज्य सरकार ने साल 2008 में इसे शुरू किया था। इस योजना के जरिए 60 से ज्यादा उम्र के उन लोगों को पेंशन देने की बात थी जो गरीबी रेखा से नीचे के थे। वहीं दिव्यांग, विधवा और ट्रांसजेंडर को तो किसी भी उम्र में इस योजना का फायदा मिलता है। अब 60 से 79 उम्र के लोगों को महीने के 500 रुपये दिए जाते हैं, वहीं 80 साल से ज्यादा के लोगों को 700 रुपये।

डीबीटी से कितनों को मदद पहुंची?
वर्तमान में 28.5 लाख लोगों को डीबीटी के जरिए ही इस योजना का लाभ मिल रहा था, लेकिन अब इस प्रक्रिया को पूरी तरह बदलने का फैसला किया गया है। लोगों को हर महीने की 15 तारीख को पेंशन के पैसे नकद में दिए जाएंगे। यहां ये समझना जरूरी है कि ओडिशा में बैंकिंग सुविधा ज्यादा मजबूत नहीं है, कई ग्राम पंचायतें ऐसी हैं जहां पर अभी भी बैंक नहीं है, ऐसे में सरकार को पैसे ट्रांसफर करने में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था।

धर्मेंद्र प्रधान का राज्य सरकार पर हमला
अब राज्य सरकार ने तो अपने तर्क रख दिए हैं, लेकिन केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस फैसले की आलोचना की है। उनके मुताबिक ये फैसला एक बार फिर भ्रष्टाचार की जड़ों को मजबूत कर सकता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इस फैसले पर फिर सोचना चाहिए, जब प्रयास किया जा रहा है कि कैसे भ्रष्टाचार मुक्त गवर्नेंस की ओर बढ़ा जाए, तब ऐसे फैसले पीछे ले जाने वाले साबित होते हैं।

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