जातिगत सर्वे की रिपोर्ट बिना सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के, इतनी हड़बड़ी क्यों?

नई दिल्ली,

बिहार के सीएम मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातिगत सर्वेक्षण के नतीजों को जनता के सामने लाकर खूब वाह वाही बटोरी है. क्योंकि बिहार ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है. तमिलनाडु, कर्नाटक और यहां तक ​​कि केंद्र सरकार (सामाजिक आर्थिक और जाति जनगणना 2011) ने भी अतीत में जाति डेटा एकत्र किया लेकिन परिणामों को सामने लाने का साहस कोई नहीं कर सका.हालांकि बिना सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के सामने आने तक यह प्रयास अधूरा ही कहा जाएगा. सही मायने में समाज में हाशिए पर बैठे लोगों को न्याय तभी मिल सकेगा जब सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के सात जाति सर्वे की रिपोर्ट प्रकाशित होगी. बताया जा रहा है कि सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के साथ रिपोर्ट पेश होने में करीब डेढ से 2 महीने अभी और लगेंगे.

इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई बिहार सरकार ने
बिहार सरकार की ओर से सर्वेक्षण के आर्थिक नतीजों को रोकने का कोई कारण नहीं बताया गया.पर इतना क्लियर हो रहा है कि स्टेप बाई स्टेप रिपोर्ट पेश करने का माजरा यही है कि जातियों की जनगणना के मुद्दे को आगामी चुनावों तक जीवित रखा जाए. जातिगत सर्वे की रिपोर्ट भी जिस तरह से सामने रखी गई उसको लेकर पूर्व में कोई जानकारी नहीं दी गई. अचानक बिहार सरकार के कुछ अफसर पीसी बुलाते हैं और रिपोर्ट को सामने रख देते हैं. कायदे से तो यह होना चाहिए था कि विधानसभा सत्र में इसे रखा जाता .इस पर विधानसभा में बहस भी हो जाती. ये भी नहीं होता तो कम से कम एक दिन पहले टाइम बता दिया जाता. पर सब कुछ इतनी जल्दी बाजी में होना ही इसे शक के दायरे में रख देता है. बिना सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण के आधी अधूरी रिपोर्ट पेश करने की अभी जरूरत ही क्या थी. डेढ़ महीने का इंतजार नहीं कर सकती थी बिहार सरकार? क्या जातिगत जनगणना और ओबीसी के हितों की बात करते हुए राहुल गांधी पिछड़ों के हितैषी न बन जाएं इसलिए नीतीश सरकार ने हड़बड़ी की या कुछ और ही बात है जिसे छुपा रही है सरकार ?

क्या मनमुताबिक डेटा नहीं होने के चलते टाला गया
कुछ राजनीतिक विश्वलेषकों का कहना है कि हो सकता है कि सर्वे के आंकड़े ऐसे न हो जो नीतीश सरकार के इच्छाओं के अनुकूल हो. इसलिए जानबूझकर सामाजिक और आर्थिक सर्वे की रिपोर्ट को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया हो. अभी भी कई तरह के आरोप लग रहे हैं. कई आंकड़ों को गलत बताया जा रहा है. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि कैसे भूमिहार लोगों की आबादी कुर्मी आबादी से कम हो सकती है. कुशवाहा कह रहे हैं कि हमारी आबादी तो कुर्मियों से दोगुनी होगी और हमें कम दिखाया गया है. कायस्थों का कहना है कि हम तो हैं ही नहीं. बिहार को नजदीक से देखने वाले भी कह रहे हैं कि कास्ट सेंसस के कई आंकड़े ग्राउंड पर वैसे नहीं दिखते जैसी रिपोर्ट में है .लोक जनशक्ति पार्टी राम विलास के मुखिया चिराग पासवान का कहना है कि सर्वे में पक्षपात किया गया है. कुछ जातियों को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया है जबकि कुछ को जानबूझकर कम बताया गया है. पासी जाति को कम करके बताया गया है. उन्होंने इस सर्वे को एक घोटाला बताया है. सामाजिक और आर्थिक सर्वे को डेढ़ महीने बाद सामने लाने की बात इस तरह के कई आरोपों को बल दे रहे हैं.

90 सालों में बहुत सी जातियों की हैसियत बदली है
बिना सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के कैसे तय होगा कि आज के परिवेश में कौन अगड़ा है और कौन पिछड़ा? मंडल कमीशन ने जो रिपोर्ट दी थी वह 1931 के जनगणना के आधार थी. उसी जनगणना के आधार पर आज 27 प्रतिशत आरक्षण ओबीसी जातियों को मिल रहा है. भारत की आजादी के बाद बहुत सी जातियों का उत्थान हुआ है.इसे सबसे आसान तरीके से इस तरह समझा जा सकता है कि 1952 में संसद में कितने ओबीसी जनप्रतिनिधि संसद पहुंचकर गए थे आज कितने सांसद पहुंच रहे हैं? इसी तरह अखिल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं को देखा जा सकता है. जाहिर है कि बहुत सी जातियों ने इन 90 सालों में बहुत तरक्की की है. अगर सामाजिक आर्थिक आंकड़े सामने आएंगे तो ही पता चलेगा कि कौन सी जातियां पिछड़ी रह गईं और किन जातियों को अब आरक्षण की जरूरत नहीं रह गई है. संभवतः यादव और कुर्मी जातियों ने इन 90 सालों में इतनी उन्नति तो जरूर कर ली है कि उन्हें सामान्य वर्ग में लाया जा सके. क्योंकि उनसे खाली हुई जगह पर जो लोग प्रगति नहीं कर सकें उनके आगे बढ़ने का रास्ता मिल सके. भाजपा नेता विजय कुमार सिन्हा ने भी कहा कि, “जब तक सर्वेक्षण से संबंधित सभी आंकड़े राजनीतिक दलों के सामने पारदर्शी तरीके से प्रस्तुत नहीं किए जाते, तब तक जाति सर्वेक्षण के निष्कर्ष निरर्थक हैं.”

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