Monday , October 26 2020

चीन के दबाव में PoK में ये कदम उठाने को मजबूर हुई PAK सेना!

कश्मीर के विवादित इलाके गिलगित-बाल्टिस्तान को अब पाकिस्तान अपना पांचवां प्रांत बनाने जा रहा है. पाकिस्तान के कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान मामलों के केंद्रीय मंत्री अली आमिन गंदापुर ने ये ऐलान किया है. केंद्रीय मंत्री अली आमिन ने कहा है कि इमरान खान जल्द ही कश्मीर इलाके का दौरा करेंगे और इस संबंध में औपचारिक ऐलान करेंगे. पाकिस्तान सरकार के इस कदम को लेकर हलचल तेज हो गई है और इस कदम के तमाम मायने निकाले जा रहे हैं.

गिलगित-बाल्टिस्तान के पत्रकारों के एक प्रतिनिधि दल से बातचीत में केंद्रीय मंत्री ने कहा, सभी संबंधित पक्षों से बातचीत करने के बाद केंद्र सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान के लोगों को संवैधानिक अधिकार देने का फैसला किया है. हमारी सरकार ने यहां के लोगों से जो वादा किया है, वो उसे पूरा कर रही है.

ऊपरी तौर पर, भले ही पाकिस्तान की सरकार इस प्रक्रिया को पूरा करते नजर आ रही है लेकिन पर्दे के पीछे पाकिस्तानी सेना इस बदलाव के लिए दबाव डाल रही है और ये बात तब खुलकर और जाहिर हो गई जब पाकिस्तानी मीडिया में रिपोर्ट छपी कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने विपक्ष के अन्य नेताओं के साथ डिनर पर मुलाकात की. इस मुलाकात का मकसद गिलगित-बाल्टिस्तान में आगामी चुनाव और बदलाव की प्रक्रिया को लेकर चर्चा करना था. हालांकि, कुछ पाकिस्तानी नेता ही इस मुलाकात को लेकर विरोध कर रहे हैं. विपक्षी दल के कुछ नेता इसे देश की राजनीति में सैन्य हस्तक्षेप करार दे रहे हैं.

विपक्षी दल की नेता और पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बेटी मरयम नवाज ने सेना और राजनेताओं के बीच हुई इस मुलाकात की वैधता को लेकर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा, मुझे डिनर के बारे में नहीं पता है लेकिन मुझे ये जरूर पता है कि ये सिर्फ डिनर नहीं था बल्कि बैठक थी. जहां तक मैं समझ रही हूं ये बैठक गिलगित-बाल्टिस्तान पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी जोकि पूरी तरह से एक राजनीतिक मुद्दा है. ऐसे फैसले तो संसद में लिए जाने चाहिए, ना कि सेना के हेडक्वॉर्टर में.

मरियम ने कहा, राजनीतिक दलों के नेताओं को ना तो इस तरह की बैठकों के लिए बुलाया जाना चाहिए और ना ही उन्हें जाना चाहिए. जो भी उन मुद्दों पर चर्चा करना चाहता है, उसे संसद आना चाहिए. मरियम की आलोचना के बाद पाकिस्तान में राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है

गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान में लंबे वक्त से नजरअंदाज किया जाता रहा है. गिलगित-बाल्टिस्तान के दर्जे को लेकर अस्पष्टता की वजह से स्थानीय अपने मूल अधिकारों से भी वंचित रहे हैं. जब 1947 में कश्मीर विवाद शुरू हुआ तो गिलगित-बाल्टिस्तान को कश्मीर का ही हिस्सा माना जाता था लेकिन 1970 में पाकिस्तान की सरकार ने इसे कश्मीर इलाके से अलग करके एक अलग प्रशासनिक इकाई बनाने का फैसला किया. इस प्रशासनिक इकाई पर पाकिस्तान की सरकार का सीधा नियंत्रण था. उसी वक्त से क्षेत्र के लोग हाशिए पर आना शुरू हो गए. पाकिस्तान की सरकार हमेशा से गिलगित-बाल्टिस्तान पर अपना नियंत्रण मजबूत करना चाहती थी हालांकि, पहले सेना अनिच्छुक थी.

एक स्थानीय पत्रकार इमान शाह ने कहा, गिलगित-बाल्टिस्तान में हम आज जो भी प्रशासनिक और कानूनी बदलाव देखते हैं, वे सारे फैसले इस्लामाबाद में किए गए और हम पर थोप दिए गए. शाह ने कहा कि यहां की स्थानीय पार्टियों को बैन कर दिया गया और पाकिस्तान आधारित पार्टियां ही अब क्षेत्र में बची हैं. पाकिस्तान की सरकार ने बलवरिस्तान नेशनल फ्रंट को बैन किया और जो कोई भी स्थानीय लोगों के लिए काम कर रहा था, उसे विदेशी एजेंट घोषित कर दिया. इस रणनीति से किसी भी विरोधी को शांत किया जा सकता है.

 

 

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