अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक ताजा बयान इस वक्त पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। ट्रंप ने दो टूक शब्दों में कह दिया है कि ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में वे सीजफायर (Ceasefire) यानी युद्धविराम के पक्ष में बिल्कुल नहीं हैं। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने न केवल ईरान को चेतावनी दी, बल्कि चीन, जापान और नाटो (NATO) देशों को भी आड़े हाथों लिया। ट्रंप का यह ‘आक्रामक’ अंदाज बता रहा है कि मिडिल ईस्ट में आने वाले दिन काफी उथल-पुथल भरे होने वाले हैं।
ईरान की तबाही तक जारी रहेगी जंग?
व्हाइट हाउस के लॉन में पत्रकारों से बात करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धविराम की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने बड़े ही ‘देसी’ अंदाज में तर्क देते हुए कहा, “देखिए, हम बात तो कर सकते हैं, लेकिन मुझे कोई सीजफायर नहीं चाहिए। आप तब युद्धविराम की भीख नहीं मांगते, जब आप दूसरी तरफ वाले को पूरी तरह से तबाह (Destroy) कर रहे हों।” ट्रंप का यह बयान साफ इशारा है कि अमेरिका फिलहाल पीछे हटने के मूड में नहीं है और वह ईरान पर अपना दबाव चरम तक ले जाना चाहता है।
अपने आप खुलेगा रास्ता, लेकिन मदद की है दरकार
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक रास्तों में से एक हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ट्रंप ने एक बड़ी भविष्यवाणी की है। उन्होंने कहा कि सही समय आने पर यह रास्ता अपने आप खुल जाएगा, लेकिन इसके सुरक्षित संचालन के लिए दुनिया की बड़ी ताकतों को आगे आना होगा। ट्रंप ने विशेष रूप से चीन और जापान का नाम लेते हुए कहा कि अगर ये देश इस मिशन में शामिल होते हैं, तो यह सबके लिए बेहतर होगा। ट्रंप का मानना है कि इन देशों का व्यापार इस रास्ते से सबसे ज्यादा होता है, इसलिए सुरक्षा की जिम्मेदारी भी इन्हीं की होनी चाहिए।
सहयोगी देशों के पास ‘हिम्मत’ की कमी!
ट्रंप ने अपने संबोधन में सैन्य सहयोगियों को भी नहीं बख्शा। उन्होंने नाटो (NATO) देशों की आलोचना करते हुए कहा कि वे मदद तो कर सकते हैं, लेकिन अभी तक उन्होंने वो ‘साहस’ नहीं दिखाया है जिसकी जरूरत है। इतना ही नहीं, ट्रंप ने ब्रिटेन (UK) पर भी निशाना साधा और कहा कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में ब्रिटेन को और भी ज्यादा फुर्ती दिखानी चाहिए थी। ट्रंप का यह ‘हंटर’ उन देशों के लिए था जो अमेरिका के साथ खड़े तो हैं, लेकिन मैदान में उतरने से कतरा रहे हैं।
मुफ्त की सुरक्षा का दौर अब खत्म!
ट्रंप ने एक बार फिर अपना वही पुराना राग अलापा कि अमेरिका पूरी दुनिया की सुरक्षा का ठेका अकेले नहीं ले सकता। उन्होंने सवाल उठाया कि जब चीन और जापान जैसे देशों के तेल टैंकर यहां से गुजरते हैं, तो अमेरिकी सेना उनकी सुरक्षा क्यों करे? उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर चीन और जापान चाहते हैं कि उनका माल सुरक्षित पहुंचे, तो उन्हें भी अपनी सेना या आर्थिक मदद भेजनी होगी। ट्रंप की यह ‘बिजनेसमैन’ वाली सोच सहयोगियों के पसीने छुड़ाने के लिए काफी है।
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अमेरिकी ऑपरेशन खत्म होने के बाद बदलेगी तस्वीर
जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या अमेरिका के सैन्य अभियान खत्म होने के बाद इजरायल युद्ध रोकने के लिए तैयार होगा, तो उन्होंने सकारात्मक जवाब दिया। ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि ऐसा ही होगा।” इसका मतलब यह है कि अमेरिका और इजरायल एक सोची-समझी रणनीति के तहत काम कर रहे हैं। पहले अमेरिका दुश्मन की कमर तोड़ेगा और उसके बाद शांति की शर्तों पर बात होगी। ट्रंप के इस रुख से साफ है कि वे ईरान को बातचीत की मेज पर तभी लाएंगे जब वह पूरी तरह घुटनों पर होगा।
