Wednesday , September 23 2020

अयोध्या विवाद: आखिरी सुनवाई, SC में यह होगा तय

नई दिल्ली

अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद मामले में आज से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू होने वाली है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई यह तय करेंगे क्या उनके नेतृत्व में ही बेंच इस मामले की सुनवाई करे या फिर किसी अन्य पीठ को यह मामला भेजा जाए। बता दें कि अयोध्या विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की 3 जजों की बेंच ने 30 सितंबर, 2010 को 2:1 के बहुमत वाले फैसले में कहा था कि 2.77 एकड़ जमीन को तीनों पक्षों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला में बराबर-बराबर बांट दिया जाए। इस फैसले के खिलाफ रामलला विराजमान, हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ अर्जी दाखिल कर दी।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की पीठ ने आदेश दिया था कि विवादित भूमि के मालिकाना हक वाले दीवानी मामले की सुनवाई तीन जजों की पीठ 29 अक्टूबर से करेगी। पीठ ने नमाज के लिए मस्जिद को इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं मानने वाले इस्माइल फारूकी मामले में 1994 के फैसले के अंश को पुनर्विचार के लिए सात जजों की पीठ को भेजने से इनकार कर दिया था।

आज तय होगी सुनवाई की रूपरेखा
रामलला विराजमान की ओर से एडवोकेट ऑन रेकॉर्ड विष्णु जैन बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक 29 अक्टूबर को सुनवाई के लिए मामला लिस्ट हुआ है। सोमवार को तय हो पाएगा कि सुनवाई की रूपरेखा क्या होगी यानी सोमवार को मामले की सुनवाई के दौरान ये साफ हो जाएगा कि चीफ जस्टिस की बेंच ही मामले की सुनवाई करेंगे या कोई और बेंच गठित किया जाएगा।

जमीन किसकी इसकी होनी है सुनवाई
अयोध्या के राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। अयोध्या की जमीन किसकी इस पर अभी सुनवाई की जानी है। लेकिन मामले में एक सीमित सवाल को संवैधानिक बेंच भेजा जाए या नहीं इस पर फैसला आया था दरअसल, मुस्लिम पक्षकारों की ओर से दलील दी गई थी कि 1994 में इस्माइल फारुकी केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमेंट में कहा है कि मस्जिद में नमाज पढना इस्लाम का अनिवार्य अंग नहीं है और ऐसे में इस फैसले को दोबारा परीक्षण की जरूरत है और इसी कारण पहले मामले को संवैधानिक बेंच को भेजा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर को फैसले में कहा था कि मामले को संवैधानिक बेंच रेफर नहीं किया जाएगा ऐसे में अब मुख्य मुद्दे की सुनवाई शुरू होगी। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से कहा था कि मामले को साक्ष्यों के आधार पर परीक्षण किया जाएगा न कि धार्मिक महत्व के आधार पर देखा जाएगा।

मुख्य मामला जमीन विवाद
राम मंदिर के लिए होने वाले आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था। इस मामले में आपराधिक केस के साथ-साथ दिवानी मुकदमा भी चला। टाइटल विवाद से संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है। 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाई हाई कोर्ट ने दिए फैसले में कहा था कि तीन गुंबदों में बीच का हिस्सा हिंदुओं का होगा जहां फिलहाल रामलला की मूर्ति है। निर्मोही अखाड़ा को दूसरा हिस्सा दिया गया इसी में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल हैं बाकी एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया। इस फैसले को तमाम पक्षकारों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। 9 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बहाल कर दिया। इस मामले में टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई और तमाम दस्तावेज के ट्रांसलेंशन किए गए। लेकिन पहले दिन ही सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों के वकील कपिल सिब्बल ने ये दलील देकर विवाद खड़ा कर दिया था कि सुनवाई में इतनी जल्दी क्यों है। सुनवाई जुलाई 2019 के बाद होनी चाहिए। उनका इशारा आम चुनाव के बाद सुनवाई करने को लेकर था। सिब्बल का कहना था कि ये साधारण जमीन विवाद नहीं है। वहीं हिंदू पक्षकारों के वकील हरीश साल्वे की दलील थी कि मामला सात साल से पेंडिंग है। कोर्ट को इससे मतलब नहीं होता कि बाहर क्या हो रहा है और जुलाई 2019 तक सुनवाई टालने से गलत संदेह जाएगा। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट में जमीन विवाद पेंडिंग है चूंकि मामले को संवैधानिक बेंच रेफर नहीं किया गया ऐसे में सीधे अब जमीन विवाद पर सुनवाई शुरू होगी।

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