भीमा कोरेगांव: याचिकाकर्ता SC के फैसले से नाखुश

नई दिल्ली

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में गिरफ्तार ऐक्टिविस्ट्स को राहत नहीं मिलने के बाद इस मुद्दे पर राजनीति भी तेज हो गई है। इस मामले में रोमिला थापर समेत सभी याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की निंदा की है। उनका कहना है कि ऐक्टिविस्ट्स के खिलाफ अकल्पनीय चार्ज लगाए गए हैं। इस मामले में पुणे पुलिस की कार्रवाई सवालों के दायरे में है। याचिकाकर्ता की वकील वृंदा ग्रोवर ने कहा, ‘हमने कोर्ट से सिर्फ इतनी मांग की थी कि इस मामले की जांच फेयर एजेंसी से कराई जाए। पुणे पुलिस की भूमिका इस मामले में संदिग्ध रही है।’

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि 6 जून को जब जानेमाने वकील, पत्रकार और समाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया तो लगा कि यूएपीए जैसे कानूनों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आतंकवाद के लिए बने कानूनों का गलत ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। इन कानूनों पर रोक लगाने की जरूरत है, ऐसे कानून लोकतंत्र के लिए खतरा।

याचिकाकर्ताओं ने इस मामले में जस्टिस चंद्रचूड़ की तारीफ भी की है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुप्रीम कोर्ट के बाकी जजों से अलग फैसला दिया है। उन्होंने महाराष्ट्र पुलिस के छानबीन के तरीके पर सवाल उठाए। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने फैसले में कहा कि पांच आरोपियों की गिरफ्तारी राज्य द्वारा उनकी आवाज को दबाने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि पुलिस ने जिस तरह से लेटर को लीक किया और दस्तावेज दिखाए, उससे महाराष्ट्र पुलिस की ऐक्टिविटी सवालों के घेरे में है। पुलिस ने पब्लिक ऑपिनियन बनाने की कोशिश की। इस मामले में एसआईटी जांच की जरूरत है। हालांकि उनका फैसला अल्पमत में रहा।

गौरतलब है कि भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में नक्सल कनेक्शन के आरोप में गिरफ्तार ऐक्टिविस्ट्स को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि ये गिरफ्तारियां राजनीतिक असहमति की वजह से नहीं हुई हैं। कोर्ट ने SIT जांच की मांग खारिज करते हुए ऐक्टिविस्ट्स की हिरासत 4 हफ्ते और बढ़ा दी है।

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