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विधि आयोग नहीं देगा यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने का प्रस्ताव

भारत का 21वां विधि आयोग समय की कमी के कारण यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) का प्रस्ताव नहीं दे रहा है क्योंकि इसके चेयरमैन 31 अगस्त को रिटायर होने जा रहे हैं. इसके अतिरिक्त संविधान की छठवीं अनुसूचि भी यूनिफॉर्म सिविल कोड लाने में एक बाधा है क्योंकि यह जनजातीय वर्चस्व वाले क्षेत्रों में व्यक्तिगत कानूनों को सुरक्षा प्रदान करती है. विधि आयोग केवल कुछ पर्सनल लॉ में संशोधन का प्रस्ताव देगा.दिसंबर 2017 में विधि आयोग के चेयरमैन बीएस चौहान ने कहा था कि संविधान के अंतर्गत छूट को असंतुलन के रूप में सम्मानित करना संविधान के सार के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है.

जस्टिस चौहान ने कहा, “संविधान ने स्वयं कई लोगों को कई छूट दी है, जैसे आदिवासियो को. संविधान में सिविल प्रक्रिया संहिता एवं आपराधिक प्रक्रिया संहिता में भी छूट है. यूनिफॉर्म सिविल कोड समाधान नहीं है और यह इन छूटों को सम्मिलित नहीं कर सकता. आप संविधान को नहीं भूल सकते और छठवीं अनुसूचि को दूर नहीं रख सकते.”विधि आयोग के सूत्रों के मुताबिक, “अगर भविष्य में विधि आयोग का कोई चेयरमैन यूनिफॉर्म सिविल कोड का प्रस्ताव रखता है तो उसे भी छठवीं अनुसूचि की बाधा से निपटना होगा.”

एक सूत्र ने कहा कि आयोग को संविधान के ढांचे के भीतर काम करना है और वह इसका उल्लंघन नहीं कर सकता है. लेकिन हम अब यूसीसी का प्रस्ताव नहीं दे सकते क्योंकि आयोग के पास अब समय नहीं है.बता दें कि जुलाई 2016 में कानून मंत्रालय ने विधि आयोग से यह निर्धारित करने के लिए कहा था कि भारत में यूसीसी संभव है या नहीं.

अक्टूबर 2016 में आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 44 जो सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की बातचीत करता है, के संदर्भ में सभी धर्मों के पारिवारिक कानूनों में संशोधन और सुधार पर जनता की राय मांगी थी.

आयोग ने धार्मिक, अल्पसंख्यक और सामाजिक समूह, गैर सरकारी संगठन, राजनीतिक पार्टियों और सरकारी एजेंसियों के सदस्यों को प्रश्नावली के माध्यम से विभिन्न मुद्दों जिनमें तीन तलाक और महिलाओं के लिए संपत्ति का अधिकार भी शामिल था पर अपना विचार व्यक्त करने की अपील की थी.इसके एक साल बाद आयोग ने न्यूज 18 को बताया कि यूनिफॉर्म सिविल कोड संभव नहीं है.इस मुद्दे पर मई 2018 तक लोगों की राय ली गई जिसमें की निकायों और व्यक्तियों ने इसके खिलाफ अपनी बात रखी.हालांकि इस तरह के सभी सुझावों और पर्सनल लॉ पर संशोधन के प्रस्ताव को 31 अगस्त को आयोग के कार्यकाल समाप्त होने से पहले सार्वजनिक डोमने में रखा जाएगा. जनता इस पर चर्चा और बहस कर सकती है.

दिसंबर 2017 में न्यूज 18 ने रिपोर्ट दी थी कि विधि आयोग यूसीसी लाने की बजाए पर्सनल लॉ में संशोधन लाने का प्रयास करेगा. लॉ कमिशन के चेयरमैन जस्टिस बलबीर सिंह चौहान ने कहा कि कि यूनिफॉर्म सिविल को़ लागू करना मुश्किल है. उन्होंने कहा था, “यूसीसी संभव नहीं है और यहां तक ​​कि एक विकल्प भी नहीं है.”जस्टिस चौहान ने इस पर कहा था, “निजी कानूनों को कभी भी संवैधानिक सुरक्षा के साथ समाप्त नहीं किया जा सकता है.”इसके बाद अध्यक्ष यूसीसी के विचार को छोड़कर कई पर्सनल लॉ में विशिष्ट संशोधन का सुझाव देने की योजना बना रहे थे, जो ट्रिपल तालक पर सार्वजनिक बहस के दौरान खूब सुर्खियो में रहा.

“यूसीसी संभव नहीं है. हम पारिवारिक कानूनों में धर्म-आधारित संशोधन की सिफारिश करने की कोशिश करेंगे. यह हिंदू कानून, मुस्लिम कानून, ईसाई कानून, पारसी कानून, आदि में क्रम से आवश्यक परिवर्तनों का सुझाव देने का तरीका होगा. हम प्रत्येक धर्म की समस्याओं को लक्षित करेंगे और उसके अनुसार काम करेंगे. हम पूर्ण यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं ला सकते हैं क्योंकि हम संविधान से बाहर नहीं जा सकता हैं.” चेयरमैन ने विस्तृत इंटरव्यू में न्यूज 18 से कहा.

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