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संशोधन के बाद भी 3 तलाक बिल मुस्लिम संगठनों को क्यों नहीं मंजूर!

नई दिल्ली,

तीन तलाक को जुर्म घोषित करने और सजा मुकर्रर करने वाले विधेयक में मोदी सरकार ने संशोधन किए हैं. इसके तहत अब ट्रायल से पहले पीड़िता का पक्ष सुनकर मजिस्ट्रेट आरोपी को जमानत दे सकता है. इसके अलावा थर्ड पर्सन की जगह पीड़िता के परिजन और रिश्तेदार ही तलाक देने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा सकते हैं.

मोदी सरकार द्वारा तीन तलाक बिल में संशोधनों के बाद भी ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इसे महिलाओं की जिंदगी को बर्बाद करने वाला बिल बता रहा है. जबकि महिला मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर बिल का स्वागत करते हुए कह रही हैं कि आम सहमति के जरिए विधेयक लाया जाता तो बेहतर होता.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता मौलाना खालिद सैफुल्ला रहमानी ने कहा- तीन तलाक विधेयक को लेकर जो ऐतराज पहले था वो आज भी कायम है. सरकार ने संशोधन के नाम पर सिर्फ खानपूर्ती की है. मुस्लिम उलेमाओं से किसी तरह का कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया. ऐसे में हम इस विधेयक को कैसे मंजूर कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि हम आज भी पहले की तरह अपनी बात पर कायम है कि विधेयक को पहले सेलेक्ट कमेटी को भेजा जाए ताकि जिन बिंदुओं पर अपत्ति है. उन पर विचार-विमर्श हो सके. रहमानी ने कहा कि इस विधेयक के आने से महिलाओं को जिंदगी में राहत मिलने के बजाए बर्बादी का सबब बनेगा. मोदी सरकार की मंशा मुस्लिम महिलाओं के जीवन को बेहतर बनाने का नहीं है बल्कि राजनीति करने का है.

मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर कहती हैं कि मुस्लिम महिलाएं तलाक के डर के साए में जीती आ रही हैं. ऐसे में मोदी सरकार के कानून बनाने के कदम का मैं स्वागत करती हूं. लेकिन विधेयक में कुछ खामियां हैं जिन्हें सरकार संशोधन में दूर करती तो बेहतर था.

शाइस्ता अंबर कहती हैं कि सरकार को इस बात की गुंजाइश रखनी चाहिए थी कि तलाक होता है तो सुलह समझौते हो सके. इस संबंध में हमने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और लॉ कमीशन के अध्यक्ष से मुलाकात करके कहा था कि आप जो कानून बनाने के विधेयक ला रहे हैं. इसके लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मुस्लिम उलेमा, इस्लामिक स्कॉलर और मुस्लिम महिलाओं के हक में आवाज उठाने वाली महिलाओं के साथ विचार-विमर्श करके आम सहमति बनाने के साथ कानून लाएं, ताकि मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से रहत मिले. मोदी सरकार ये नहीं कर सकी.

उन्होंने कहा कि कानून ऐसा होना चाहिए, जिससे पुरुषों के अंदर तलाक देने पर डर पैदा हो सके. ऐसा न हो कि मुस्लिम महिलाओं को इससे जूझना पड़े. सरकार विधेयक ऐसा बना रही है जिससे खुला देने वाले को भी दिक्कत खड़ी हो सकती है. इसके लिए सरकार आम सहमति बनाए फिर कानून लाए तो बेहतर होगा.

जमात-ए-इस्लामी हिंद के महासचिव सलीम इंजीनियर ने कहा कि इस संबंध में हमारी और हमारे संगठन की राय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की राय पर है. सरकार ने जो संशोधन किए हैं वो उचित नहीं है. सरकार को चाहिए कि इस विधेयक को पहले सेलेक्ट कमेटी के पास भेजे.

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