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लेबरों को ओवरटाइम के भुगतान से वंचित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

ई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कहा है कि लेबर आर्थिक गतिविधियों के मेरुदंड होते हैं और उन्हें ओवरटाइम के भुगतान से वंचित कर उन्हें मजदूरी की बेड़ियों में नहीं जकड़ा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने गुजरात सरकार के 17 व 20 मार्च के नोटफिकेशन को खारिज करते हुए उक्त टिप्पणी की।

इस नोटिफिकेशन के तहत सरकार ने सभी फैक्ट्रियों को रोजाना के कामकाज के समय, हफ्ते के घंटे और घंटों के बीच आराम के समय आदि के नियमों से छूट दे दी थी साथ ही ओवर टाइम के भुगतान के नियम से भी फैक्ट्रियों को छूट प्रदान कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और कहा कि लेबरों को ओवर टाइम मजदूरी नियम के तहत भुगतान किया जाए। अदालत ने साफ किया कि लेबर के जो भी वैधानिक अधिकार है वह राज्य (सरकार ) खत्म नहीं कर सकती उस अधिकार से राज्य लेबर को वंचित नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा लेबर के थके हुए कंधे पर आर्थिक नुकसान का बोझ नहीं डाला जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अहम फैसले में कहा कि लेवर को जीवन का अधिकार है और उनके जीवन के अधिकार को उनके एंप्लायर या राज्य की दया के तौर पर नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने कहा कि लेबर को उनके ओवर टाइम के भुगतान से विमुख नहीं किया जा सकता साथ ही कानून के तहत जो मानवीय वर्किंग की शर्तें लेबर के लिए तय की गई है उससे उन लेबरों को वंचित नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन हुआ और उस कारण गरीब जनता और लेबर और मजदूरी करने वाले लोगों ने कष्ट झेला है। अदालत ने कहा कि जहां तक सोशल सिक्युरिटी का सवाल है तो इन गरीबों और लेबरों के पास कोई सोशल सिक्युरिटी का विकल्प नहीं है और उनके पास ऐसी कोई सिक्युरिटी नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोरोना महामारी के कारण जो लॉकडाउन हुआ और उस कारण फैक्ट्रियां तंगी में गई है और ये बातें अदालत को पता है। राज्यों द्वारा कोशिश की जा रही है कि फैक्ट्रियां इन परेशानियों से निकले। अदालत ने कहा कि इन तमाम परिस्थितियों से अदालत पूरी तरह से अवगत है लेकिन लेबर के कंधे पर आर्थिक हानि का बोझ तो नहीं डाला जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोविड महामारी लेबर के मजदूरी के अधिकार को खत्म करने का कारण नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि कोविड के कारण कानून में जिस तरह से लेबरों को जीवन जीने के अधिकार के शर्तों के साथ गरिमा प्रदान करने वाली स्थिति प्रदान की गई है उससे वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक आंतरिक गड़बड़ी के कारण राज्य के सुरक्षा को खतरा न हो और इमरजेंसी वाले हालात न हो तब तक फैक्ट्री नियमों के प्रावधानों के पालन से किसी फैक्ट्री को छूट नहीं दी जा सकती है। अदालत ने कहा कि जब तक आंतरिक सुरक्षा को खतरा न हो तब तक इमरेजंसी पावर का इस्तेमाल नहीं हो सकता।

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