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प्रशांत महासागर में बना प्लास्टिक का पहाड़, समुद्री जीवों ने आपदा को बनाया अवसर

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नई दिल्ली,

नेचर इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन जर्नल में सोमवार को प्रकाशित स्टडी में शोधकर्ताओं ने खुलासा किया कि समुद्री जीवों की कई दर्जन स्पीशीज समुद्र में सालों से तैर रहे प्लास्टिक पर रहने और बढ़ने में सक्षम हो चुकी हैं. इस तरह से एक नया इकोसिस्टम तैयार हो रहा है, जिसमें प्लास्टिक उनके लिए खतरा नहीं, बल्कि जीवन देने वाला साबित हो रहा है.

बहुत विशाल है कचरे का ढेर
ये जीव ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच पर मिले हैं. दरअसल हवाई और कैलीफोर्निया के बीच स्थित प्रशांत महासागर के लगभग 1.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर हिस्से पर इंसानों द्वारा फेंका कचरा जमा हो चुका है. ये कचरे का ढेर कोई छोटा-मोटा नहीं, बल्कि एक द्वीप जैसा है. एक अनुमान के मुताबिक यहां प्लास्टिक के लगभग 1.8 ट्रिलियन टुकड़े जमा हैं. कूड़े का ये मलबा इतना बड़ा है कि इसे ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच कहा जाने लगा.

जीवों ने प्लास्टिक को बना लिया आसरा
शुरुआत में वैज्ञानिक मान रहे थे कि जल्द ही यहां आसपास मौजूद समुद्री जीवों की मौत होने लगेगी और खतरा इंसानों तक पहुंच जाएगा, लेकिन स्टडी में नया पैटर्न देखने को मिला. शोधकर्ताओं ने साढ़े चार सौ से ज्यादा समुद्री जीवों की पहचान की, जो कचरे और उसके आसपास रहते मिले. हालांकि ये साफ नहीं हो सका कि ये जीव स्थाई तौर पर प्लास्टिक को अपने घर की तरह इस्तेमाल करते हैं, या नहीं.

माना नई कम्युनिटी
स्टडी में शामिल अमेरिका, कनाडा और नीदरलैंड के एक्सपर्ट ये मान रहे हैं कि बहुत से अकशेरुकीय जीव-जंतु प्लास्टिक के मलबे पर तैरते हुए ज्यादा लंबा जीवन जी पाते हैं क्योंकि ढेर पर उन्हें समुद्र की तुलना में कम संघर्ष करना होता है. वे इसपर प्रजनन भी कर रहे हैं. साइंटिस्ट्स ने इस नई इकॉलॉजी में शामिल जीवों को नियोपेलैजिक कम्युनिटी नाम दिया है.

तट तक सीमित जीव समुद्र के बीच में पहुंच रहे
इस नाम में दो अर्थ शामिल हैं, तटीय और समुद्री प्रजातियों का मिश्रण. आमतौर पर तटीय जीव लंबे समय तक जीवित तो रह पाते हैं, लेकिन समुद्र में अपना घर नहीं बना पाते. अब प्लास्टिक के मलबे को वे घर की तरह इस्तेमाल करने लगे हैं. इससे वे बीच समुद्र में आसानी से रह पा रहे हैं और तट पर रहने की क्षमता उनके पास पहले से ही है.

किस तरह का प्लास्टिक कचरा है समुद्र में
मछली पकड़ने का जाल, दुर्घटनाग्रस्त बोटें, प्लास्टिक की बोतलें, रस्सियां जैसी कई चीजें समुद्र में जमा हो रही हैं. चूंकि प्लास्टिक वेस्ट का विघटन जल्दी हो नहीं पाता तो ये जमा होते हुए लंबे-चौड़े मलबे का रूप ले चुकी हैं. इसपर समुद्री वनस्पति भी लिपट जाती है, जिससे इसका शेप ज्यादा पक्का हो जाता है. देखा गया कि इन्हीं मलबों पर स्पीशीज तैरने लगे हैं. ये प्रोसेस राफ्टिंग कहलाती है, जो वैसी ही है, जैसे हम-आप एडवेंचर एक्टिविटी की तरह करते हैं, यानी किसी नाव पर सवार होकर लहरों पर तैरना-उतरना.

रस्सी पर बन रहीं सबसे ज्यादा कॉलोनियां
समुद्री जीव प्लास्टिक कचरे का किस हद इस्तेमाल करने लगे हैं, ये समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 10 अलग-अलग श्रेणियों में 100 से ज्यादा आइटम पहचाने, जो समुद्र में सालों से तैर रहे हैं. इन्हें देखा गया कि किस तरह के वेस्ट पर कितनी प्रजातियां जीवित रह रही हैं. इस दौरान दिखा कि सबसे ज्यादा जीव रस्सियों पर जीवित थे और प्रजनन कर रहे थे. इसके बाद मछलियां पकड़ने के जाल और फिर प्लास्टिक बोतलों का नंबर था.

प्लास्टिक के कई द्वीप बन चुके
ग्रेट पैसिफिक गारबेज पैच दुनिया में अकेला समुद्री मलबा नहीं, बल्कि कई जगहों पर प्लास्टिक का पहाड़ खड़ा हो रहा है. ये गारबेज सतह पर ही नहीं, बल्कि नीचे भी पहुंच चुका है. फिलहाल कुल 4 बड़े प्लास्टिक वेस्ट के ढेर पहचाने गए हैं, जिनमें प्रशांत महासागर के अलावा दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के बीच साउथ पैसिफिक गारबेज पैच, अफ्रीका के तट पर महासागर गारबेज पैच और नॉर्थ अटलांटिक गारबेज पैच शामिल हैं.

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