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धर्म बदलकर मुस्लिम-ईसाई बन चुके दलितों को भी मिलेगा SC का दर्जा? SC में सरकार ने दिए ये तर्क

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नई दिल्ली,

धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम या ईसाई बन चुके दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाना चाहिए या नहीं? इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है.सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एसके कौल, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानउल्लाह और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच इस पर सुनवाई कर रही है. बुधवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट पर भी चर्चा हुई. साथ ही इस पर भी चर्चा हुई कि क्या दूसरा धर्म अपनाने के बावजूद अनुसूचित जाति के लोगों को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है या नहीं?

कोर्ट ने इस पर भी हैरानी जताई कि दलित मुस्लिमों और दलित ईसाइयों को आरक्षण के मामले पर जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की रिपोर्ट आ चुकी है तो फिर सरकार नया आयोग क्यों बना रही है. अदालत ने कहा, ‘जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग था. उसने अपनी रिपोर्ट दी और आपने अपनी समझदारी से कहा कि आप इसे नहीं मानते. अब आपने नया आयोग बना दिया. क्यों हमें आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए.’अदालत ने कहा कि दूसरे धर्म में परिवर्तित होने के बाद भी व्यक्ति को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ सकता है. अब इस मामले में 11 जुलाई को सुनवाई की जाएगी.

क्या है पूरा मामला?
सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर हुईं हैं. इनमें मांग की गई थी कि धर्म परिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बनने वाले दलितों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाए और आरक्षण समेत दूसरे लाभ दिए जाएं. इन याचिकाओं में संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 को भी चुनौती दी गई है. इस आदेश को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन बताया गया है. 1950 का ये आदेश कहता है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलितों के अलावा दूसरे धर्मों के लोगों को अनुसूचित जाति का दर्जा नहीं दिया जा सकता.

केंद्र का क्या है कहना?
– सुप्रीम कोर्ट में जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने कहा था कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 ‘असंवैधानिक’ नहीं है और इससे ईसाई और इस्लाम धर्म को इसलिए बाहर रखा गया था क्योंकि इन दोनों धर्मों में ‘छुआछूत’ नहीं है. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को ये भी बताया था कि उसने जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को मंजूर नहीं किया है, क्योंकि उसमें कई ‘खामियां’ थीं. सरकार ने पिछले साल पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया है. ये आयोग नए लोगों को एससी का दर्जा दिए जाने की जांच करेगा, जो ऐतिहासिक रूप से अनुसूचित जाति होने का दावा करते हैं, लेकिन बाद में किसी और धर्म में परिवर्तित हो गए.

सरकार ने और क्या-क्या तर्क रखे थे?
– दलित मुस्लिमों और दलित ईसाइयों को आरक्षण दिए जाने के खिलाफ पिछले साल नवंबर में सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया था. इसमें कहा था, ‘अनुसूचित जातियों के आरक्षण और पहचान का मकसद सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन से परे है. अनुसूचित जातियों की पहचान एक विशिष्ट सामाजिक कलंक के आसपास केंद्रित है और संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश 1950 में पहचाने गए समुदायों तक सीमित है.’

– सरकार ने तर्क दिया, ‘ये आदेश ऐतिहासिक आंकड़ों पर आधारित था, जिसने साफ किया था कि ईसाई या इस्लामी समाज के लोगों को कभी भी इस तरह के पिछड़ेपन या उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा है.’ केंद्र ने कहा था, असल में अनुसूचित जाति के लोग ईसाई या इस्लाम धर्म में परिवर्तित ही इसलिए होते हैं ताकि वो छुआछूत जैसी दमनकारी व्यवस्था से बाहर आ सकें.

जस्टिस मिश्रा आयोग की रिपोर्ट क्यों नहीं मानी?
– जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने 2007 में अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंपी थी. इस रिपोर्ट में दलित मुस्लिमों और दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की सिफारिश की थी. सरकार ने इन सिफारिशों को ‘खामी’ भरा बताते हुए नामंजूर कर दिया. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि ये रिपोर्ट बिना किसी क्षेत्रीय अध्ययन के बनाई गई थी, इसलिए जमीनी स्थिति पर इसकी पुष्टि नहीं होती. सरकार का कहना था कि ये रिपोर्ट बनाते समय इस बात का ध्यान भी नहीं रखा गया कि पहले से सूचीबद्ध जातियों पर इसका क्या असर होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
– बुधवार को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने केंद्र की ओर से जवाब देते हुए कहा कि जस्टिस बालाकृष्णा की अध्यक्षता में आयोग काम कर रहा है और डेटा कलेक्ट किया जा रहा है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जस्टिस मिश्रा आयोग ने जो रिपोर्ट दी थी, उसे माना नहीं गया तो फिर जो डेटा आया था उसका क्या हुआ? बेंच ने कहा कि ‘और कितने आयोग गठित किए जाएंगे?’ इस पर एएसजी नटराज ने कहा कि जस्टिस मिश्रा आयोग ने सभी पहलुओं पर गौर नहीं किया था.

– इस पर कोर्ट ने कहा, ‘आपको रिपोर्ट फिर से देखनी चाहिए. आप एक रिपोर्ट बहुत ही सामान्य बयान दे रहे हैं. रिपोर्ट इतनी लापरवाह नहीं है.’ अदालत ने कहा कि ‘सामाजिक कलंक और धार्मिक कलंक अलग-अलग बातें हैं. कई बार दूसरे धर्म में परिवर्तित होने के बाद भी व्यक्ति को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ सकता है. जब हम संवैधानिक सवालों पर विचार कर रहे होते हैं तो अपनी आंखें बंद नहीं कर सकते.’

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